विशेष दिवस | 6 नवंबर | अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण | युद्ध और शांति
युद्ध में केवल सैनिक और नागरिक ही नहीं, प्रकृति भी घायल होती है। बमबारी, आग, खनन, जंगलों की कटाई, जलस्रोतों का प्रदूषण, तेल और रासायनिक पदार्थों का रिसाव तथा बारूदी सुरंगों के अवशेष दशकों तक भूमि, वन्यजीवों और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। इसी अनदेखे नुकसान के प्रति वैश्विक चेतना बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 5 नवंबर 2001 को प्रस्ताव A/RES/56/4 स्वीकार किया और हर वर्ष 6 नवंबर को युद्ध एवं सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया।
युद्ध का एक अनदेखा शिकार: प्राकृतिक पर्यावरण
युद्ध की चर्चा प्रायः मानवीय हताहतों, विस्थापन, शहरों के विनाश और आर्थिक नुकसान तक सीमित रहती है। लेकिन संघर्ष का एक बड़ा और लंबे समय तक रहने वाला असर प्राकृतिक पर्यावरण पर पड़ता है। जंगल जलते हैं, कृषि भूमि बंजर या दूषित हो सकती है, नदियों और भूजल में तेल, ईंधन, विस्फोटकों तथा औद्योगिक रसायनों के अवशेष पहुंच सकते हैं। वन्यजीवों के आवास नष्ट होते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ता है।
कई बार पर्यावरण को सीधे सैन्य उद्देश्य के लिए निशाना बनाया जाता है, तो कई बार नुकसान सैन्य गतिविधियों के अप्रत्यक्ष परिणाम के रूप में होता है। सैन्य ठिकानों, ऊर्जा संयंत्रों, तेल भंडारों, कारखानों, बांधों, पुलों और परिवहन नेटवर्क पर हमले से प्रदूषण फैल सकता है। विस्फोटों और आग से निकले धुएं का असर हवा की गुणवत्ता पर पड़ता है, जबकि मलबे और खतरनाक पदार्थ मिट्टी तथा जल स्रोतों को दूषित कर सकते हैं। युद्ध समाप्त होने के बाद भी इनका असर बना रह सकता है।

6 नवंबर को यह अंतरराष्ट्रीय दिवस क्यों मनाया जाता है?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 5 नवंबर 2001 को अपने 56वें सत्र की 37वीं पूर्ण बैठक में प्रस्ताव A/RES/56/4 को बिना मतदान के स्वीकार किया। प्रस्ताव में कहा गया कि सशस्त्र संघर्ष के समय पर्यावरण को होने वाला नुकसान पारिस्थितिकी तंत्र और प्राकृतिक संसाधनों को संघर्ष समाप्त होने के बहुत बाद तक प्रभावित कर सकता है। इसका प्रभाव राष्ट्रीय सीमाओं से आगे और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकता है।
इसी प्रस्ताव के माध्यम से महासभा ने प्रत्येक वर्ष 6 नवंबर को International Day for Preventing the Exploitation of the Environment in War and Armed Conflict मनाने की घोषणा की। इस दिवस का उद्देश्य सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, सैन्य संस्थाओं, नागरिक समाज और आम जनता को यह याद दिलाना है कि युद्ध के दौरान पर्यावरण की रक्षा भी मानवीय सुरक्षा और स्थायी शांति का अनिवार्य हिस्सा है। संयुक्त राष्ट्र डिजिटल लाइब्रेरी में प्रस्ताव के दस्तावेज की प्रकाशन-तिथि 13 नवंबर 2001 दर्ज है, जबकि महासभा की कार्रवाई 5 नवंबर की है—दोनों तिथियां अलग-अलग प्रशासनिक संदर्भ रखती हैं।
युद्ध से पर्यावरण को किस तरह नुकसान पहुंचता है?
1. जंगलों और जैव-विविधता का विनाश
सैन्य अभियानों के लिए वनस्पति हटाना, जंगलों में आग लगना, बमबारी और विस्फोट वन्यजीवों के आवास को नष्ट कर सकते हैं। संघर्ष के दौरान वन्यजीव संरक्षण की निगरानी और वन विभाग जैसी संस्थाओं की क्षमता कमजोर पड़ती है। इससे अवैध शिकार, लकड़ी की तस्करी और अनियंत्रित खनन को बढ़ावा मिल सकता है। दुर्लभ प्रजातियों के लिए यह खतरा और गंभीर होता है, क्योंकि उनके आवास पहले से सीमित हो सकते हैं।
2. जलस्रोतों का प्रदूषण और जल संकट
नदियां, झीलें, भूजल और समुद्री तट युद्ध के दौरान कई तरह से प्रभावित होते हैं। जल शोधन संयंत्र, पंपिंग स्टेशन, सीवेज नेटवर्क और बांध क्षतिग्रस्त होने पर स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति बाधित हो सकती है। ईंधन, तेल, भारी धातुएं, विस्फोटक अवशेष और औद्योगिक रसायन जल में मिल जाएं तो मनुष्यों के साथ मछलियों, जलीय पौधों और अन्य जीवों को भी नुकसान पहुंचता है। पानी की कमी और प्रदूषण विस्थापित आबादी तथा स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य संकट को बढ़ा सकते हैं।

3. कृषि भूमि और खाद्य सुरक्षा पर असर
बमबारी, आग, सैन्य वाहनों की आवाजाही, खाइयां और बारूदी सुरंगें खेतों को अनुपयोगी बना सकती हैं। मिट्टी में ईंधन, धातु या रासायनिक अवशेष जमा होने से उसकी गुणवत्ता और खेती की क्षमता प्रभावित होती है। सिंचाई व्यवस्था तथा भंडारण सुविधाओं के नष्ट होने से खाद्य उत्पादन और वितरण बाधित होता है। युद्ध के बाद भी जब तक भूमि की जांच और सफाई नहीं होती, किसान सुरक्षित रूप से खेतों में लौट नहीं पाते।
4. बारूदी सुरंगें और बिना फटे विस्फोटक
बारूदी सुरंगें, क्लस्टर हथियारों के अवशेष और बिना फटे गोला-बारूद मानव जीवन के साथ पर्यावरण के लिए भी लंबे समय तक खतरा बने रहते हैं। ये खेतों, जंगलों और जलाशयों के आसपास मौजूद रह सकते हैं। इनके कारण वन प्रबंधन, खेती, पशुपालन और पुनर्वास कार्य बाधित होते हैं। विस्फोटक अवशेषों को हटाने की प्रक्रिया जटिल, महंगी और समय लेने वाली होती है।
5. हवा का प्रदूषण और जलवायु पर प्रभाव
तेल कुओं, रिफाइनरियों, रासायनिक संयंत्रों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों में आग लगने से बड़ी मात्रा में धुआं और हानिकारक पदार्थ वातावरण में फैल सकते हैं। सैन्य गतिविधियों में ईंधन की खपत तथा हथियारों और उपकरणों के निर्माण-परिवहन से भी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है। संघर्ष के कारण ऊर्जा और औद्योगिक ढांचे का विनाश पर्यावरणीय दबाव को और बढ़ा सकता है।
इतिहास से सबक: युद्ध के पर्यावरणीय परिणाम
वियतनाम युद्ध के दौरान वनस्पति नष्ट करने के लिए रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल और उसके दीर्घकालिक प्रभावों ने दुनिया का ध्यान युद्ध तथा पर्यावरण के संबंध पर केंद्रित किया। इससे वन, मिट्टी, जल और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले असर को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ी। 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान कुवैत में तेल कुओं में लगी आग और समुद्र में तेल रिसाव ने बड़े पैमाने पर वायु और समुद्री प्रदूषण की गंभीरता दिखाई।

हाल के संघर्षों में भी पर्यावरणीय नुकसान की तस्वीर सामने आई है। यूक्रेन में बारूदी सुरंगों, गोलाबारी, जंगलों में आग और औद्योगिक सुविधाओं को नुकसान से मिट्टी, जल और वन पारिस्थितिकी प्रभावित हुई है। गाजा में जल, सीवेज, ठोस कचरा और कृषि ढांचे को भारी क्षति ने पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के संकट को और गंभीर बनाया है। इन उदाहरणों का उद्देश्य किसी एक पक्ष पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि यह समझना है कि संघर्ष की परिस्थितियों में पर्यावरणीय जोखिम किस तरह आम नागरिकों और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचते हैं।
प्राकृतिक संसाधन: संघर्ष का कारण भी, परिणाम भी
प्राकृतिक संसाधनों और सशस्त्र संघर्ष के बीच संबंध जटिल है। तेल, गैस, खनिज, लकड़ी और बहुमूल्य पत्थरों जैसे संसाधनों पर नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा कुछ संघर्षों को वित्तीय या राजनीतिक आधार दे सकती है। दूसरी ओर, पानी की कमी, भूमि क्षरण, सूखा और संसाधनों तक असमान पहुंच पहले से मौजूद सामाजिक तनावों को बढ़ा सकते हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि पर्यावरणीय संकट अकेले ही युद्ध का कारण बनता है; लेकिन संसाधनों का अनुचित दोहन और पर्यावरणीय असुरक्षा संघर्ष को बढ़ाने या लंबा खींचने वाले कारक बन सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, पिछले छह दशकों में हुए आंतरिक संघर्षों में कम-से-कम 40 प्रतिशत का संबंध प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से रहा है—चाहे वे उच्च मूल्य वाले संसाधन हों या दुर्लभ जल और उपजाऊ भूमि। संसाधनों से जुड़े संघर्षों के दोबारा भड़कने की संभावना भी अधिक पाई गई है। यह आंकड़ा पर्यावरण संरक्षण को शांति स्थापना और संघर्ष-निवारण की नीति से जोड़ने की आवश्यकता बताता है।
युद्ध में पर्यावरण की रक्षा: अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?
अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (International Humanitarian Law— IHL) युद्ध के दौरान नागरिकों और नागरिक वस्तुओं की रक्षा के साथ प्राकृतिक पर्यावरण को भी संरक्षण देता है। 1977 के जिनेवा कन्वेंशन के अतिरिक्त प्रोटोकॉल-I के अनुच्छेद 35(3) और 55 में ऐसे युद्ध के तरीकों और साधनों पर रोक का प्रावधान है जिनसे प्राकृतिक पर्यावरण को व्यापक, दीर्घकालिक और गंभीर क्षति पहुंचाने की मंशा हो या ऐसी क्षति की आशंका हो। अनुच्छेद 55 विशेष रूप से आबादी के स्वास्थ्य और अस्तित्व पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखता है।

अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के सामान्य सिद्धांत—जैसे सैन्य लक्ष्य और नागरिक वस्तुओं के बीच अंतर करना, हमले में अनुपातिकता बरतना और सावधानी रखना—पर्यावरण को भी सुरक्षा प्रदान करते हैं। प्राकृतिक पर्यावरण सामान्यतः नागरिक प्रकृति का होता है; उसे केवल इसलिए निशाना नहीं बनाया जा सकता कि वह किसी क्षेत्र में मौजूद है। किसी हमले के संभावित पर्यावरणीय परिणामों को भी कानूनी आकलन में ध्यान में रखना पड़ता है।
1976 का पर्यावरण संशोधन तकनीकों के सैन्य या अन्य शत्रुतापूर्ण उपयोग के निषेध संबंधी कन्वेंशन (ENMOD) भी एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता है। यह व्यापक, दीर्घकालिक या गंभीर प्रभाव उत्पन्न करने वाले पर्यावरण संशोधन उपायों के शत्रुतापूर्ण उपयोग पर रोक लगाता है। इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग ने 2019 में सशस्त्र संघर्ष से संबंधित पर्यावरण संरक्षण के लिए मसौदा सिद्धांतों को अपनाया, जिनका उद्देश्य संघर्ष से पहले, संघर्ष के दौरान और संघर्ष के बाद पर्यावरणीय सुरक्षा को मजबूत करना है।
संघर्ष समाप्त होने के बाद भी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती
युद्धविराम या शांति समझौते के बाद पर्यावरणीय संकट अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। दूषित मिट्टी और जल की जांच, बारूदी सुरंगों तथा विस्फोटक अवशेषों को हटाना, जंगलों का पुनर्जीवन, वन्यजीव आवासों की बहाली और क्षतिग्रस्त जल-स्वच्छता प्रणालियों का पुनर्निर्माण लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रियाएं हैं। इनके लिए वैज्ञानिक आकलन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, वित्तीय संसाधन और पारदर्शी प्रशासन जरूरी हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम 1999 से संघर्ष के बाद प्रभावित देशों में पर्यावरणीय आकलन करता रहा है। ऐसे आकलन से प्रदूषण के स्रोत, प्रभावित पारिस्थितिकी तंत्र, सार्वजनिक स्वास्थ्य के खतरे और पुनर्बहाली की प्राथमिकताएं पहचानी जा सकती हैं। पर्यावरणीय पुनर्निर्माण को शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनाना इसलिए जरूरी है कि प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर समुदाय आजीविका फिर से शुरू कर सकें और संसाधनों को लेकर नए तनाव न पैदा हों।

भारत के संदर्भ में पर्यावरणीय सुरक्षा का महत्व
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए पर्यावरणीय सुरक्षा का प्रश्न सीमावर्ती क्षेत्रों, नदियों, हिमालयी पारिस्थितिकी, तटीय क्षेत्रों, जंगलों और जैव-विविधता से जुड़ा है। सीमा पर तनाव या सैन्य गतिविधियों के दौरान संवेदनशील पर्वतीय भूभाग, वन क्षेत्र और जलस्रोत प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे क्षेत्रों में सड़क, सुरंग, सैन्य प्रतिष्ठान और अन्य निर्माण कार्यों की योजना बनाते समय पर्यावरणीय जोखिम, आपदा-संवेदनशीलता और स्थानीय समुदायों की आजीविका को ध्यान में रखना आवश्यक है।
भारत की आपदा प्रबंधन, वन संरक्षण, जल सुरक्षा और सीमा क्षेत्र विकास नीतियों में पर्यावरणीय आकलन और पारिस्थितिक पुनर्बहाली को समन्वित करना दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए उपयोगी है। पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्रीय सुरक्षा के विरोध में नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा, संसाधन सुरक्षा और स्थायी विकास के सहयोगी के रूप में देखना चाहिए।
इस अंतरराष्ट्रीय दिवस का संदेश
6 नवंबर का यह दिवस केवल युद्ध में नष्ट हुए जंगलों, नदियों और वन्यजीवों को याद करने का अवसर नहीं है। यह सरकारों और संघर्षरत पक्षों को उनके कानूनी दायित्वों की याद दिलाता है; अंतरराष्ट्रीय संगठनों को पर्यावरणीय निगरानी और पुनर्बहाली मजबूत करने के लिए प्रेरित करता है; और नागरिक समाज को शांति, जवाबदेही तथा प्रकृति संरक्षण के बीच संबंध समझने का अवसर देता है।
युद्ध का पर्यावरणीय नुकसान सीमाओं में कैद नहीं रहता। प्रदूषित नदी नीचे की ओर बसे समुदायों को प्रभावित कर सकती है, जंगलों का विनाश जलवायु और जैव-विविधता पर असर डाल सकता है, और दूषित भूमि आने वाली पीढ़ियों की खाद्य सुरक्षा को कमजोर कर सकती है। इसलिए पर्यावरण की रक्षा केवल युद्ध के समय की चिंता नहीं, बल्कि संघर्ष रोकने, शांति स्थापित करने और पुनर्निर्माण की साझा जिम्मेदारी है।

स्थायी शांति का अर्थ केवल हथियारों का शांत होना नहीं, बल्कि उन प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्रों का सुरक्षित रहना भी है जिन पर मानव जीवन निर्भर करता है।
