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साहित्यकार शालिग्राम सिंह ‘अशांत’ का निधन, 24 कृतियों से छोड़ी अमिट छाप

State Desk Bihar
Last updated: अक्टूबर 27, 2026 9:59 अपराह्न
By : State Desk Bihar
Published on : 12 मिनट पहले
शालिग्राम सिंह ‘अशांत’ का निधन, 24 कृतियों की विरासत
शालिग्राम सिंह ‘अशांत’ का निधन, 24 कृतियों की विरासत
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साहित्यकार शालिग्राम सिंह ‘अशांत’ का निधन हिंदी साहित्य और शिक्षा जगत के लिए गहरी क्षति है। सारण के दिघवारा प्रखंड के कनकपुर-इसमेला की धरती से निकले शालिग्राम सिंह ‘अशांत’ ने अपनी लेखनी और शिक्षण सेवा के जरिए लंबे समय तक समाज को प्रभावित किया। मंगलवार की सुबह करीब पांच बजे हाजीपुर स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से सारण, वैशाली समेत बिहार के साहित्यिक और शैक्षणिक जगत में शोक की लहर है।

‘अशांत’ केवल कवि या साहित्यकार नहीं थे, बल्कि शिक्षा को सामाजिक बदलाव का माध्यम मानने वाले शिक्षक और शिक्षाविद भी थे। उनकी रचनात्मक यात्रा में कविता, प्रबंध काव्य, निबंध, आलोचना और गजल जैसी विधाओं का विस्तार दिखाई देता है। उनकी साहित्य साधना ने हिंदी जगत में उन्हें एक अलग पहचान दिलाई।

शिक्षण को बनाया जीवन का मिशन

9 फरवरी 1944 को दिघवारा प्रखंड के कनकपुर-इसमेला में जन्मे शालिग्राम सिंह ‘अशांत’ ने हिंदी और इतिहास में प्रथम श्रेणी से स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल की। इसके बाद उन्होंने एमएड की पढ़ाई पूरी की और शिक्षण के क्षेत्र को अपने जीवन का प्रमुख कर्मक्षेत्र बनाया। बालदेव उच्च विद्यालय से उनके शिक्षकीय जीवन की शुरुआत हुई। बाद में उन्होंने हाजीपुर के जिला स्कूल, शिवसागर विद्या मंदिर और सहयोगी उच्च विद्यालय में प्रधानाध्यापक के रूप में जिम्मेदारी संभाली।

शिक्षण के दौरान उनके अनुशासन, प्रभावशाली वक्तृत्व और विद्यार्थियों से संवाद की शैली ने उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई। उनके लिए विद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण की जगह था। यही वजह रही कि उनके संपर्क में आए बड़ी संख्या में विद्यार्थी आज भी उन्हें सम्मान के साथ याद करते हैं।

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‘गंधराज’ से शुरू हुई साहित्यिक यात्रा

शालिग्राम सिंह ‘अशांत’ की साहित्यिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 1965 में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘गंधराज’ रहा। इस कृति को सुमित्रानंदन पंत की प्राक्कथन-सम्मति प्राप्त होने का उल्लेख भी उनकी साहित्यिक पहचान से जुड़े विवरणों में मिलता है। इसके बाद उनकी लेखनी लगातार अलग-अलग साहित्यिक विधाओं में सक्रिय रही।

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उनकी चर्चित कृतियों में ‘रजनीगंधा’, ‘खिड़की पर चांद’, ‘अंजुरी में आकाश’, ‘वैशाली’, ‘अस्मिता’, ‘आईना और अक्स’ तथा ‘आलोचना के नये संदर्भ’ शामिल हैं। कुल 24 पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में योगदान दिया। उनकी रचनाओं में संवेदना, सामाजिक सरोकार और जीवन के विविध अनुभवों की अभिव्यक्ति को प्रमुखता मिली।

सम्मानों ने बढ़ाया साहित्यिक कद

साहित्य और भाषा के क्षेत्र में उनके योगदान को विभिन्न स्तरों पर सम्मान मिला। बिहार सरकार के राजभाषा विभाग ने भी उनके साहित्यिक योगदान का सम्मान किया। उन्हें गोपाल सिंह नेपाली, नागार्जुन, कालिदास और दिनकर शिखर सम्मान से अलंकृत किया गया। उनकी रचनाएं वागर्थ और आजकल जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। इसके अलावा वे कई साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन से भी जुड़े रहे।

साहित्य और शिक्षा जगत में छोड़ी विरासत

शालिग्राम सिंह ‘अशांत’ का योगदान केवल उनकी पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा। एक शिक्षक के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों को दिशा दी और साहित्यकार के रूप में हिंदी भाषा को अपनी रचनात्मक ऊर्जा दी। उनके निधन के साथ सारण ने साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय एक ऐसी शख्सियत खो दी है, जिसकी पहचान उसकी पुस्तकों, विचारों और शिष्यों की स्मृतियों में बनी रहेगी।

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वे अपने पीछे एक पुत्री, दो पुत्र और नाती-पोतों से भरा परिवार छोड़ गए हैं। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव कनकपुर-इसमेला में किया जाएगा। उनके निधन से साहित्यिक और शैक्षणिक जगत में शोक का माहौल है और उनके चाहने वाले उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।

TAGGED:Bihar NewsSaran Newsशालिग्राम सिंह ‘अशांत’
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