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मुंगेर सदर अस्पताल की रात की पड़ताल: ऑक्सीजन के लिए जूझते 96 वर्षीय बुजुर्ग, कई वार्डों की जिम्मेदारी एक डॉक्टर पर

State Desk Bihar
Last updated: सितम्बर 15, 2026 12:15 अपराह्न
By : State Desk Bihar
Published on : 2 महीना पहले
मुंगेर सदर अस्पताल में रात की स्वास्थ्य व्यवस्था और ऑक्सीजन की स्थिति
मुंगेर सदर अस्पताल में रात की स्वास्थ्य व्यवस्था और ऑक्सीजन की स्थिति
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Munger सदर अस्पताल में रात के समय स्वास्थ्य व्यवस्था की पड़ताल में मरीजों की परेशान करने वाली तस्वीर सामने आई। इमरजेंसी में ऑक्सीजन की जरूरत पड़ने पर कंसंट्रेटर काम नहीं कर रहा था और उपलब्ध सिलेंडरों में भी पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिली।

वहीं एक डॉक्टर पर इमरजेंसी के साथ कई वार्डों की जिम्मेदारी थी। आईसीयू में जरूरी दवा नहीं मिलने पर मरीज के स्वजन को बाहर से दवा लानी पड़ी।

मुंगेर सदर अस्पताल में रात के समय मरीजों को किस तरह की परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, इसकी तस्वीर एक रात की पड़ताल में सामने आई। समय करीब रात 10:30 बजे का था। इमरजेंसी मरीजों से भरी हुई थी।

इसी दौरान पूरबसराय निवासी 96 वर्षीय तारणी प्रसाद सांस लेने में परेशानी और सीने में तेज दर्द के साथ अस्पताल पहुंचे।

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मरीज को तत्काल ऑक्सीजन की जरूरत थी। ऑक्सीजन कंसंट्रेटर लगाया गया, लेकिन वह काम नहीं कर रहा था। इसके बाद सिलेंडर की व्यवस्था की गई। एक सिलेंडर खाली मिला, जबकि दूसरे में भी ऑक्सीजन कम थी।

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किसी तरह ऑक्सीजन की व्यवस्था होने के बाद डॉ. रूपेश कुमार ने मरीज की स्थिति देखते हुए उन्हें आईसीयू रेफर किया।

यह स्थिति उस समय सामने आई जब मरीज को तत्काल चिकित्सकीय सहायता की जरूरत थी। ऐसे में अस्पताल की ऑक्सीजन व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

एक डॉक्टर के जिम्मे इमरजेंसी समेत सात वार्ड

रात की व्यवस्था में एक और बड़ी तस्वीर सामने आई। इमरजेंसी में ड्यूटी पर मौजूद डॉ. रूपेश कुमार के जिम्मे इमरजेंसी के अलावा करीब सात वार्डों की जिम्मेदारी थी।

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उन्हें जरूरत के अनुसार कभी आईसीयू, कभी पीकू और कभी एसएनसीयू की तरफ जाना पड़ रहा था। गंभीर मरीजों वाले इतने वार्डों की निगरानी एक ही डॉक्टर के जिम्मे होने से रात की चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि एक साथ कई वार्डों में गंभीर स्थिति बनने पर चिकित्सकीय निगरानी किस तरह सुनिश्चित की जाती है।

प्रसव वार्ड में सात मरीज, डॉक्टर की कुर्सी खाली

रात करीब 11 बजे प्रसव वार्ड में सात मरीज भर्ती मिले। रिसेप्शन पर नर्सिंग स्टाफ भर्ती प्रक्रिया में व्यस्त था, जबकि डॉक्टर की कुर्सी खाली नजर आई।

जरूरत पड़ने पर चिकित्सक को ऑन-कॉल बुलाने की बात कही गई। इस दौरान अस्पताल परिसर में मरीजों के स्वजन के आसपास कुछ संदिग्ध लोगों के घूमने की बात भी सामने आई।

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प्रसव जैसे संवेदनशील वार्ड में रात के समय पर्याप्त चिकित्सकीय और सुरक्षा व्यवस्था कितनी जरूरी है, यह इस स्थिति से समझा जा सकता है।

आईसीयू में मरीज, जरूरी दवा के लिए बाहर जाना पड़ा

रात करीब 11:20 बजे आईसीयू में 10 मरीज भर्ती थे। एक मरीज को नेबुलाइजेशन की जरूरत पड़ी, लेकिन संबंधित दवा अस्पताल में उपलब्ध नहीं थी।

मरीज के स्वजन को बाहर से दवा खरीदकर लानी पड़ी। नर्सिंग स्टाफ के अनुसार फेलारगन समेत कुछ अन्य जरूरी दवाओं की उपलब्धता भी नहीं थी।

सरकारी अस्पताल में भर्ती मरीज के लिए जरूरी दवा अस्पताल में उपलब्ध न होना मरीज और उसके परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक और मानसिक दबाव डाल सकता है।

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दो वार्डों की जिम्मेदारी एक नर्स पर

रात करीब 11:30 बजे पुरुष और महिला वार्ड की जिम्मेदारी एक नर्स सुमन कुमारी के पास थी। दोनों वार्डों के मरीजों की देखभाल के बीच नर्सिंग स्टाफ पर काम का दबाव साफ नजर आया।

रिपोर्ट के मुताबिक मरीजों को सुई लगाने और स्लाइन चढ़ाने जैसे कार्यों में प्रशिक्षु छात्र भी सहयोग कर रहे थे। दो वार्डों की जिम्मेदारी एक नर्स के भरोसे होना अस्पताल में रात के समय मानव संसाधन की स्थिति को सामने रखता है।

पीकू में 10 बच्चे, एसएनसीयू में नौ नवजात

रात करीब 11:50 बजे पीकू वार्ड में 10 बच्चे, जबकि एसएनसीयू में नौ नवजात भर्ती थे।

गंभीर स्थिति उत्पन्न होने पर डॉक्टर को बुलाने की व्यवस्था बताई गई। इसका मतलब यह हुआ कि रात में तत्काल चिकित्सकीय जरूरत पड़ने पर सीमित स्टाफ के सहारे व्यवस्था चल रही थी।

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पड़ताल के दौरान कई वार्डों में नर्सिंग स्टाफ निर्धारित ड्रेस में भी नहीं दिखा। अस्पताल प्रशासन की ओर से ड्रेस कोड का पालन करने का निर्देश होने के बावजूद रात की स्थिति में इसका पालन पूरी तरह नजर नहीं आया।

छत से गिरकर घायल हुई छह साल की बच्ची

हवेली खड़गपुर के गोवड्डा निवासी उत्तम यादव अपनी छह वर्षीय बेटी रिमझिम को लेकर मुंगेर सदर अस्पताल पहुंचे थे। बच्ची छत से गिरने के बाद घायल हुई थी।

उसे खड़गपुर पीएचसी से मुंगेर रेफर किया गया था। बच्ची को पीकू वार्ड भेजा गया, लेकिन वहां तत्काल इलाज नहीं हो सका। बाद में इमरजेंसी में डॉ. रूपेश कुमार ने बच्ची की जांच की और दवा लिखी।

एक तरफ 96 वर्षीय बुजुर्ग ऑक्सीजन के लिए परेशान दिखे, वहीं दूसरी तरफ घायल बच्ची के इलाज को लेकर भी परिवार को इंतजार करना पड़ा।

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रात की व्यवस्था ने खड़े किए कई सवाल

सदर अस्पताल की इस रात की तस्वीर में कई अलग-अलग समस्याएं एक साथ सामने आईं—ऑक्सीजन की उपलब्धता, दवाओं की कमी, डॉक्टरों की सीमित संख्या, नर्सिंग स्टाफ की कमी और कई वार्डों की जिम्मेदारी सीमित कर्मियों पर होना।

96 वर्षीय मरीज को ऑक्सीजन के लिए इंतजार करना पड़ा, आईसीयू के मरीज के लिए दवा बाहर से मंगानी पड़ी और दो वार्डों की जिम्मेदारी एक नर्स के पास रही। पीकू और एसएनसीयू में भी बड़ी संख्या में बच्चे और नवजात भर्ती थे।

सरकारी अस्पताल में आने वाले मरीजों के लिए रात का समय अक्सर सबसे चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में ऑक्सीजन, जरूरी दवाओं और पर्याप्त डॉक्टर-नर्सिंग स्टाफ की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में शामिल है।

हालांकि, इन व्यवस्थागत कमियों पर अस्पताल प्रशासन का आधिकारिक पक्ष इस उपलब्ध जानकारी में शामिल नहीं है। इसलिए ऑक्सीजन, दवा और स्टाफ की स्थिति से जुड़े आरोपों/अवलोकनों पर अस्पताल प्रशासन का जवाब सामने आना महत्वपूर्ण होगा।

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