FY27 के लिए विकास दर का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% किया गया; RBI ने रेपो रेट 0.25% बढ़ाकर 5.50% किया, महंगाई का अनुमान भी 5.2% किया
नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को अर्थव्यवस्था को लेकर एक तरफ भरोसा जताया, तो दूसरी तरफ बढ़ती महंगाई और वैश्विक जोखिमों को लेकर सावधानी का संकेत दिया। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति समिति (MPC) के फैसले की जानकारी देते हुए वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वास्तविक GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% कर दिया।
यानी अनुमान में 40 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, महंगाई के दबाव को देखते हुए RBI ने नीतिगत रेपो रेट को 5.25% से बढ़ाकर 5.50% कर दिया। यह फरवरी 2023 के बाद पहली रेपो रेट बढ़ोतरी है।
क्यों बढ़ाया GDP ग्रोथ का अनुमान?
RBI का कहना है कि वैश्विक स्तर पर कई चुनौतियां होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की घरेलू गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून में वास्तविक GDP वृद्धि 7.8% रही। इसमें निजी खपत, निवेश और निर्यात की सकारात्मक भूमिका रही।

गवर्नर संजय मल्होत्रा के मुताबिक, पहली तिमाही में निवेश गतिविधि में करीब 12% की बढ़ोतरी दर्ज हुई। निजी खपत भी मजबूत रही और शुद्ध निर्यात का योगदान भी सकारात्मक रहा। इन्हीं संकेतों को देखते हुए RBI ने पूरे वित्त वर्ष की विकास दर का अनुमान 7.1% किया है।
आगे हर तिमाही में कितनी रह सकती है ग्रोथ?
RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए तिमाही आधार पर भी अनुमान जारी किया है।
- Q2: 7.2%
- Q3: 6.9%
- Q4: 6.8%
इसका मतलब है कि RBI को आगे आर्थिक गतिविधियों में कुछ नरमी की उम्मीद है, लेकिन कुल मिलाकर विकास की रफ्तार मजबूत रहने का अनुमान है।
महंगाई का अनुमान भी बढ़ा, इसलिए रेपो रेट में बढ़ोतरी
GDP के अनुमान में बढ़ोतरी के साथ RBI ने महंगाई को लेकर चिंता भी जताई है। FY27 के लिए CPI आधारित महंगाई का अनुमान 5% से बढ़ाकर 5.2% कर दिया गया है।

MPC ने रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50% करने का फैसला किया। इसका सीधा मतलब यह है कि बैंकों के लिए RBI से कर्ज लेना महंगा होगा। इसका असर आगे चलकर होम लोन, वाहन लोन और दूसरे कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है, हालांकि इसका वास्तविक असर बैंकों के फैसलों पर निर्भर करेगा। यह फरवरी 2023 के बाद RBI की पहली रेपो रेट बढ़ोतरी है।
RBI ने अपनी मौद्रिक नीति का रुख भी ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ यानी महंगाई के दबाव को देखते हुए धीरे-धीरे सख्ती करने वाला कर दिया है।
किन खतरों से अर्थव्यवस्था को जोखिम?
RBI गवर्नर ने कहा कि भारत की ग्रोथ के सामने कई बाहरी चुनौतियां हैं। इनमें भूराजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी कीमतों में बढ़ोतरी, वैश्विक व्यापार में बढ़ती रुकावटें और कड़ी वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां शामिल हैं।
इसके अलावा सप्लाई चेन में आने वाली रुकावटें भी घरेलू आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं। कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून और मजबूत अल नीनो की स्थिति से आगामी रबी सीजन और ग्रामीण मांग पर असर पड़ने का जोखिम है।

मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में क्या स्थिति?
RBI के मुताबिक दूसरी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां लागत के दबाव के बावजूद स्थिर बनी हुई हैं। सर्विस सेक्टर में भी घरेलू और विदेशी मांग के कारण व्यापक मजबूती बनी हुई है।
मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों के PMI यानी खरीद प्रबंधक सूचकांक दूसरी तिमाही में विस्तार के क्षेत्र में रहे, हालांकि पहली तिमाही के मुकाबले विस्तार की रफ्तार कुछ धीमी हुई है।
निजी खपत भी कुल मिलाकर मजबूत बनी हुई है और लोगों के गैर-जरूरी यानी विवेकाधीन खर्च में मजबूती देखी गई। वहीं, फिक्स्ड इन्वेस्टमेंट भी मजबूत रहा। हालांकि गैर-टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं और घरेलू हवाई यात्री यातायात में कुछ कमजोरी दिखाई दी।
निर्यात से भी मिल रहा है सहारा
जुलाई और अगस्त में भारत के माल निर्यात में दोहरे अंक की वृद्धि दर्ज हुई। नए बाजारों तक पहुंच बढ़ाने और निर्यात बाजारों में विविधता लाने की कोशिशों से इसे सहारा मिला। इसी अवधि में सर्विसेज एक्सपोर्ट की वृद्धि भी तेज हुई।

RBI को उम्मीद है कि आगे बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च, निजी क्षेत्र के पूंजीगत निवेश में संभावित तेजी और मजबूत क्रेडिट फ्लो निवेश को सहारा देंगे। सर्विसेज एक्सपोर्ट के मजबूत बने रहने और हाल में लागू हुए द्विपक्षीय व्यापार समझौतों से माल निर्यात को भी मदद मिलने की उम्मीद है।
RBI का संदेश क्या है?
RBI के ताजा फैसले से तस्वीर दो हिस्सों में साफ होती है। एक तरफ 7.8% की पहली तिमाही GDP ग्रोथ और मजबूत घरेलू गतिविधियों के कारण केंद्रीय बैंक को भारत की विकास क्षमता पर भरोसा है, इसलिए पूरे वित्त वर्ष का ग्रोथ अनुमान बढ़ाया गया है।
दूसरी तरफ महंगाई, महंगे कमोडिटी, भू-राजनीतिक तनाव और मौसम से जुड़े जोखिमों को देखते हुए RBI ने ब्याज दर बढ़ाकर यह संकेत दिया है कि विकास के साथ कीमतों की स्थिरता भी उसकी प्राथमिकता बनी हुई है।
