बिहारशरीफ: मंगलवार, 01 सितंबर को: नालंदा विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग (आर्किओलॉजी डिपार्टमेंट) द्वारा भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (AnSI) तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आधुनिक विज्ञान, आनुवंशिकी और बायोआर्कियोलॉजी के माध्यम से प्राचीन इतिहास के रहस्यों को उजागर करने के उद्देश्य से एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।
इस कार्यशाला का उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने किया और अपने उद्घाटन संबोधन में उन्होंने मानव अतीत के सटीक पुनर्निर्माण के लिए वैज्ञानिक और अंतर-विषयक (इंटरडिसिप्लिनरी) दृष्टिकोण को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने पुरातत्व के क्षेत्र में जीनोमिक इतिहास और उन्नत वैज्ञानिक पद्धतियों की बढ़ती प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने विशेष रूप से डीएनए निष्कर्षण व शोधन, आइसोटोपिक विश्लेषण, कालानुक्रमिक पुनर्निर्माण (क्रोनालॉजिकल रिकंस्ट्रक्शन) और पुरातात्विक व्याख्याओं को अधिक प्रामाणिक बनाने हेतु सांख्यिकीय पद्धतियों के प्रयोग के लिए प्रयोगशाला सुविधाओं के विकास पर जोर दिया।
मानव जीनोम अध्ययन की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए उन्होंने एक ऑस्ट्रेलियाई अनुसंधान दल के साथ जारी सहयोग का उल्लेख किया, जिसके तहत मानव जीनोमिक डेटा एकत्र कर उसका अध्ययन किया गया है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि नालंदा विश्वविद्यालय ऐसे सहयोगात्मक प्रयासों के माध्यम से मानव जैविक विविधता, जनसांख्यिकी इतिहास, प्रवास और संबंधित प्रक्रियाओं की अधिक व्यापक व्याख्या कर इस शोध को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।
इसके साथ ही, प्रोफेसर चतुर्वेदी ने भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण जैसे अग्रणी संस्थानों के साथ साझेदारी को प्रयोगशाला-आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देने और पुरातात्विक, जीनोमिक, आइसोटोपिक व मानवशास्त्रीय आंकड़ों के समाकलन से अतीत का एक प्रामाणिक वैज्ञानिक पुनर्निर्माण तैयार करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
इस अवसर पर विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव श्री जयदीप मजूमदार की विशेष उपस्थिति रही। कार्यशाला ने पुरातत्व, मानवविज्ञान और आर्कियोजेनेटिक्स के क्षेत्रों में अंतर-विषयक अनुसंधान को गति देने के लिए देश के शीर्ष विशेषज्ञों को एक मंच पर ला खड़ा किया।
मुख्य प्लैनरी सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने की, जिसमें आयोजन अध्यक्ष प्रोफेसर वसंत शिंदे (नालंदा विश्वविद्यालय; सीएसआईआर भटनागर फेलो, सीसीएमबी, हैदराबाद) भी शामिल रहे। भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के निदेशक प्रोफेसर बी. वी. शर्मा ने अपने संबोधन में ऐतिहासिक समुदायों के अनुकूलन को समझने में जैविक मानवविज्ञान और स्वास्थ्य अध्ययनों की अहम भूमिका पर प्रकाश डाला।
वहीं, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने दक्षिण एशियाई आबादी के इतिहास के पुनर्निर्माण में उन्नत जीनोमिक्स और प्राचीन डीएनए (aDNA) अनुसंधान के महत्व को रेखांकित किया।
तकनीकी सत्रों में विश्वभारती, शांतिनिकेतन की डॉ. अभिशिक्ता घोष रॉय; बीआरआईसी-सीडीएफडी, हैदराबाद के एम.के. भान फेलो डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह; तथा भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के भौतिक मानवविज्ञानी डॉ. मंजुलिका गौतम और डॉ. निंगोंबम समरजीत सिंह ने अपने बहुमूल्य वैज्ञानिक विचार साझा किए।
कार्यक्रम में नालंदा विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक अध्ययन स्कूल के प्रभारी संकायाध्यक्ष (डीन I/C) प्रोफेसर गोदाबरीश मिश्र और पुरातत्व विभाग की समन्वयक एवं कार्यशाला की संयोजक डॉ. एलोरा त्रिबेदी का भी महत्वपूर्ण शैक्षणिक योगदान रहा।
अपने संबोधन के दौरान, कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने उन्नत अंतर-विषयक अनुसंधान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नालंदा विश्वविद्यालय में पुरातत्व में एकीकृत एम.ए. और डॉक्टरेट कार्यक्रम (Integrated M.A. and Doctoral Programme in Archaeology) शुरू करने की भी घोषणा की।