नई दिल्ली: दुनिया भर में डिमेंशिया के नए मामलों की संख्या आने वाले दशकों में तेजी से बढ़ सकती है। JAMA Neurology में 12 अक्टूबर 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय मेटा-विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2023 में अनुमानित 1.14 करोड़ लोगों में डिमेंशिया विकसित हुआ। यदि नए मामलों की दर मौजूदा स्तर पर बनी रहती है और जनसंख्या संबंधी अनुमान सही रहते हैं, तो वर्ष 2050 तक हर साल नए मामलों की संख्या बढ़कर लगभग 2.47 करोड़ हो सकती है।
अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष यह भी है कि उम्र के अंतर को ध्यान में रखने के बाद भी महिलाओं में डिमेंशिया के नए मामलों की दर पुरुषों से अधिक रही। कम और मध्यम आय वाले देशों में भी उच्च आय वाले देशों की तुलना में दर अधिक दर्ज की गई। शोधकर्ताओं ने हालांकि इन अंतर के पीछे के कारणों को निश्चित रूप से स्थापित नहीं किया है।
22 अध्ययनों और 18 देशों के आंकड़ों का विश्लेषण
‘Global Incidence of All-Cause Dementia: A Meta-Analysis’ नामक अध्ययन में छह महाद्वीपों के 18 देशों और क्षेत्रों से 22 जनसंख्या-आधारित अध्ययनों के आंकड़े शामिल किए गए। विश्लेषण में 38,418 प्रतिभागियों का डेटा लिया गया। 287,632 व्यक्ति-वर्ष के अनुवर्ती अवलोकन के दौरान 3,001 प्रतिभागियों में डिमेंशिया विकसित हुआ।
शोधकर्ताओं ने अलग-अलग अध्ययनों और आबादियों के आंकड़ों की तुलना के लिए समान सांख्यिकीय तरीके अपनाए। कुल मिलाकर, उम्र और लिंग के हिसाब से मानकीकृत दर प्रति 1,000 व्यक्ति-वर्ष में 9.7 नए मामले आंकी गई। व्यक्ति-वर्ष का माप इस बात को ध्यान में रखता है कि अध्ययन में कितने लोगों को कितने समय तक देखा गया।

2050 के अनुमान का सही अर्थ क्या है?
अध्ययन में 2023 के लिए 1.14 करोड़ नए मामलों का अनुमान लगाया गया और इन्हीं उम्र-विशिष्ट तथा लिंग-विशिष्ट दरों को 2050 की अनुमानित आबादी पर लागू करने से सालाना 2.47 करोड़ नए मामलों का आंकड़ा निकला। यह 2023 के अनुमान से दोगुने से भी अधिक है।
यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। 2.47 करोड़ का आंकड़ा 2050 में एक वर्ष के दौरान होने वाले नए मामलों का अनुमान है, न कि उस साल दुनिया में डिमेंशिया के साथ जीवित रह रहे सभी लोगों की कुल संख्या। किसी समय डिमेंशिया से प्रभावित लोगों की कुल संख्या को प्रचलन (prevalence) कहा जाता है, जबकि एक अवधि में सामने आए नए मामलों को घटना-दर या इन्सिडेंस (incidence) से समझा जाता है। दोनों आंकड़े अलग-अलग सवालों का जवाब देते हैं।
यह भविष्यवाणी भी इस मान्यता पर आधारित है कि डिमेंशिया की दरें समय के साथ स्थिर रहेंगी। जनसंख्या की उम्र-संरचना, जोखिम घटाने के उपायों, स्वास्थ्य सेवाओं, निदान और भविष्य के उपचारों में बदलाव वास्तविक संख्या को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए इसे निश्चित भविष्यवाणी नहीं, बल्कि योजना बनाने में मदद करने वाला अनुमान समझना चाहिए।
उम्र को ध्यान में रखने के बाद भी महिलाओं में दर अधिक
अध्ययन में महिलाओं के लिए उम्र-मानकीकृत डिमेंशिया घटना-दर प्रति 1,000 व्यक्ति-वर्ष में 10.6 और पुरुषों के लिए 8.6 रही। उम्र-मानकीकरण का उद्देश्य महिलाओं और पुरुषों की तुलना ऐसी स्थिति में करना है, जिसमें दोनों समूहों की उम्र-संरचना का प्रभाव समायोजित किया गया हो। इससे यह संकेत मिलता है कि महिलाओं की औसत आयु अधिक होना ही इस अंतर की पूरी व्याख्या नहीं करता।

फिर भी, अध्ययन यह नहीं बताता कि महिलाओं में दर अधिक क्यों रही। रजोनिवृत्ति और जीवनभर एस्ट्रोजन के संपर्क जैसे जैविक पहलुओं, हृदय और रक्तवाहिका स्वास्थ्य, रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल तथा रक्त शर्करा जैसे कारकों पर आगे शोध की जरूरत है। इन संभावित कारणों को इस अध्ययन ने सिद्ध नहीं किया और किसी एक कारण को निर्णायक मानना जल्दबाजी होगी।
इस निष्कर्ष का यह अर्थ भी नहीं है कि हर महिला को डिमेंशिया होगा या पुरुषों का जोखिम कम होने के कारण उन्हें चिंता नहीं करनी चाहिए। व्यक्तिगत जोखिम उम्र, स्वास्थ्य, पारिवारिक इतिहास और अनेक अन्य कारकों से प्रभावित होता है।
कम और मध्यम आय वाले देशों में भी चिंता
अध्ययन में कम और मध्यम आय वाले देशों में मानकीकृत घटना-दर प्रति 1,000 व्यक्ति-वर्ष में 13.6 रही, जबकि उच्च आय वाले देशों में यह 8.3 थी। यह अंतर स्वास्थ्य प्रणालियों और रोकथाम की योजना के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, इसे इस बात का प्रमाण नहीं समझना चाहिए कि कम राष्ट्रीय आय सीधे डिमेंशिया का कारण बनती है।
लेखकों ने ध्यान दिलाया कि कम और मध्यम आय वाले देश वैश्विक डिमेंशिया अनुसंधान में अब भी अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व रखते हैं। इस विश्लेषण में ऐसे छह देशों या क्षेत्रों की तुलना उच्च आय वाले 12 देशों या क्षेत्रों से की गई। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, निदान की उपलब्धता, हृदय-स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और अन्य सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां इन दरों को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन इनके योगदान को स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त शोध जरूरी है।

भारत के लिए क्यों अहम है यह शोध?
भारत जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश में उम्रदराज आबादी की बढ़ती जरूरतों के अनुरूप स्मृति और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारी महत्वपूर्ण होगी। अध्ययन का वैश्विक अनुमान भारत के लिए अलग राष्ट्रीय संख्या नहीं देता, इसलिए 2.47 करोड़ के आंकड़े को भारत का अनुमान नहीं माना जाना चाहिए। भारत की स्थिति समझने के लिए स्थानीय जनसंख्या अध्ययन, बेहतर निगरानी और विश्वसनीय निदान संबंधी आंकड़े जरूरी हैं।
नीति और स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर पर समय पर पहचान, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में संज्ञानात्मक लक्षणों के मूल्यांकन की क्षमता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता तथा परिवारों और देखभाल करने वालों के लिए सहायता महत्वपूर्ण हो सकती है। डिमेंशिया केवल प्रभावित व्यक्ति की समस्या नहीं है; इसका असर परिवार, देखभाल व्यवस्था और समुदाय पर भी पड़ता है।
डिमेंशिया क्या है और किन संकेतों पर ध्यान दें?
डिमेंशिया किसी एक बीमारी का नाम नहीं, बल्कि ऐसी स्थितियों का समूह है जिनमें स्मृति, सोच, भाषा, निर्णय लेने या रोजमर्रा के काम करने की क्षमता में गिरावट आती है। अल्जाइमर रोग इसका एक प्रमुख कारण है। उम्र बढ़ना सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में से है, लेकिन डिमेंशिया को सामान्य उम्र बढ़ने का अनिवार्य हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए।
हाल की बातों को बार-बार भूलना, परिचित कामों में असामान्य कठिनाई, परिचित जगहों पर भटकना, बातचीत या शब्द खोजने में लगातार परेशानी, निर्णय क्षमता में बदलाव और रोजमर्रा के कामों में बढ़ती निर्भरता जैसे लक्षण चिकित्सकीय मूल्यांकन की वजह हो सकते हैं। केवल कभी-कभार भूल जाना अपने आप में डिमेंशिया का निदान नहीं है; नींद, तनाव, अवसाद, दवाएं और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी स्मृति को प्रभावित कर सकती हैं।

यदि स्मृति या सोच में बदलाव लगातार बढ़ रहा हो और दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहा हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना उचित है। अचानक भ्रम, बोलने में अचानक परेशानी, चेहरे या हाथ-पैर में कमजोरी जैसे लक्षण आपात स्थिति का संकेत हो सकते हैं और तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत होती है।
मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए क्या किया जा सकता है?
यह अध्ययन किसी एक जीवनशैली उपाय के प्रभाव का परीक्षण नहीं था। फिर भी, मस्तिष्क स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए प्रचलित स्वास्थ्य सलाह में कुछ ऐसे कदम शामिल हैं जो समग्र स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी हैं:
- रक्तचाप, रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल पर ध्यान दें: नियमित जांच कराएं और चिकित्सक की सलाह के अनुसार उपचार लें।
- शारीरिक रूप से सक्रिय रहें: अपनी उम्र और स्वास्थ्य के अनुरूप नियमित गतिविधि अपनाएं।
- संतुलित आहार लें: सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल करें; अत्यधिक नमक और लंबे समय तक असंतुलित खानपान से बचें।
- धूम्रपान से बचें: धूम्रपान छोड़ना और तंबाकू से दूर रहना समग्र स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।
- नींद, सुनने और सामाजिक जुड़ाव का ध्यान रखें: सुनने या देखने में परेशानी हो तो जांच कराएं और जरूरत के अनुसार सहायता लें।
- लक्षणों को नजरअंदाज न करें: स्मृति या व्यवहार में लगातार बदलाव होने पर समय पर चिकित्सकीय मूल्यांकन कराएं।
इन उपायों से हर व्यक्ति में डिमेंशिया को रोका जा सकता है, ऐसी गारंटी नहीं है। इनका उद्देश्य कुछ परिवर्तनीय जोखिमों को कम करना और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखना है। किसी भी व्यक्ति के लिए उपयुक्त योजना उसकी चिकित्सा स्थिति और जरूरतों के अनुसार तय होनी चाहिए।
निष्कर्ष: बेहतर आंकड़े, रोकथाम और देखभाल की जरूरत
नया वैश्विक विश्लेषण डिमेंशिया के बढ़ते संभावित बोझ और आबादियों के बीच महत्वपूर्ण अंतर को सामने लाता है। 2050 तक हर साल 2.47 करोड़ नए मामलों का अनुमान मौजूदा दरों और जनसंख्या अनुमानों पर आधारित है, जबकि महिलाओं में उम्र-मानकीकरण के बाद भी अधिक घटना-दर आगे जांच की मांग करती है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, खासकर कम और मध्यम आय वाले देशों में बेहतर स्थानीय आंकड़े, जोखिम घटाने की रणनीतियां, समय पर निदान और देखभाल सेवाओं की योजना अहम होगी। फिलहाल अध्ययन इन अंतर के कारणों का अंतिम उत्तर नहीं देता, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि डिमेंशिया की रोकथाम और सहायता को वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता बनाना जरूरी है।
यह समाचार वैज्ञानिक अध्ययन और उपलब्ध स्वास्थ्य रिपोर्टिंग पर आधारित है। यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह या निदान का विकल्प नहीं।
