किसान पर बिजली का पोल जानबूझकर गिराने का आरोप, दो साल पहले सड़क चौड़ीकरण का काम रुकवाने की भी बात; संकरा रास्ता, अचानक बढ़ी भीड़ और करंट की अफवाह ने चंद मिनटों में बिगाड़ दिए हालात
लखीसराय। अशोक धाम मंदिर में सोमवार को हुई भगदड़ ने पूरे बिहार को झकझोर दिया। हादसे में आठ श्रद्धालुओं की मौत हो गई, जबकि कई लोग घायल हुए। घटना के बाद सामने आई जानकारी ने मंदिर तक पहुंचने वाले रास्ते और वहां की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दैनिक भास्कर की पड़ताल के मुताबिक, जिस रास्ते पर हादसा हुआ, वह कभी करीब 20 फीट चौड़ा था, लेकिन अब इसकी चौड़ाई करीब 10 फीट रह गई थी।
हादसे के वक्त बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। इसी बीच बिजली का पोल गिर गया। पोल गिरते ही लोगों में डर फैल गया। कुछ ही देर में वहां करंट फैलने की अफवाह फैल गई और लोग घबराकर भागने लगे। संकरे रास्ते पर अचानक बढ़े दबाव ने स्थिति को बेकाबू कर दिया।
दो साल पहले सड़क चौड़ी करने की कोशिश, लेकिन काम रुक गया
पड़ताल में सामने आया है कि करीब दो साल पहले इस रास्ते को चौड़ा करने की कोशिश की गई थी। बताया गया कि सड़क करीब 20 फीट चौड़ी की जानी थी। आरोप है कि एक किसान ने सड़क चौड़ीकरण का विरोध किया, जिसके बाद काम आगे नहीं बढ़ सका।
इसके बाद रास्ता पहले की तुलना में काफी संकरा रह गया। करीब 10 फीट चौड़े रास्ते से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही होती रही। सामान्य दिनों में शायद यह व्यवस्था चल गई, लेकिन किसी बड़े धार्मिक आयोजन में हजारों लोगों के एक साथ पहुंचने पर यही रास्ता बड़ी समस्या बन सकता था।
किसान पर पोल जानबूझकर गिराने का आरोप
इस पूरे मामले में एक किसान पर बिजली का पोल जानबूझकर गिराने का आरोप भी सामने आया है। आरोप है कि सड़क चौड़ीकरण को लेकर विवाद के बीच पोल को गिराया गया था।
हालांकि, यह आरोप बेहद गंभीर है और इसकी आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। पुलिस और प्रशासन की जांच में यह पता लगाया जाना जरूरी है कि पोल किस वजह से गिरा और क्या उसे वास्तव में जानबूझकर गिराया गया था।
अगर जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो यह हादसे से जुड़ा बेहद अहम पहलू होगा। वहीं, अगर पोल किसी दूसरी वजह से गिरा तो उसकी भी साफ जानकारी सामने आनी चाहिए।
पोल गिरते ही मची अफरातफरी
हादसे के दौरान अचानक बिजली का पोल गिरा। इसके बाद वहां मौजूद लोगों में डर फैल गया। लोगों को लगा कि बिजली का करंट फैल गया है। देखते ही देखते अफवाह भीड़ में फैल गई।
इसके बाद लोग सुरक्षित जगह की ओर भागने लगे। परेशानी यह थी कि रास्ता पहले से ही संकरा था। एक तरफ से लोग मंदिर की ओर जा रहे थे और दूसरी तरफ से आने वाली भीड़ भी मौजूद थी। ऐसे में अचानक भागने की कोशिश ने भीड़ का दबाव और बढ़ा दिया।
कुछ लोग जमीन पर गिर गए। पीछे से आ रहे लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला। देखते ही देखते वहां भगदड़ की स्थिति बन गई।
दो ट्रेनों के रुकने से अचानक बढ़ी भीड़
प्रशासन के मुताबिक, हादसे के समय दो ट्रेनें भी वहां रुकी थीं। ट्रेनों से उतरकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर की तरफ बढ़े। इससे पहले से मौजूद भीड़ पर अचानक दबाव बढ़ गया।
अशोक धाम में धार्मिक आयोजन के दौरान वैसे भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में एक साथ कई लोगों के पहुंचने से रास्ते पर भीड़ बढ़ना स्वाभाविक था। लेकिन संकरी जगह में किसी अचानक घटना के बाद भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया।
यही हुआ। पोल गिरा, अफवाह फैली और लोगों ने भागना शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में स्थिति ऐसी हो गई कि किसी को कुछ समझ नहीं आया।
आठ श्रद्धालुओं की मौत से मचा कोहराम
भगदड़ में आठ श्रद्धालुओं की जान चली गई। हादसे की खबर मिलते ही प्रशासन और पुलिस की टीमें मौके पर पहुंचीं। घायलों को इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया। मृतकों के परिवारों में मातम छा गया।
यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल है। धार्मिक स्थलों पर जहां एक साथ हजारों लोग पहुंचते हैं, वहां रास्ते की चौड़ाई, बिजली की व्यवस्था, बैरिकेडिंग और आपातकालीन रास्तों का सुरक्षित होना बेहद जरूरी है।
अब जांच में सामने आना चाहिए पूरा सच
लखीसराय हादसे के बाद अब कई सवालों के जवाब जरूरी हैं। सड़क की चौड़ाई 20 फीट से घटकर करीब 10 फीट कैसे हुई? दो साल पहले सड़क चौड़ीकरण का काम क्यों रुका? किसान ने इसका विरोध क्यों किया? बिजली का पोल कैसे गिरा? क्या उसे जानबूझकर गिराया गया था? और सबसे बड़ा सवाल, इतनी बड़ी भीड़ के लिए सुरक्षा और निकासी की व्यवस्था पर्याप्त थी या नहीं?
इन सवालों का जवाब जांच से ही मिलेगा। फिलहाल इस हादसे ने यह जरूर दिखा दिया है कि भीड़ के बीच छोटी सी घटना भी कितनी तेजी से बड़ी त्रासदी में बदल सकती है। संकरी सड़क, अचानक गिरा बिजली का पोल और फैली अफवाह ने कुछ ही मिनटों में ऐसा माहौल बना दिया, जिसकी कीमत आठ परिवारों को अपने अपनों की जान देकर चुकानी पड़ी।