हरियाणा के राजनीतिक इतिहास में बनारसी दास गुप्ता का नाम उन नेताओं में लिया जाता है जिनका सार्वजनिक जीवन स्वतंत्रता आंदोलन से शुरू होकर राज्य के गठन के बाद की राजनीति, प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं तक फैला रहा। वे स्वतंत्रता सेनानी, हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष, राज्य सरकार में मंत्री, उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने राज्यसभा में भी हरियाणा का प्रतिनिधित्व किया। 5 नवंबर 1917 को भिवानी क्षेत्र में जन्मे बनारसी दास गुप्ता का जीवन उस पीढ़ी की कहानी है जिसने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष किया और आजादी के बाद नवगठित राज्यों की संस्थाओं को आकार देने में भूमिका निभाई।
उनकी राजनीतिक पहचान केवल मुख्यमंत्री पद तक सीमित नहीं थी। वे प्रजामंडल आंदोलन से जुड़े, हरियाणा के सार्वजनिक और शैक्षणिक जीवन में सक्रिय रहे तथा हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से भी राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर काम किया। उनके जीवन को समझने के लिए तत्कालीन पंजाब की रियासतों, जींद राज्य के प्रजामंडल संघर्ष और 1966 में हरियाणा के गठन के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
भिवानी में जन्म और शिक्षा
बनारसी दास गुप्ता का जन्म 5 नवंबर 1917 को भिवानी क्षेत्र के मन्हेरू गांव में हुआ था। उस समय यह इलाका अविभाजित पंजाब का हिस्सा था; हरियाणा राज्य का गठन बाद में 1 नवंबर 1966 को हुआ। उनके पिता का नाम रामस्वरूप दास बताया जाता है। उनका बचपन साधारण ग्रामीण परिवेश में बीता। शिक्षा हासिल करने के लिए उन्हें अपने गांव से बाहर जाना पड़ा। उन्होंने आगे की पढ़ाई बिरला कॉलेज, पिलानी में की। राज्यसभा के आधिकारिक जीवनी विवरण में उनकी शैक्षणिक योग्यता इंटरमीडिएट और प्रभाकर दर्ज है।
युवा अवस्था में ही वे राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक सुधार के विचारों से प्रभावित हुए। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष के साथ-साथ देशी रियासतों में प्रजा के अधिकारों का सवाल भी उनके राजनीतिक जीवन का आधार बना। उस दौर में कई रियासतों में नागरिक स्वतंत्रता, प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक जवाबदेही की मांग को लेकर प्रजामंडल आंदोलन चल रहे थे।

जींद राज्य प्रजामंडल और स्वतंत्रता संग्राम
बनारसी दास गुप्ता का शुरुआती राजनीतिक कार्य जींद रियासत के प्रजामंडल आंदोलन से जुड़ा था। इस आंदोलन का उद्देश्य रियासतों में जनता के अधिकारों और उत्तरदायी शासन की मांग को उठाना था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उन्होंने 1938 के आसपास जींद राज्य प्रजामंडल के गठन और गतिविधियों में भूमिका निभाई। रियासत के शासन के विरोध में सक्रियता के कारण उन्हें 1941 में गिरफ्तार किया गया और जेल में रखा गया।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी वे स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े रहे। विभिन्न जीवनी स्रोतों में उनकी हिरासत की अवधि के संबंध में कुछ अंतर मिलता है; कुछ विवरण 1942 से 1944 तक जेल में रहने का उल्लेख करते हैं, जबकि अन्य स्रोत गांव में नजरबंदी या प्रतिबंधों की बात करते हैं। इसलिए उनकी स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी स्पष्ट है, लेकिन हिरासत की सटीक अवधि को लेकर स्रोतों में अंतर दर्ज करना अधिक उचित है।
1947 में देश की आजादी के बाद भी रियासतों के भारत में एकीकरण का प्रश्न उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बना रहा। जींद के भारत में विलय और उसके बाद प्रशासनिक पुनर्गठन से जुड़े आंदोलनों में उन्होंने भाग लिया। रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया ने उत्तर भारत के राजनीतिक नक्शे को बदला और आगे चलकर हरियाणा जैसे नए राज्य के गठन की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
भिवानी में सार्वजनिक जीवन और कांग्रेस संगठन
स्वतंत्रता के बाद बनारसी दास गुप्ता ने भिवानी को अपनी सार्वजनिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाया। वे स्थानीय निकायों, शिक्षा संस्थानों और कांग्रेस संगठन से जुड़े। उन्होंने हिसार जिला कांग्रेस कमेटी में नेतृत्वकारी जिम्मेदारी निभाई और प्रदेश कांग्रेस संगठन में भी सक्रिय रहे। भिवानी की नगरपालिकाओं तथा स्थानीय विकास संस्थाओं के साथ उनके जुड़ाव का उल्लेख उनके जीवन-वृत्त में मिलता है।

उनकी राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा और सामाजिक संस्थाओं के निर्माण से जुड़ा था। वे मानते थे कि ग्रामीण और छोटे शहरों में शिक्षा का विस्तार सामाजिक बदलाव के लिए जरूरी है। भिवानी में शैक्षणिक संस्थाओं, विशेषकर महिला शिक्षा को बढ़ावा देने वाली संस्थाओं के विकास में उनका योगदान बताया जाता है। आदर्श महिला महाविद्यालय, भिवानी की संस्थागत सामग्री भी उन्हें संस्थापक अध्यक्ष और महिला शिक्षा के समर्थक के रूप में याद करती है।
हरियाणा विधानसभा में भूमिका और मंत्री पद
हरियाणा राज्य बनने के बाद बनारसी दास गुप्ता राज्य की राजनीति में सक्रिय रहे। वे भिवानी विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। 1972 में विधायक बनने के बाद उन्हें हरियाणा विधानसभा का अध्यक्ष चुना गया। अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका सदन की कार्यवाही और संसदीय परंपराओं के संचालन से जुड़ी रही। बाद में उन्होंने राज्य सरकार में विभिन्न विभागों की जिम्मेदारी संभाली।
राज्यसभा के आधिकारिक जीवनी विवरण में उनके हरियाणा विधानसभा के तीन बार सदस्य चुने जाने, विधानसभा अध्यक्ष, राज्य मंत्री, उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री रहने का उल्लेख है। विभिन्न जीवनी स्रोतों में उनके पास रहे विभागों के विवरण में कुछ भिन्नता है, लेकिन बिजली, सिंचाई, कृषि और स्वास्थ्य जैसे विभागों से उनका जुड़ाव दर्ज किया गया है।
पहला मुख्यमंत्री कार्यकाल: आपातकाल का दौर
1 दिसंबर 1975 को बनारसी दास गुप्ता हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। यह समय देश में आपातकाल का था, जिसकी घोषणा जून 1975 में हुई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल के केंद्र सरकार में जाने के बाद गुप्ता ने राज्य की कमान संभाली। उनका पहला कार्यकाल 1977 तक चला। इस दौरान हरियाणा की राजनीति राष्ट्रीय आपातकाल, केंद्र-राज्य संबंधों और कांग्रेस संगठन की परिस्थितियों से प्रभावित थी।

उनके पहले कार्यकाल की समाप्ति की तारीख को लेकर प्रकाशित स्रोतों में कुछ अंतर दिखाई देता है। कुछ विवरण 30 अप्रैल 1977 बताते हैं, जबकि अन्य स्रोत जून 1977 तक की अवधि दर्ज करते हैं। इसलिए इस लेख में उनके पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल को 1975 से 1977 के रूप में प्रस्तुत किया गया है। 1977 के आम चुनावों के बाद देश में राजनीतिक बदलाव आया और हरियाणा में भी सत्ता परिवर्तन हुआ।
उपमुख्यमंत्री और 1990 में दूसरी बार मुख्यमंत्री
1980 के दशक में हरियाणा की राजनीति में नए गठबंधनों और नेतृत्व का दौर आया। 1987 में जनता दल की सरकार बनने के बाद बनारसी दास गुप्ता उपमुख्यमंत्री बने। इस पद पर रहते हुए उन्होंने राज्य सरकार में प्रशासनिक और राजनीतिक जिम्मेदारियां निभाईं। उनका अनुभव उन्हें हरियाणा की राजनीति के वरिष्ठ नेताओं में स्थापित करता रहा।
22 मई 1990 को वे दूसरी बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। यह कार्यकाल बहुत संक्षिप्त रहा और 12 जुलाई 1990 तक चला। उस समय राज्य की राजनीति में मेहम विधानसभा क्षेत्र से जुड़ी हिंसा और उसके बाद पैदा हुए राजनीतिक संकट के कारण नेतृत्व परिवर्तन हुआ था। गुप्ता को एक अंतरिम या समझौता-आधारित नेतृत्व के रूप में मुख्यमंत्री बनाया गया। कुछ सप्ताह बाद उनकी जगह हुकम सिंह ने पद संभाला। इस छोटे कार्यकाल के बावजूद वे हरियाणा के उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हो गए जिन्होंने दो अलग-अलग राजनीतिक दौर में मुख्यमंत्री पद संभाला।
राज्यसभा में प्रतिनिधित्व और पत्रकारिता
बनारसी दास गुप्ता 10 अप्रैल 1996 से 9 अप्रैल 2002 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। संसद के उच्च सदन में उनका कार्यकाल हरियाणा की राजनीति और राष्ट्रीय विधायी प्रक्रिया से उनके जुड़ाव का अगला चरण था। राज्यसभा के आधिकारिक जीवनी विवरण में उनके राजनीतिक पदों के साथ उनकी पत्रकारिता का भी उल्लेख है।

वे हिंदी साप्ताहिक ‘अपना देश’ और ‘हरियाणा केसरी’ के संपादन से जुड़े रहे। इन पत्रों के माध्यम से राजनीतिक जागरूकता और सामाजिक मुद्दों पर लेखन को बढ़ावा मिला। उनके नाम से ‘पंचायती राज—क्यों और कैसे’ पुस्तक का भी उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि वे केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं थे, बल्कि स्थानीय स्वशासन और जनभागीदारी जैसे विषयों में भी रुचि रखते थे।
सामाजिक सुधार और शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता
उनके सार्वजनिक जीवन का एक उल्लेखनीय पक्ष सामाजिक सुधार था। वे अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के विरोधी बताए जाते हैं। शिक्षा के प्रसार, महिला शिक्षा और स्थानीय संस्थाओं के विकास के लिए उनका समर्थन रहा। भिवानी में प्राकृतिक चिकित्सा और शैक्षणिक संस्थाओं से उनका जुड़ाव भी उनके सामाजिक कार्यों का हिस्सा था। इन गतिविधियों ने उन्हें क्षेत्रीय राजनीति से आगे बढ़कर स्थानीय समाज में एक संस्थागत पहचान दी।
उनकी विरासत का आकलन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी राजनेता के कार्यकाल को उसके समय की राजनीतिक परिस्थितियों, प्रशासनिक सीमाओं और उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर समझा जाना चाहिए। बनारसी दास गुप्ता का पहला मुख्यमंत्री कार्यकाल आपातकाल के दौरान था, जबकि दूसरा कार्यकाल 1990 के राजनीतिक अस्थिरता के दौर में बहुत छोटा रहा। इन दोनों संदर्भों ने उनके शासन की प्रकृति को प्रभावित किया।
निधन और राजनीतिक विरासत
बनारसी दास गुप्ता का निधन 29 अगस्त 2007 को हुआ। उनके निधन पर हरियाणा में शोक व्यक्त किया गया और राज्य के राजनीतिक तथा सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान को याद किया गया। वे स्वतंत्रता आंदोलन से निकले उन नेताओं में थे जिन्होंने रियासतों के दौर से लेकर स्वतंत्र भारत के राज्य-स्तरीय लोकतांत्रिक संस्थानों तक लंबी यात्रा की।

5 नवंबर को उनकी जयंती पर उन्हें याद करना हरियाणा के राजनीतिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को स्मरण करना है। जींद प्रजामंडल आंदोलन में सक्रियता, स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी, विधानसभा अध्यक्ष और मंत्री के रूप में जिम्मेदारी, दो बार मुख्यमंत्री पद तथा राज्यसभा में प्रतिनिधित्व—इन सभी भूमिकाओं ने उनके सार्वजनिक जीवन को आकार दिया। भिवानी में शिक्षा और सामाजिक संस्थाओं से उनका जुड़ाव भी उनकी विरासत का हिस्सा है। बनारसी दास गुप्ता का जीवन इस बात का उदाहरण है कि स्वतंत्रता आंदोलन की पीढ़ी के कई नेताओं ने आजादी के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं और क्षेत्रीय समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
