विशेष लेख | 7 नवंबर | जयंती विशेष | विज्ञान एवं इतिहास
आधुनिक विज्ञान के इतिहास में लिज़ माइटनर का नाम उन वैज्ञानिकों में शामिल है, जिनके योगदान ने परमाणु जगत की समझ बदल दी। परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) की खोज की कहानी केवल प्रयोगशाला में हुई एक रासायनिक उपलब्धि नहीं है; इसमें दशकों का सहयोग, निर्वासन की पीड़ा, वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि और मान्यता से जुड़ा एक जटिल इतिहास भी शामिल है। माइटनर ने अपने भतीजे और भौतिक विज्ञानी ओटो फ्रिश के साथ यूरेनियम के नाभिक के टूटने की भौतिक व्याख्या दी और इस प्रक्रिया को ‘न्यूक्लियर फिशन’ नाम देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वियना में जन्म और शिक्षा की चुनौतियाँ
लिज़ माइटनर का जन्म 7 नवंबर 1878 को वियना में हुआ था, जो उस समय ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य का हिस्सा था। उनका जन्मनाम एलिस माइटनर (Elise Meitner) था। वे यहूदी परिवार में जन्मीं। बचपन से ही गणित और प्राकृतिक विज्ञान में उनकी रुचि थी, लेकिन उस दौर में महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक करियर के अवसर सीमित थे। उन्हें निजी तौर पर पढ़ाई करनी पड़ी और विश्वविद्यालय में प्रवेश पाने के लिए अतिरिक्त तैयारी करनी पड़ी।
1901 में उन्होंने वियना विश्वविद्यालय में भौतिकी और गणित का अध्ययन शुरू किया। 1905 में उन्होंने भौतिकी में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वे वियना विश्वविद्यालय से भौतिकी में डॉक्टरेट पाने वाली शुरुआती महिलाओं में थीं। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने शोध को अपना लक्ष्य बनाया, जबकि उस समय महिलाओं के लिए विश्वविद्यालयों और प्रयोगशालाओं में स्थायी पद हासिल करना आसान नहीं था।

बर्लिन में वैज्ञानिक जीवन और ओटो हान के साथ साझेदारी
1907 में माइटनर बर्लिन पहुँचीं। वहाँ उन्होंने प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी मैक्स प्लांक के व्याख्यानों से जुड़कर अध्ययन किया और रसायनशास्त्री ओटो हान के साथ रेडियोधर्मिता पर शोध-सहयोग शुरू किया। यह साझेदारी लगभग तीन दशकों तक चली। शुरुआती वर्षों में संस्थागत भेदभाव के कारण उन्हें प्रयोगशाला में काम करने के लिए भी असामान्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। महिलाओं को विश्वविद्यालय के कुछ हिस्सों और प्रयोगशालाओं में प्रवेश की अनुमति नहीं थी; माइटनर ने एक पुराने बढ़ईखाने जैसे स्थान में काम करते हुए अपना शोध जारी रखा।
समय के साथ उनकी वैज्ञानिक क्षमता को मान्यता मिली। माइटनर और हान ने रेडियोधर्मी पदार्थों के अध्ययन में कई महत्त्वपूर्ण योगदान दिए। 1918 में उन्होंने फ्रिट्ज़ स्ट्रासमैन सहित सहयोगियों के साथ प्रोटैक्टिनियम तत्व की पहचान में योगदान किया। 1920 के दशक में माइटनर परमाणु भौतिकी की प्रतिष्ठित शोधकर्ता बन चुकी थीं। 1922 में उन्होंने बर्लिन में अपनी योग्यता के आधार पर अध्यापन की उच्च मान्यता प्राप्त की और 1926 में बर्लिन विश्वविद्यालय में भौतिकी की प्रोफेसर बनीं। वे जर्मनी में भौतिकी की पहली महिला पूर्ण प्रोफेसर थीं।
नाजी शासन, यहूदी पहचान और स्वीडन में निर्वासन
1933 में जर्मनी में नाजी शासन के सत्ता में आने के बाद यहूदी मूल के वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों पर दबाव बढ़ा। माइटनर ऑस्ट्रियाई नागरिक होने के कारण कुछ समय तक अपनी नौकरी बचा सकीं, लेकिन मार्च 1938 में ऑस्ट्रिया के जर्मनी में विलय (Anschluss) के बाद उनकी स्थिति असुरक्षित हो गई। जून 1938 में उन्हें जर्मनी छोड़ना पड़ा। वे पहले नीदरलैंड पहुँचीं और फिर स्वीडन चली गईं, जहाँ उन्होंने स्टॉकहोम में वैज्ञानिक काम जारी रखने का प्रयास किया।
निर्वासन के बावजूद माइटनर ने बर्लिन में अपने पुराने सहयोगियों से वैज्ञानिक संपर्क बनाए रखा। यह दौर उनके जीवन का कठिन समय था। जिस प्रयोगशाला और वैज्ञानिक समूह के निर्माण में उन्होंने वर्षों लगाए थे, उससे उन्हें अचानक अलग होना पड़ा। फिर भी उनके वैज्ञानिक विवेक और शोध के प्रति समर्पण ने परमाणु विखंडन की व्याख्या में निर्णायक भूमिका निभाई।

परमाणु विखंडन की खोज: प्रयोग और व्याख्या का अंतर
1930 के दशक में वैज्ञानिक यूरेनियम पर न्यूट्रॉन की बमबारी करके उससे बनने वाले पदार्थों का अध्ययन कर रहे थे। 1938 में बर्लिन में ओटो हान और फ्रिट्ज़ स्ट्रासमैन ने प्रयोगों के बाद ऐसे उत्पादों की पहचान की, जिनमें बेरियम के समस्थानिक शामिल थे। यूरेनियम से बहुत हल्के तत्व का बनना उस समय की परमाणु-समझ के अनुरूप नहीं था। रासायनिक विश्लेषण से परिणाम सामने आ गए थे, लेकिन उनका भौतिक अर्थ स्पष्ट नहीं था।
दिसंबर 1938 के अंत में माइटनर अपने भतीजे ओटो रॉबर्ट फ्रिश से मिलीं। दोनों ने हान के प्रयोगों के परिणामों पर विचार किया और परमाणु के द्रव-बूंद मॉडल की मदद से समझाया कि न्यूट्रॉन ग्रहण करने के बाद यूरेनियम का भारी नाभिक अस्थिर होकर लगभग दो छोटे नाभिकों में विभाजित हो सकता है। इस प्रक्रिया में बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। उन्होंने आइंस्टीन के द्रव्यमान-ऊर्जा संबंध E=mc² के आधार पर ऊर्जा के परिमाण का अनुमान भी लगाया।
फ्रिश ने इस प्रक्रिया के लिए ‘फिशन’ शब्द सुझाया, जो जीवविज्ञान में कोशिका-विभाजन के अर्थ में प्रयुक्त शब्द से लिया गया था। माइटनर और फ्रिश का शोधपत्र 11 फरवरी 1939 को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Nature में प्रकाशित हुआ। इसका शीर्षक था ‘Disintegration of Uranium by Neutrons: a New Type of Nuclear Reaction’। इस लेख ने यूरेनियम नाभिक के टूटने की भौतिक व्याख्या प्रस्तुत की और परमाणु ऊर्जा के नए युग का रास्ता खोला।
इसलिए परमाणु विखंडन के इतिहास में योगदान को अलग-अलग चरणों में समझना चाहिए: हान और स्ट्रासमैन ने प्रयोगों में विखंडन-उत्पादों का रासायनिक प्रमाण स्थापित किया; माइटनर और फ्रिश ने नाभिक के विभाजन की सैद्धांतिक व्याख्या की और ऊर्जा-मुक्ति का अर्थ स्पष्ट किया। यह एक सामूहिक वैज्ञानिक उपलब्धि थी, न कि किसी एक व्यक्ति की अकेली खोज।

नोबेल पुरस्कार से वंचित रहना और बाद की मान्यता
1944 का रसायन विज्ञान नोबेल पुरस्कार ओटो हान को यूरेनियम के विखंडन से संबंधित खोज के लिए दिया गया। माइटनर और फ्रिश को उस पुरस्कार में शामिल नहीं किया गया। इतिहासकारों और विज्ञान संस्थानों ने बाद में इस निर्णय पर गंभीर सवाल उठाए हैं, क्योंकि विखंडन की भौतिक व्याख्या और उसके महत्त्व को समझने में माइटनर की भूमिका केंद्रीय थी। उन्हें जीवनकाल में कई बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया, लेकिन यह सम्मान उन्हें नहीं मिला।
हालाँकि, उनके योगदान को अन्य प्रतिष्ठित सम्मानों से मान्यता मिली। 1949 में उन्हें मैक्स प्लांक पदक और 1966 में ओटो हान तथा फ्रिट्ज़ स्ट्रासमैन के साथ एनरिको फर्मी पुरस्कार प्रदान किया गया। 109वें रासायनिक तत्व का नाम ‘माइटनेरियम’ (Meitnerium, Mt) उनके सम्मान में रखा गया। यह नामकरण उनके वैज्ञानिक योगदान की स्थायी स्मृति है।
परमाणु बम और वैज्ञानिक नैतिकता
परमाणु विखंडन की खोज ने ऊर्जा उत्पादन और परमाणु हथियारों—दोनों के विकास की संभावनाएँ खोल दीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान माइटनर को अमेरिका के मैनहैटन प्रोजेक्ट से जुड़ने का निमंत्रण दिया गया, लेकिन उन्होंने परमाणु बम निर्माण में भाग लेने से इनकार कर दिया। वे अपने वैज्ञानिक कार्य के सैन्य उपयोग से दूरी बनाए रखना चाहती थीं। उनका निर्णय विज्ञान और वैज्ञानिकों की नैतिक जिम्मेदारी पर होने वाली चर्चाओं में आज भी उल्लेखनीय माना जाता है।
अंतिम वर्ष और विरासत
माइटनर ने युद्ध के बाद भी स्वीडन और अन्य देशों में वैज्ञानिक संवाद, व्याख्यान और शोध से जुड़े कार्य जारी रखे। जीवन के अंतिम वर्षों में वे इंग्लैंड चली गईं। 27 अक्टूबर 1968 को कैम्ब्रिज में उनका निधन हुआ। वे अपने 90वें जन्मदिन से कुछ ही दिन पहले दुनिया से विदा हुईं।

लिज़ माइटनर का जीवन विज्ञान में प्रतिभा के साथ-साथ संस्थागत समानता, सहयोग और नैतिक विवेक का उदाहरण है। उन्होंने ऐसे समय में भौतिकी में अपना स्थान बनाया, जब महिलाओं के लिए वैज्ञानिक संस्थानों के दरवाजे पूरी तरह खुले नहीं थे। परमाणु विखंडन की व्याख्या में उनकी भूमिका ने आधुनिक परमाणु भौतिकी को दिशा दी, लेकिन उनका इतिहास यह भी याद दिलाता है कि वैज्ञानिक उपलब्धियों की मान्यता हमेशा निष्पक्ष या समय पर नहीं मिलती। 7 नवंबर को उनकी जयंती पर उन्हें याद करना विज्ञान में महिलाओं के योगदान और ज्ञान की खोज में साहस, सहयोग तथा स्वतंत्र चिंतन के महत्त्व को सम्मान देना है।
