नई दिल्ली: पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार इलाके के एक स्कूल में तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली नौ वर्षीय बच्ची की अचानक मौत ने बच्चों की हृदय सेहत और स्कूलों में आपात चिकित्सा व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है। बुधवार, 4 नवंबर को बच्ची कक्षा में अचानक अचेत होकर गिर गई। स्कूल प्रबंधन की ओर से मौत की वजह हार्ट अटैक बताई गई, जबकि पुलिस की जांच और पोस्टमार्टम से जुड़ी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मृत्यु का सटीक चिकित्सकीय कारण स्पष्ट हो सकेगा।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, कक्षा में लगे सीसीटीवी फुटेज में बच्ची के अचानक गिरने और शिक्षिका के उसे उठाकर कुर्सी पर बैठाने की कोशिश करने का दृश्य सामने आया है। बच्ची को अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। इस घटना के बाद यह सवाल उठ रहा है कि बच्चों में अचानक बेहोशी या हृदय संबंधी आपात स्थिति के संकेतों को कैसे पहचाना जाए और स्कूलों में ऐसी स्थिति से निपटने के लिए किस तरह की तैयारी होनी चाहिए।
NCRB के आंकड़े: 2024 में 18 साल से कम उम्र के 314 मामले
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट ‘Accidental Deaths & Suicides in India 2024’ में अचानक हुई मौतों के कारणों का वर्गीकरण किया गया है। रिपोर्ट की आयु-आधारित तालिका के मुताबिक, वर्ष 2024 में 14 वर्ष से कम आयु वर्ग में हार्ट अटैक के 141 और 14 से 18 वर्ष से कम आयु वर्ग में 173 मौतें दर्ज की गईं। इस तरह इन दोनों आयु वर्गों को जोड़ने पर 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और किशोरों में 314 मौतें हार्ट अटैक के रूप में दर्ज हैं। ये आंकड़े राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की पुलिस से प्राप्त सूचनाओं पर आधारित हैं।
इन आंकड़ों को बच्चों में हार्ट अटैक की व्यापकता का पूर्ण चिकित्सकीय सर्वेक्षण नहीं माना जाना चाहिए। NCRB की रिपोर्ट आकस्मिक मौतों के पुलिस-आधारित रिकॉर्ड संकलित करती है। रिपोर्ट में ‘अचानक मौत’ की श्रेणी में हार्ट अटैक के साथ अन्य कारण भी अलग दर्ज किए गए हैं। इसलिए आंकड़ों को सावधानी से पढ़ना जरूरी है। फिर भी कम उम्र के लोगों से जुड़े ये मामले परिवारों, स्कूलों और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए समय पर पहचान और आपात प्रतिक्रिया की अहमियत दिखाते हैं।

बच्चों में किन संकेतों को नजरअंदाज न करें
बच्चों में हृदय संबंधी समस्या हमेशा वयस्कों जैसी शिकायतों के रूप में सामने आए, यह जरूरी नहीं। कुछ संकेतों पर ध्यान देना चाहिए, खासकर जब वे बार-बार हों या खेल-कूद और शारीरिक मेहनत के दौरान दिखाई दें।
- दौड़ने या खेलते समय असामान्य सांस फूलना या जल्दी थक जाना।
- सीने में दर्द, दबाव या बेचैनी, विशेषकर व्यायाम के दौरान।
- तेज या अनियमित धड़कन महसूस होना।
- खेलते समय या शारीरिक गतिविधि के दौरान चक्कर आना अथवा बेहोश होना।
- बिना स्पष्ट कारण के बार-बार कमजोरी, सांस लेने में परेशानी या अचानक अचेत होना।
इन लक्षणों का मतलब हर बार हृदय रोग होना नहीं है, लेकिन इन्हें केवल कमजोरी या थकान मानकर टालना भी उचित नहीं। अचानक बेहोशी, सांस न आना, प्रतिक्रिया न देना या सामान्य रूप से सांस नहीं लेना आपात स्थिति है। ऐसी स्थिति में तुरंत आपात चिकित्सा सेवा को बुलाना चाहिए और प्रशिक्षित व्यक्ति उपलब्ध हो तो CPR शुरू कराना चाहिए। स्कूलों में प्राथमिक उपचार, CPR और AED उपकरण के इस्तेमाल का प्रशिक्षण उपयोगी हो सकता है।
परिवार में बीमारी का इतिहास हो तो डॉक्टर से सलाह
बच्चों के नियमित स्वास्थ्य परीक्षण में उनकी गतिविधियों, सांस लेने की क्षमता, बेहोशी के पुराने अनुभव और धड़कन से जुड़ी शिकायतों की जानकारी डॉक्टर को देना चाहिए। परिवार में कम उम्र में अचानक हृदय मृत्यु, जन्मजात हृदय रोग या गंभीर हृदय समस्या का इतिहास हो तो इसे चिकित्सक से साझा करना जरूरी है। खेलकूद के दौरान बेहोशी या सीने में दर्द होने पर बच्चे को जांच कराए बिना दोबारा कठिन शारीरिक गतिविधि में नहीं भेजना चाहिए। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर ECG या अन्य जांच की सलाह दे सकते हैं। हर बच्चे के लिए एक ही जांच जरूरी है, ऐसा नहीं है।
खानपान और दिनचर्या में क्या रखें ध्यान
बच्चों को संतुलित भोजन देना, फल-सब्जियां और पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल करना, अत्यधिक नमक, मीठे पेय और बहुत अधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को सीमित रखना अच्छी आदतें हैं। उम्र के अनुसार नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और तंबाकू या निकोटीन के धुएं से दूर वातावरण भी स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। हालांकि स्वस्थ खानपान और व्यायाम जन्मजात या आनुवंशिक हृदय रोगों को पूरी तरह रोकने की गारंटी नहीं देते। इसलिए जीवनशैली के साथ जरूरी चिकित्सकीय जांच और लक्षणों पर ध्यान भी महत्वपूर्ण है।

स्कूलों की आपात तैयारी भी उतनी ही जरूरी
स्कूलों में प्रशिक्षित प्राथमिक उपचार कर्मी, नजदीकी अस्पताल से संपर्क व्यवस्था, आपातकालीन परिवहन और शिक्षकों को CPR का प्रशिक्षण देने पर जोर दिया जाना चाहिए। किसी बच्चे के अचानक गिरने पर उसे केवल कुर्सी पर बैठाने या पानी पिलाने तक सीमित रहने के बजाय उसकी प्रतिक्रिया और सांस की स्थिति देखना तथा तुरंत चिकित्सा सहायता बुलाना जरूरी होता है।
शिवहर, मुजफ्फरपुर और मुंगेर से बच्चों में अचानक हृदय संबंधी घटनाओं की खबरों का उल्लेख भी चर्चा में किया जा रहा है, लेकिन इन अलग-अलग मामलों के कारणों की पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट के बिना नहीं की जा सकती। विशेष रूप से तेज डीजे की आवाज, खेल या किसी गतिविधि को सीधे मौत का कारण बताना जांच और चिकित्सकीय प्रमाण के बिना उचित नहीं होगा। दिल्ली की घटना में भी अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक जांच के बाद ही सामने आएगा।
कम उम्र में अचानक मौत की हर घटना परिवार और समाज को झकझोरती है। ऐसे मामलों में अफवाह या डर फैलाने के बजाय भरोसेमंद चिकित्सकीय सलाह, लक्षणों की समय पर पहचान और स्कूलों में आपातकालीन तैयारी पर ध्यान देना अधिक जरूरी है।
