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Home - Editor's Desk - बिहार की बाढ़ : पानी उतर जाएगा, सवाल नहीं

बिहार की बाढ़ : पानी उतर जाएगा, सवाल नहीं

प्रशांत कुमार
Last updated: सितम्बर 8, 2026 8:20 अपराह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 2 महीना पहले
बिहार में बाढ़ से जलमग्न इलाका और नदी के किनारे बसा शहर
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Highlights
  • हर साल की बाढ़, हर बार नया नुकसान
  • बाढ़ सिर्फ घर नहीं, रोजगार और जीवन भी डुबोती है
  • तटबंध जरूरी हैं, लेकिन अकेले समाधान नहीं
  • राहत के बाद पुनर्वास और स्थायी समाधान जरूरी
  • बिहार को नदी से लड़ना नहीं, नदी को समझना होगा

यह वक्त दोष गिनने का नहीं, जान बचाने और भविष्य बदलने का है

बिहार में बाढ़ कोई नई खबर नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि हर साल यह पुरानी खबर नये दुख लेकर आती है।

इस बार भी गंगा, गंडक, कोसी, बूढ़ी गंडक, पुनपुन, घाघरा समेत कई नदियां अलग-अलग स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर हैं। 7 सितंबर की सरकारी बाढ़ निगरानी सूचना में कई स्थानों पर जलस्तर खतरे के निशान से काफी ऊपर दर्ज है। पटना के गांधी घाट और हाथीदह समेत कई स्थानों पर गंगा का जलस्तर उच्चतम बाढ़ स्तर के बेहद करीब है। उधर मौसम विभाग ने बिहार में 7 से 10 सितंबर तक भारी बारिश की चेतावनी दी है।

राहत और बचाव जारी है। NDRF और SDRF की टीमें तैनात हैं, सरकारी नावें चल रही हैं, सामुदायिक रसोइयां और राहत शिविर काम कर रहे हैं। यह जरूरी है और इसकी सराहना होनी चाहिए।

लेकिन अखबार का काम केवल यह बताना नहीं कि सरकार क्या कर रही है। अखबार को उस आदमी की आवाज भी सुननी होगी जिसके घर में पानी घुस गया है और जो सरकारी आंकड़े में केवल ‘प्रभावित व्यक्ति’ है।

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उसके लिए वह एक संख्या नहीं है।

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वह किसी का पिता है। किसी की मां है। किसी बच्चे का स्कूल है। किसी किसान की साल भर की कमाई है। किसी मजदूर की रोज की मजदूरी है। किसी बूढ़े की दवा है। किसी परिवार का वह छोटा-सा घर है, जिसे बनाने में पूरी जिंदगी लग गई।

यही कारण है कि बिहार की बाढ़ पर इस समय सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि दोष किसका है।

सबसे जरूरी सवाल है— अब किया क्या जाए?

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पानी सिर्फ घर नहीं डुबोता, जीवन की लय डुबो देता है

बाढ़ का पहला असर दिखाई देता है—घर, सड़क और खेत पर।

दूसरा असर कुछ देर बाद दिखाई देता है—रोजगार, स्कूल, स्वास्थ्य और बाजार पर।

और तीसरा असर बहुत बाद तक रहता है—कर्ज, गरीबी, पलायन और टूटे हुए आत्मविश्वास के रूप में।

एक किसान की फसल पानी में चली गयी तो नुकसान सिर्फ उस फसल का नहीं है। उसके पास अगली फसल के लिए बीज और खाद खरीदने का पैसा कम हो जाता है। मवेशी बीमार पड़े तो उसकी अतिरिक्त आय जाती है। घर टूट गया तो बचत खत्म होती है। बच्चा स्कूल से दूर हुआ तो शिक्षा का नुकसान होता है।

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इसलिए बाढ़ को केवल जल-प्रबंधन की समस्या मानना बड़ी भूल होगी।

  • यह कृषि की समस्या है।
  • यह स्वास्थ्य की समस्या है।
  • यह शिक्षा की समस्या है।
  • यह रोजगार की समस्या है।
  • यह आवास की समस्या है।
  • यह सामाजिक सुरक्षा की समस्या है।

और अंततः यह मानवीय गरिमा की समस्या है।

बिहार की भौगोलिक कठिनाई को समझना होगा

बिहार की मुश्किल का एक बड़ा हिस्सा उसकी भौगोलिक नियति में है।

हिमालय से उतरने वाली नदियां नेपाल से होकर बिहार के मैदान में आती हैं। ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश और तेज बहाव का असर नीचे के मैदानी इलाकों में पड़ता है। बिहार का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत समतल है, इसलिए पानी का फैलाव व्यापक हो सकता है।

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गाद और नदी के बदलते रास्ते इस कठिनाई को और जटिल बनाते हैं।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की बिहार पर की गयी performance audit ने वर्षों पहले भी यह रेखांकित किया था कि राज्य में बाढ़ का खतरा व्यापक है और समाधान केवल तटबंधों तक सीमित नहीं हो सकता। रिपोर्ट ने तटबंध जैसे अल्पकालिक उपायों के साथ जलधारण क्षेत्रों, बाढ़ पूर्वानुमान, floodplain zoning और आपदा तैयारी जैसे दीर्घकालीन उपायों की जरूरत बतायी थी।

यानी समस्या हमें बहुत पहले समझ में आ चुकी थी।

सवाल है—क्या हमने उतनी ही गंभीरता से उसका स्थायी समाधान किया?

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तटबंध जरूरी हैं, लेकिन तटबंध ही समाधान नहीं

यह कहना आसान है कि तटबंधों ने समस्या पैदा की।

यह भी कहना आसान है कि तटबंधों ने बिहार को बचाया।

दोनों बातें आधी-अधूरी हैं।

तटबंधों ने कई इलाकों को सुरक्षा दी है। कोसी बेसिन में तटबंधों और अन्य संरचनाओं को मजबूत करने, बाढ़ पूर्वानुमान तथा समुदाय की तैयारी को बेहतर बनाने के प्रयासों से नुकसान घटाने की क्षमता बढ़ी है। विश्व बैंक समर्थित कोसी बेसिन परियोजना में flood forecasting और simulation जैसी व्यवस्थाओं पर काम हुआ है।

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लेकिन नदी को सिर्फ बांध देना पर्याप्त नहीं।

नदी के बाहर पानी को निकलने का रास्ता भी चाहिए।

  • तटबंध के पीछे बसे गांवों के लिए drainage चाहिए।
  • सुरक्षित ऊंचे स्थान चाहिए।
  • स्वास्थ्य केंद्र चाहिए।
  • पशुओं के लिए आश्रय चाहिए।
  • आपदा के समय स्कूल और सामुदायिक भवनों का वैकल्पिक इस्तेमाल चाहिए।

बाढ़ प्रबंधन इंजीनियर का अकेला काम नहीं हो सकता।

इसमें जल संसाधन विभाग के साथ कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास, नगर निकाय, पंचायत और स्थानीय समुदाय—सबको एक ही योजना में काम करना होगा।

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नेपाल को दोष देकर हम अपना काम पूरा नहीं कर सकते

बिहार की नदियों का भूगोल भारत-नेपाल सीमा से बड़ा है।

नेपाल में बारिश होगी तो उसका असर बिहार पर पड़ सकता है। इसलिए भारत और नेपाल के बीच बेहतर जल-डेटा साझेदारी, मौसम की जानकारी, नदी के प्रवाह की वास्तविक समय सूचना और पूर्व चेतावनी व्यवस्था जरूरी है।

लेकिन नेपाल का नाम लेकर हर बाढ़ का कारण वहीं खोज लेना समाधान नहीं है।

पानी को राजनीति नहीं आती।

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कोसी को पासपोर्ट नहीं चाहिए।

गंडक को सीमा की रेखा दिखाई नहीं देती।

इसलिए हमारी कूटनीति भी नदी की तरह व्यावहारिक होनी चाहिए।

जहां साझा नदी है, वहां साझा जिम्मेदारी भी होनी चाहिए।

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असली परीक्षा पानी उतरने के बाद होगी

बाढ़ के दौरान राहत पहुंचाना जरूरी है। मगर राहत खत्म होते ही सरकार और समाज का ध्यान अगर दूसरी खबरों की तरफ चला गया, तो सबसे बड़ा काम अधूरा रह जाएगा।

पानी उतरने के बाद पूछना होगा—

  • कितने किसानों की फसल गयी?
  • कितने घर क्षतिग्रस्त हुए?
  • कितने पशु मरे?
  • कितने स्कूल प्रभावित हुए?
  • कितने बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई?
  • कितने परिवारों पर नया कर्ज चढ़ा?

और फिर उससे भी बड़ा सवाल—

इन परिवारों को अगली बाढ़ से पहले कैसे मजबूत बनाया जाए?

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एक बोरी चावल राहत है।

लेकिन किसान को अगली फसल के लिए बीज देना पुनर्वास है।

एक तिरपाल राहत है।

लेकिन बाढ़-रोधी घर बनाना पुनर्वास है।

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नाव से मरीज को अस्पताल पहुंचाना राहत है।

लेकिन बाढ़ के मौसम में भी चलने वाला स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र बनाना तैयारी है।

बिहार को राहत से आगे बढ़कर resilience की भाषा सीखनी होगी—ऐसी क्षमता जिसमें आपदा आये तो जीवन पूरी तरह न टूटे।

गरीबी के आंकड़े सुधरे हैं, लेकिन असुरक्षा खत्म नहीं हुई

बिहार की कहानी केवल निराशा की कहानी नहीं है।

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नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में बहुआयामी गरीबी का अनुपात 2015-16 के 51.89 प्रतिशत से घटकर 2019-21 में 33.76 प्रतिशत हुआ। यह बड़ी प्रगति है और इसे स्वीकार करना चाहिए।

लेकिन गरीब परिवार की जिंदगी में एक और चीज महत्वपूर्ण है— झटका सहने की क्षमता।

जिस परिवार के पास बचत नहीं, पक्का घर नहीं, स्थानीय रोजगार नहीं और स्वास्थ्य संकट के लिए पैसा नहीं, उसके लिए एक बाढ़ वर्षों की प्रगति को पीछे धकेल सकती है।

इसलिए बिहार का अगला विकास मॉडल केवल गरीबी घटाने का नहीं, गरीबी में वापस गिरने से रोकने का भी होना चाहिए।

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पलायन को केवल मजबूरी मत कहिए, उसे संकेत की तरह देखिए

बिहार का युवा मेहनत से नहीं डरता।

वह दिल्ली जाता है। पंजाब जाता है। हरियाणा जाता है। महाराष्ट्र जाता है। गुजरात जाता है। देश के किसी भी कोने में काम करने को तैयार रहता है।

इसलिए समस्या यह नहीं कि बिहार का युवा काम नहीं करना चाहता।

समस्या यह है कि उसकी मेहनत के लिए पर्याप्त अवसर उसके अपने राज्य में नहीं हैं।

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यहां राजनीति को भी आत्ममंथन करना होगा।

सरकारी नौकरी महत्वपूर्ण है। सरकारी रोजगार की आकांक्षा का मजाक उड़ाना गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की वास्तविक चिंता को न समझना होगा।

लेकिन कोई भी राज्य केवल सरकारी नौकरियों के सहारे समृद्ध नहीं हो सकता।

बिहार को चाहिए:

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  • स्थानीय उद्योग चाहिए।
  • छोटे और मध्यम उद्यम चाहिए।
  • खाद्य प्रसंस्करण चाहिए।
  • मखाना, मक्का, फल-सब्जी, डेयरी और मत्स्यपालन की पूरी value chain चाहिए।
  • लॉजिस्टिक्स चाहिए।
  • पर्यटन चाहिए।
  • ग्रामीण उद्यम चाहिए।
  • डिजिटल और सेवा क्षेत्र के अवसर चाहिए।

किसान केवल उपज बेचकर नहीं, उपज को मूल्य में बदलकर कमाएगा।

युवा केवल परीक्षा पास करके नहीं, नयी अर्थव्यवस्था में कौशल हासिल करके आगे बढ़ेगा।

शहरों को भी अपनी गलती स्वीकार करनी होगी

बाढ़ का दोष सिर्फ गांवों पर या नदियों पर डालना ठीक नहीं।

पटना समेत बिहार के शहरों में प्राकृतिक जलनिकासी, नालों, जलाशयों और wetlands की स्थिति पर गंभीरता से विचार करना होगा।

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जल्ला, आहर, पोखर, तालाब और wetlands कोई बेकार पड़ी जमीन नहीं हैं। वे शहर और गांव की प्राकृतिक जल-सुरक्षा व्यवस्था हैं।

हमने अगर हर खाली जगह को निर्माण की जमीन मान लिया और पानी के प्राकृतिक रास्ते बंद कर दिये, तो बारिश को दोष देने से समस्या हल नहीं होगी।

शहरी नियोजन को अब यह समझना होगा कि पानी को जगह देना भी विकास का हिस्सा है।

राजनीति को भी थोड़ी जगह पीछे हटनी होगी

आपदा के समय आरोप लगेंगे। विधानसभा में सवाल होंगे। विपक्ष सरकार से जवाब मांगेगा। सरकार अपनी उपलब्धियां बताएगी।

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यह लोकतंत्र है और जरूरी भी।

लेकिन राहत के काम को राजनीतिक युद्ध का मैदान बनाना लोकतंत्र नहीं, संवेदनहीनता है।

जिसे बचाया जाना है, वह पहले नागरिक है—किसी दल का वोटर बाद में।

  • सरकार की लापरवाही है तो सवाल पूछिए।
  • राहत में भ्रष्टाचार है तो जांच कराइए।
  • तटबंध का रखरखाव खराब है तो जिम्मेदारी तय कीजिए।

लेकिन यह सब पानी उतरने के बाद भी पूरी ताकत से कीजिए।

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अभी नाव को रास्ता दीजिए।

अभी अस्पताल तक मरीज पहुंचाइए।

अभी बच्चे और बुजुर्ग सुरक्षित कीजिए।

पहिले जान बचावल जरूरी बा, हिसाब बाद में भी होई।

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जनता की भूमिका भी उतनी ही जरूरी है

सरकार सब कुछ नहीं कर सकती।

बाढ़ के समय गांव का शिक्षक, स्थानीय डॉक्टर, नाविक, पंचायत प्रतिनिधि, स्वयंसेवी संगठन, युवक मंडल, महिला समूह, धार्मिक संस्थाएं और आम नागरिक—सब मिलकर बड़ी ताकत बन सकते हैं।

किसी के पास नाव है तो वह बचाव में काम आ सकती है।

किसी के पास ट्रैक्टर है तो वह राहत पहुंचा सकता है।

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किसी के पास दवा है तो वह जरूरतमंद तक पहुंच सकती है।

किसी के पास केवल दो हाथ हैं तो वे भी किसी को पानी से बाहर निकाल सकते हैं।

और जिसके पास कुछ भी नहीं है, वह कम-से-कम अफवाह न फैलाकर और प्रशासन की चेतावनी मानकर योगदान कर सकता है।

आपदा के समय समाज की असली परीक्षा होती है।

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“हमरा से का होई?” वाली मानसिकता से निकलकर “हमनी मिलके का कर सकतानी?” वाली मानसिकता बनानी होगी।

अब सरकार को क्या करना चाहिए?

इस बार बाढ़ उतरने के बाद एक औपचारिकता भर की समीक्षा नहीं होनी चाहिए।

हर प्रभावित जिले की post-flood audit हो।

  • कहां पानी आया?
  • कहां राहत देर से पहुंची?
  • कहां तटबंध पर दबाव पड़ा?
  • कहां drainage विफल रहा?
  • किस सड़क और पुल को नुकसान हुआ?
  • कितने किसानों का कितना नुकसान हुआ?
  • कहां स्वास्थ्य सेवाएं बाधित हुईं?

इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किये जाएं।

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तटबंधों का स्वतंत्र तकनीकी audit हो।

Floodplain zoning को राजनीतिक कठिनाई के बावजूद लागू करने पर गंभीरता से काम हो।

नेपाल के साथ वास्तविक समय के जल-आंकड़े साझा करने की व्यवस्था और मजबूत हो।

हर संवेदनशील पंचायत में बाढ़ के समय सुरक्षित ऊंचे सामुदायिक आश्रय, पीने के पानी, शौचालय, स्वास्थ्य सुविधा और पशु-आश्रय की व्यवस्था हो।

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और सबसे बढ़कर—बाढ़ के बाद पुनर्वास को राहत का परिशिष्ट नहीं, मुख्य कार्यक्रम बनाया जाए।

बिहार सरकार खुद अपनी आपदा प्रबंधन नीति में prevention, mitigation, preparedness, response, relief, rehabilitation और reconstruction को एक समग्र प्रक्रिया के रूप में देखती है। अब इस सोच को कागज से गांव तक पहुंचाने की जरूरत है।

हमें नदी से लड़ना नहीं, नदी को समझना होगा

नदी हमारी दुश्मन नहीं है।

गंगा, कोसी, गंडक, बागमती, कमला और पुनपुन ने बिहार को जितना नुकसान दिया है, उतना ही जीवन भी दिया है।

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नदी खेतों में मिट्टी लाती है। भूजल और पारिस्थितिकी को जीवन देती है। सभ्यताएं नदी के किनारे ही पनपी हैं।

समस्या नदी नहीं।

समस्या तब पैदा होती है जब हमने नदी के स्वभाव को समझे बिना उसके रास्ते में अपना भविष्य बसाना शुरू कर दिया।

अब समय है कि बिहार नदी को हराने की जगह नदी के साथ सुरक्षित रहने की कला सीखे।

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जहां तटबंध जरूरी हैं, वहां मजबूत तटबंध हों।

जहां पानी को फैलने की जगह चाहिए, वहां floodplain बचें।

जहां गांव बार-बार डूबते हैं, वहां सुरक्षित पुनर्वास पर ईमानदारी से बात हो।

जहां शहर पानी रोकते हैं, वहां प्राकृतिक drainage वापस लायी जाए।

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जहां खेती हर साल जोखिम में है, वहां फसल और आजीविका का diversification हो।

और जहां युवा रोजगार के लिए बाहर जाने को मजबूर है, वहां स्थानीय अर्थव्यवस्था खड़ी की जाए।

पानी उतर जाएगा। हमें इस बार नहीं उतरना है

हर बाढ़ के साथ बिहार थोड़ा टूटता है।

लेकिन हर बाढ़ के बाद बिहार थोड़ा सीख भी सकता है।

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इस बार हमें तय करना होगा कि पानी उतरने के साथ हमारी चिंता भी न उतर जाए।

बिहार को दया नहीं चाहिए।

उसे सुरक्षित जीवन का अधिकार चाहिए।

उसे केवल राहत नहीं चाहिए।

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उसे सम्मानजनक पुनर्वास चाहिए।

उसे केवल सरकारी नौकरी की कतार नहीं चाहिए।

उसे अपने गांव और जिले में अवसर चाहिए।

उसे केवल तटबंध नहीं चाहिए।

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उसे समझदार नदी नीति चाहिए।

और उसे सबसे ज्यादा जरूरत है—सरकार और समाज के बीच उस भरोसे की, जिसमें संकट आने पर कोई यह न पूछे कि सामने वाला किस दल का है।

बस इतना पूछे—

“केहू फंसल बा का? चलऽ, पहिले ओकरा के निकालल जाव।”

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यही बिहार की असली ताकत है।

यह मिट्टी अभी थकी है, मगर हारी नहीं है।

ई बिहार डूबल नइखे—ई बिहार अभी खड़ा बा।

अब जिम्मेदारी हमारी है कि अगली बार पानी आए तो हम केवल नाव लेकर न निकलें, बल्कि ऐसा बिहार बनाकर निकलें जहां बाढ़ आये भी तो किसी गरीब का पूरा जीवन उसके साथ न बह जाए।

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क्योंकि बाढ़ हर साल आ सकती है।

लेकिन हर साल वही नुकसान हो—यह हमारी नियति नहीं, हमारी नीति का सवाल है।

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SOURCES:Bihar floods affect 2.7 million people as rivers swell across 13 districtsGanga above danger mark in Bihar, 33 rescue teams, 700 boats deployedCommunity kitchens, boat ambulances: Bihar copes with floods that have hit 22 lakhBihar flood situation remains serious as Ganga and other rivers flow above danger mark | Akashvani NewsChapter II: Performance AuditAudit Reports | Accountant General (Audit) Bihar, PatnaBihar's Resilience: Transformative Flood Management Through the Kosi Basin Development ProjectInter-State Migrant Workers in India: Policy for a Decent.India - Second Phase of the Bihar Kosi Flood Management.Revisiting the Kosi Agreement: Lessons for Indo-Nepal19 lakh lives impacted as Ganga breaches flood mark in PatnaPMC, Buidco step up drainage measures as Ganga, Punpun riseHomes, Hospitals & Roads Flooded In First Monsoon DelugeIndia Voluntary National Review 2025NITI AayogBEAMS : Flood ForecastIMD | Sub-Divisionwise WarningDisaster Management Department
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