यदि आज भी स्नातक अपने ही अधिकारों के लिए संघर्ष करने को विवश हैं, यदि शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार के अवसर और बौद्धिक नेतृत्व पर अपेक्षित विमर्श नहीं हो रहा है, तो यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, सम्पूर्ण समाज का प्रश्न है: दिलीप
बिहारशरीफ: नालंदा जिले के रहूई पंचायत के अंबा गांव के महादलित सामुदायिक भवन में स्नातक अधिकार मंच के बैनर तले स्नातक वोटर की बैठक आयोजित की गई। बैठक में स्नातक अधिकार मंच के संयोजक एवं भावी प्रत्याशी दिलीप कुमार ने कहा कि मैं आप सभी स्नातकों की हक की लड़ाई में अंतिम दम तक लडूंगा।
उन्होंने कहा कि पूर्व के जो स्नातक के जनप्रतिनिधि विगत 18 वर्षों से हैं, उन्होंने स्नातकों के लिए कोई काम नहीं किया, बल्कि स्नातकों के लिए आने वाले विकास मद की राशि को सिर्फ चापाकल गली नाली में बंदर वाट करने का काम किया और आज भी जो बची हुई विकास की राशि है उसे भी वह वोटरों को प्रलोभन देकर उन्हें चापाकल देने का काम कर रहे हैं।
क्या स्नातकों को उनका अधिकार मिल रहा है?: दिलीप
उन्होंने कहा कि स्नातक अधिकार मंच की स्थापना कई साल पहले इस उद्देश्य से की गई थी कि स्नातकों की आवाज़ को सदन तक पहुंचाया जाए तथा शिक्षा, रोजगार और बौद्धिक विकास से जुड़े उनके अधिकारों की प्रभावी पैरवी हो।
किंतु वर्षों के पश्चात आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उस संकल्प और वर्तमान परिस्थितियों के मध्य कितना परिवर्तन आया है।
स्नातक अधिकार मंच के बैनर तले स्नातक वोटर की बैठक के दौरान दिलीप कुमार ने कहा कि यह विचारणीय है कि जिन प्रतिनिधियों को स्नातकों ने अपना विश्वास सौंपा, उन्होंने शिक्षा, रोजगार, शोध, शिक्षकों के सम्मान तथा युवा स्नातकों की समस्याओं के समाधान के लिए कितने ठोस और दूरगामी प्रयास किए?
यदि आज भी स्नातक अपने ही अधिकारों के लिए संघर्ष करने को विवश हैं, यदि शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार के अवसर और बौद्धिक नेतृत्व पर अपेक्षित विमर्श नहीं हो रहा है, तो यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, सम्पूर्ण समाज का प्रश्न है।
हमें यह स्मरण रखना होगा कि जनप्रतिनिधि जनता द्वारा चुने जाते हैं और उनका प्रथम दायित्व जनता के हितों की रक्षा करना होता है। केवल सड़क, नाली अथवा भवन निर्माण ही विकास का मानक नहीं हो सकता।
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का वास्तविक उद्देश्य शिक्षित समाज की आवाज़ को नीति-निर्माण तक पहुँचाना, शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करना, शिक्षकों और विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करना तथा युवाओं के लिए अवसरों का सृजन करना है।
मेरा स्पष्ट विश्वास है कि जब तक सदन में शिक्षित, विचारशील और समाज के प्रति उत्तरदायी प्रतिनिधियों की संख्या नहीं बढ़ेगी, तब तक शिक्षा सुधार की चर्चा अधूरी रहेगी, भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष खोखला प्रतीत होगा और विकास का दावा भी अपने वास्तविक अर्थ को प्राप्त नहीं कर सकेगा।
समय आ गया है कि प्रत्येक स्नातक स्वयं से एक प्रश्न पूछे—
क्या हमें वास्तव में हमारा अधिकार मिल रहा है?
यदि उत्तर “नहीं” है, तो अब केवल मौन रहने का समय नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर उत्तरदायी प्रतिनिधित्व की माँग करने का समय है।
शिक्षित समाज ही सशक्त लोकतंत्र की सबसे बड़ी आधारशिला है।
वहां पर उपस्थित स्नातक वोटरों ने कहा कि इस बार हम लोग स्नातकों की आवाज उठाने वाले दिलीप कुमार को वोट देकर सदन पहुंचाएंगे। ताकि यह हमारी आवाज को सदन में मजबूती से रख सकें। बैठक में डेढ़ सौ से अधिक स्नातक वोटर उपस्थित हुए। यह बैठक सिर्फ दलित महादलित एवं अति पिछड़ा समाज के वोटरों ने आयोजित की थी।