भदोही: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर नाम बदलने का मुद्दा चर्चा में है। विधानसभा चुनाव से पहले योगी सरकार ने भदोही जिले का नाम दोबारा ‘संत रविदास नगर’ करने का फैसला लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को वाराणसी में इसकी घोषणा की। इसके साथ ही पिछले 32 वर्षों में यह पांचवीं बार होगा, जब जिले के नाम में बदलाव किया जाएगा।
भदोही सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि दुनिया भर में अपने हाथ से बुने जाने वाले मखमली कालीनों के कारण एक अलग पहचान रखता है। यही वजह है कि नाम परिवर्तन के फैसले को लेकर राजनीतिक और कारोबारी हलकों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।
दरअसल, 30 जून 1994 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने भदोही को वाराणसी से अलग कर उत्तर प्रदेश का 66वां जिला बनाया था। इससे पहले यह वाराणसी जिले की एक तहसील हुआ करता था। लंबे आंदोलन और स्थानीय लोगों की मांग के बाद जिले का गठन हुआ।
इसके बाद नाम बदलने का सिलसिला शुरू हुआ। वर्ष 1997 में भाजपा-बसपा गठबंधन सरकार ने जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया। दो साल बाद 1999 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्ता ने निर्यातकों की मांग को देखते हुए इसका नाम संत रविदास नगर भदोही कर दिया, ताकि कालीन उद्योग की वैश्विक पहचान बनी रहे।
फिर 2014 में समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिले का नाम दोबारा सिर्फ भदोही कर दिया। अब योगी सरकार इसे फिर से संत रविदास नगर नाम देने जा रही है। इस तरह तीन दशक में जिले के नाम में पांचवीं बार बदलाव होने जा रहा है।
फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। भाजपा सांसद डॉ. विनोद बिंद ने इसे संत शिरोमणि रविदास के सम्मान से जोड़ते हुए कहा कि महापुरुषों के नाम पर जिले का नाम होना पूरे प्रदेश और देश के लिए गर्व की बात है। उनका मानना है कि इससे जिले की पहचान वैश्विक स्तर पर और मजबूत होगी।
वहीं, समाजवादी पार्टी के विधायक जाहिद जमाल बेग ने सरकार पर नाम बदलने की राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि संत रविदास के सम्मान के लिए उनके नाम पर संस्थान खोले जा सकते हैं, लेकिन कालीन उद्योग की अंतरराष्ट्रीय पहचान ‘भदोही’ नाम से है। ऐसे में नाम बदलने से विदेशों में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
बसपा ने भी सरकार के फैसले का स्वागत किया है। पार्टी के जिलाध्यक्ष जय प्रकाश चौधरी ने कहा कि यह वही निर्णय है, जिसे मायावती सरकार ने पहले लागू किया था। उनके अनुसार, संत रविदास सामाजिक न्याय के महान प्रतीक हैं और उनके नाम पर जिले का नाम होना सम्मान की बात है।
अब इस फैसले को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने के साथ-साथ कालीन कारोबार और स्थानीय पहचान पर इसके संभावित असर को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा विधानसभा चुनाव की राजनीति में भी अहम भूमिका निभा सकता है।