इतिहास | 6 नवंबर | राजनीति | पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 6 नवंबर 2000 एक महत्वपूर्ण सत्ता हस्तांतरण का दिन था। देश के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले ज्योति बसु ने 1977 से चली आ रही अपनी 23 वर्ष से अधिक की मुख्यमंत्री पारी के बाद पद छोड़ा और उसी दिन बुद्धदेव भट्टाचार्य ने नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। बसु के पद छोड़ने की प्रक्रिया अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में घोषित हुई थी; संसदीय अभिलेख में 29 अक्टूबर को उनके इस्तीफे का उल्लेख है, जबकि राज्य की कार्यकाल सूची में उनका कार्यकाल 5 नवंबर तक और उत्तराधिकारी का शपथग्रहण 6 नवंबर को दर्ज है।
एक लंबे राजनीतिक दौर का अंत
ज्योति बसु का मुख्यमंत्री पद छोड़ना भारतीय राजनीति की उन विरल घटनाओं में शामिल है, जब किसी लंबे समय तक सत्ता में रहे नेता ने स्वास्थ्य और उम्र से जुड़ी कठिनाइयों के कारण पद छोड़ने का फैसला किया। उनका कार्यकाल 21 जून 1977 को शुरू हुआ था। वे लगातार पांच बार वाम मोर्चा सरकार के मुख्यमंत्री बने और 2000 में पद छोड़ने तक 23 वर्ष से अधिक समय तक पश्चिम बंगाल का नेतृत्व किया। उस समय वे भारत के सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले मुख्यमंत्री थे।
उनके उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य ने 6 नवंबर 2000 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस बदलाव के साथ पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा शासन का नेतृत्व एक नई पीढ़ी के हाथों में आया, हालांकि ज्योति बसु पार्टी और सार्वजनिक जीवन में प्रभावशाली वरिष्ठ नेता बने रहे।

लंदन से बंगाल की राजनीति तक ज्योति बसु का सफर
ज्योति बसु का जन्म 8 जुलाई 1914 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उनका मूल नाम ज्योतिरिंद्र बसु था। उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। आगे की पढ़ाई के लिए वे लंदन गए और मिडिल टेंपल से बैरिस्टर-एट-लॉ की योग्यता हासिल की। ब्रिटेन में रहते हुए वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े संगठनों और वामपंथी विचारधारा के संपर्क में आए।
भारत लौटने के बाद उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से जुड़कर श्रमिक आंदोलन में काम किया। रेलवे कर्मचारियों और ट्रेड यूनियन संगठनों के बीच उनकी सक्रियता ने उन्हें बंगाल की राजनीति में पहचान दिलाई। 1946 में वे बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए। स्वतंत्रता के बाद भी वे विधानसभा में लगातार सक्रिय रहे और 1957 से 1967 तक पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे।
1967 और 1969 में संयुक्त मोर्चा सरकारों के दौरान उन्होंने उपमुख्यमंत्री के रूप में भी काम किया। 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)—CPI(M)—के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य बने।
21 जून 1977: वाम मोर्चा सरकार का उदय
1977 के विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चा ने जीत हासिल की और 21 जून को ज्योति बसु ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में निर्णायक मोड़ था। कांग्रेस शासन और राजनीतिक अस्थिरता के बाद वाम मोर्चा ने राज्य में एक स्थायी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित की। बसु के नेतृत्व में गठबंधन ने लगातार चुनाव जीतकर शासन किया।

उनकी सरकार की प्रमुख पहलों में भूमि सुधार और ग्रामीण स्थानीय शासन को मजबूत करना शामिल था। ‘ऑपरेशन बर्गा’ के तहत बटाईदार किसानों के अधिकारों को दर्ज करने और उन्हें सुरक्षा देने की कोशिश हुई। भूमि सुधारों ने ग्रामीण बंगाल की राजनीति और सामाजिक संरचना को प्रभावित किया। पंचायत व्यवस्था को अधिक सक्रिय बनाने से ग्रामीण स्तर पर राजनीतिक भागीदारी और विकेंद्रीकरण को बल मिला।
इन नीतियों को उनके समर्थक ग्रामीण गरीबों और किसानों को राजनीतिक तथा आर्थिक आवाज देने वाली पहल मानते हैं। वहीं आलोचकों ने समय के साथ प्रशासनिक जड़ता, औद्योगिक निवेश में कमी, रोजगार के अवसरों और राज्य की आर्थिक दिशा पर सवाल उठाए। ज्योति बसु के लंबे कार्यकाल का मूल्यांकन इन उपलब्धियों और आलोचनाओं—दोनों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
1996 का प्रधानमंत्री पद और ‘ऐतिहासिक भूल’
ज्योति बसु के राजनीतिक जीवन का एक चर्चित प्रसंग 1996 का लोकसभा चुनाव है। उस चुनाव के बाद गैर-कांग्रेस और गैर-भाजपा दलों के संयुक्त मोर्चे की सरकार बनाने की संभावना बनी। बसु को प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वसम्मति से स्वीकार किए जाने की चर्चा हुई, लेकिन CPI(M) के केंद्रीय नेतृत्व ने सरकार में शामिल न होने का निर्णय लिया। पार्टी के निर्णय के कारण बसु ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं किया।
बाद में उन्होंने इस निर्णय को ‘ऐतिहासिक भूल’ कहा। यह प्रसंग उनके राष्ट्रीय कद और भारतीय वामपंथ की रणनीतिक बहस का प्रतीक बन गया। मुख्यमंत्री के रूप में वे राज्य की राजनीति में केंद्र में रहे, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भी गठबंधन राजनीति के महत्वपूर्ण वार्ताकार माने जाते थे।

स्वास्थ्य कारणों से पद छोड़ने का निर्णय
2000 में ज्योति बसु 87 वर्ष के थे। उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण मुख्यमंत्री कार्यालय की नियमित जिम्मेदारियां निभाना उनके लिए कठिन होता जा रहा था। सितंबर 2000 में दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि वे लंबे समय से अस्वस्थ महसूस कर रहे हैं और मुख्यमंत्री सचिवालय के कामकाज का दबाव अब पहले की तरह संभालना आसान नहीं रहा। उन्होंने पार्टी नेतृत्व से पद छोड़ने की इच्छा जताई थी, लेकिन पार्टी ने उत्तराधिकारी और संगठनात्मक प्रक्रिया को देखते हुए उनसे कुछ समय तक बने रहने का आग्रह किया।
27 अक्टूबर 2000 को उन्होंने सार्वजनिक रूप से पद छोड़ने की तारीख की घोषणा की। उस समय की रिपोर्टों में बताया गया कि पार्टी ने उनके लंबे समय से लंबित आग्रह को स्वीकार कर लिया था। संसदीय प्रकाशन ‘Parliamentary and Constitutional Developments’ में 29 अक्टूबर को उनके इस्तीफे का उल्लेख है। राज्य की मुख्यमंत्री कार्यकाल सूची में उनका कार्यकाल 5 नवंबर 2000 तक दर्ज है और 6 नवंबर को बुद्धदेव भट्टाचार्य का शपथग्रहण दर्ज है। ज्योति बसु के आधिकारिक अभिलेख में भी 6 नवंबर को मुख्यमंत्री पद छोड़ने की तारीख बताया गया है। इस तरह अक्टूबर में निर्णय और इस्तीफे की प्रक्रिया तथा नवंबर में पद का औपचारिक हस्तांतरण—दोनों को अलग-अलग समझना चाहिए।
बुद्धदेव भट्टाचार्य को मिली जिम्मेदारी
6 नवंबर 2000 को बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वे ज्योति बसु सरकार में लंबे समय तक मंत्री रहे थे और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते थे। उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ वाम मोर्चा शासन की निरंतरता बनी रही, लेकिन नेतृत्व की शैली और राज्य की आर्थिक प्राथमिकताओं को लेकर नई बहसें भी शुरू हुईं। बसु ने सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई; वे पार्टी के वरिष्ठ मार्गदर्शक और राज्य की राजनीति के प्रभावशाली व्यक्तित्व बने रहे।
ज्योति बसु की विरासत: उपलब्धियां, आलोचनाएं और राजनीतिक प्रभाव
ज्योति बसु की विरासत कई स्तरों पर देखी जाती है। एक ओर भूमि सुधार, बटाईदारों के अधिकार और पंचायतों को मजबूत करने के प्रयास उनके शासन की पहचान बने। दूसरी ओर, लंबे शासन के अंतिम वर्षों में औद्योगिक विकास, निवेश, प्रशासनिक जवाबदेही और रोजगार के सवालों पर उनकी सरकार की आलोचना हुई। बंगाल की राजनीति में वाम मोर्चा की मजबूत संगठनात्मक पकड़ और ग्रामीण आधार को समझने के लिए बसु के कार्यकाल का अध्ययन महत्वपूर्ण है।

उनका व्यक्तित्व गठबंधन राजनीति, संघीय ढांचे और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों के बीच संवाद का भी प्रतीक रहा। वे 2010 में अपने निधन तक CPI(M) के वरिष्ठ नेताओं में बने रहे। 17 जनवरी 2010 को कोलकाता में उनका निधन हुआ। उनके लंबे सार्वजनिक जीवन ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा उदाहरण स्थापित किया जिसमें वैचारिक प्रतिबद्धता, संगठनात्मक अनुशासन और संसदीय राजनीति साथ-साथ दिखाई दिए।
6 नवंबर 2000 का ऐतिहासिक महत्व
6 नवंबर 2000 को ज्योति बसु के लंबे मुख्यमंत्री कार्यकाल का औपचारिक समापन और बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व की शुरुआत हुई। यह केवल एक व्यक्ति का पद छोड़ना नहीं था, बल्कि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा शासन के भीतर पीढ़ीगत नेतृत्व परिवर्तन का क्षण था। बसु ने 23 वर्ष से अधिक समय तक राज्य का नेतृत्व किया—एक ऐसा रिकॉर्ड जिसने उन्हें भारतीय राज्यों के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं में विशिष्ट स्थान दिया।
इस घटनाक्रम को याद करते समय इस्तीफे की घोषणा, औपचारिक प्रक्रिया और उत्तराधिकारी के शपथग्रहण की तारीखों में अंतर समझना जरूरी है। ज्योति बसु का राजनीतिक सफर और 6 नवंबर 2000 का सत्ता हस्तांतरण भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में लंबे शासन, पार्टी नेतृत्व और स्वास्थ्य के कारण स्वैच्छिक पदत्याग का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
