Lifestyle: पहले अपनी बात रखने से पहले माफी मांगती थी, अब सीधे तथ्य बताती हूं। एक स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट ने बताया कि लोगों को खुश रखने की आदत छोड़ने के बाद न सिर्फ काम में आत्मविश्वास बढ़ा, बल्कि माता-पिता और सहकर्मियों के साथ बातचीत भी ज्यादा ईमानदार हुई।
सालों तक दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखना इस महिला के लिए प्रोफेशनल व्यवहार का हिस्सा था। वह अपनी राय देने से पहले माफी मांगतीं, शब्दों को कई बार नरम करतीं और कोशिश रहती कि सामने वाला किसी भी तरह असहज महसूस न करे।
लेकिन समय के साथ उन्हें समझ आया कि हर बात को इस तरह कहने की कोशिश करना कि कोई नाराज न हो, कई बार असली बातचीत के रास्ते में ही दीवार खड़ी कर देता है।
वह एक स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट हैं और स्कूलों में बच्चों की बोलने, भाषा और संचार से जुड़ी जरूरतों पर काम करती हैं। उनके काम का एक मुश्किल हिस्सा माता-पिता को यह बताना भी है कि उनका बच्चा किन क्षेत्रों में संघर्ष कर रहा है।
ऐसी बातचीत माता-पिता के लिए भावनात्मक हो सकती है, इसलिए वह लंबे समय तक बेहद सावधानी से शब्द चुनती रहीं।
हर साल माता-पिता से होती है प्रगति पर बात
स्कूल में उन्हें हर छात्र के माता-पिता से कम से कम साल में एक बार बच्चे की प्रगति और उसे मिल रही सेवाओं के बारे में चर्चा करनी होती है। बच्चों की विकलांगता से जुड़े माता-पिता की चिंताओं को वह खुद भी समझती हैं। ऐसे में उनका उद्देश्य रहता था कि बातचीत का माहौल सुरक्षित और सहयोगी बना रहे।
लेकिन सभी माता-पिता एक जैसे नहीं होते। कुछ शिक्षक और विशेषज्ञों के साथ मिलकर समाधान तलाशने के लिए तैयार रहते हैं, जबकि कुछ बातचीत की शुरुआत ही बचाव की मुद्रा या नाराजगी के साथ करते हैं।
इस स्थिति में वह अक्सर अपनी बात को बहुत नरम तरीके से रखती थीं। मसलन, किसी राय से पहले यह कहना कि ‘हो सकता है मैं गलत हूं, लेकिन…’। उनका मानना था कि इससे सामने वाला कम असहज होगा और बातचीत बेहतर तरीके से आगे बढ़ेगी।
धीरे-धीरे यही तरीका सहकर्मियों और वरिष्ठों के साथ बातचीत में भी आ गया।
बीमारी के दौर ने बदल दिया संवाद का तरीका
कुछ साल पहले उन्हें Hashimoto’s disease का पता चला था। बाद में इसके लक्षण ज्यादा महसूस होने लगे। थकान और ब्रेन फॉग जैसी समस्याओं के बीच लंबे समय तक खुद को संभालना उनके लिए मुश्किल होने लगा।
इसी दौरान एक शुक्रवार की दोपहर हुई एक लंबी और तनावपूर्ण बैठक ने उनके संवाद का तरीका बदल दिया।
एक बच्चे के माता-पिता इंटरनेट से मिली कुछ ऐसी सलाह लेकर आए थे, जिनके बारे में उनका मानना था कि वे बच्चे के लिए उपयोगी नहीं होंगी। उस दिन उनके पास अपनी बात को बार-बार नरम करने की ऊर्जा नहीं थी। उन्होंने बिना घुमाए-फिराए माता-पिता को स्पष्ट बता दिया कि उन्हें क्या सही और क्या गलत लगता है।
नतीजा उनकी उम्मीद के उलट था।
माता-पिता नाराज होने के बजाय राहत महसूस कर रहे थे। उन्हें लगा कि विशेषज्ञ वही बात कह रही हैं, जो वे अपने बच्चे को घर पर देखकर खुद महसूस कर रहे हैं।
यहीं से उन्हें एक महत्वपूर्ण बात समझ आई—कई बार अत्यधिक विनम्रता वास्तव में सामने वाले की भावनाओं को संभालने से ज्यादा, खुद को असहज स्थिति से बचाने का तरीका बन जाती है।
‘पसंद किए जाने’ और ‘गंभीरता से लिए जाने’ का रिश्ता
इसके बाद उन्होंने अपने व्यवहार पर गौर करना शुरू किया। उन्हें महसूस हुआ कि वह लंबे समय से इस धारणा के साथ काम कर रही थीं कि अगर लोग उन्हें पसंद करेंगे, तो शायद उनकी बात को ज्यादा गंभीरता से लिया जाएगा।
अपनी बात को छोटा करना, मुस्कुराकर असहमति जताना या तथ्यों को बहुत नरम शब्दों में कहना उन्हें पेशेवर रूप से सुरक्षित लगता था।
महिलाओं पर पसंद किए जाने का सामाजिक दबाव भी इस अनुभव का एक हिस्सा है। शोध में महिलाओं के आत्मसम्मान और सामाजिक संबंधों के बीच इस तरह की अपेक्षाओं का संबंध सामने आया है। 2026 की एक समीक्षा में भी महिलाओं के लिए ‘योग्यता’ और ‘पसंद किए जाने’ के बीच मौजूद चुनौती पर चर्चा की गई है। इसमें बताया गया है कि सक्षम होने के बावजूद कम ‘likable’ दिखने वाली महिलाओं को कुछ पेशेवर मूल्यांकन में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अब बात नरम नहीं, स्पष्ट रखने की कोशिश
पिछले करीब एक साल में उन्होंने अपने संवाद का तरीका बदलने की कोशिश की है। इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने विनम्रता छोड़ दी है। वह अब भी बातचीत में दूसरे व्यक्ति की ताकत और सकारात्मक पहलुओं को महत्व देती हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि मुश्किल बात कहने से पहले वह उसे अनावश्यक रूप से ढकने की कोशिश नहीं करतीं।
पहले वह अपनी राय से पहले यह कह सकती थीं—‘मुझे नहीं पता कि मैं सही हूं या नहीं, लेकिन…’
अब वह कुछ इस तरह बातचीत शुरू करने की कोशिश करती हैं—‘मेरे पास आपके साथ साझा करने के लिए एक मुश्किल बात है। क्या हम इसके बारे में बात करने के लिए तैयार हैं?’
इसके बाद वह अपनी बात और उपलब्ध तथ्यों को सीधे रखने की कोशिश करती हैं।
इस बदलाव का मतलब यह भी नहीं कि हर व्यक्ति उनकी स्पष्ट बात सुनकर तुरंत सहमत हो जाता है। कई बार माता-पिता या सहकर्मी अब भी नाराज या असहज हो जाते हैं।
लेकिन अब वह हर असहज प्रतिक्रिया को अपनी गलती नहीं मानतीं।
उनके लिए महत्वपूर्ण यह है कि बातचीत में दोनों पक्ष ईमानदार रहें, एक-दूसरे को समझने की कोशिश करें और किसी समस्या का समाधान तलाशें।
उनका अनुभव बताता है कि दयालु होना और हर किसी को खुश रखना एक ही बात नहीं है। कई बार सम्मानजनक तरीके से सच कहना ही बेहतर सहयोग की शुरुआत बन सकता है।