भोजपुर: किसानों को खेती की लागत घटाने, मिट्टी की सेहत बनाए रखने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से भोजपुर जिले के पकड़ी और सरैया गांवों में ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत किसान जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना की ओर से 29 अक्टूबर 2026 को आयोजित इन कार्यक्रमों में कुल 117 किसानों ने भाग लिया। इनमें 36 महिला और 81 पुरुष किसान शामिल रहे।
कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक खेती और समेकित कृषि प्रणाली से जुड़ी वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी देना रहा। विशेषज्ञों ने किसानों को समझाया कि खेत की उत्पादकता बनाए रखने के लिए केवल अधिक मात्रा में उर्वरक डालना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मिट्टी की वास्तविक जरूरत के आधार पर पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग जरूरी है।
पकड़ी में 53 किसानों ने लिया प्रशिक्षण
पकड़ी गांव में आयोजित कार्यक्रम में कुल 53 किसानों ने भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों की जानकारी दी। किसानों को मृदा परीक्षण आधारित संतुलित उर्वरक उपयोग की जरूरत समझाई गई, ताकि खेत की आवश्यकता के अनुरूप ही पोषक तत्वों का इस्तेमाल किया जा सके।
इस दौरान अजोला आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली के साथ जीवामृत और नीमास्त्र जैसे कम लागत वाले प्राकृतिक विकल्पों की भी जानकारी दी गई। किसानों ने प्रशिक्षण को उपयोगी बताते हुए खेत के स्तर पर नियमित प्रदर्शन आयोजित करने का अनुरोध किया, जिससे वे प्राकृतिक कृषि तकनीकों को व्यावहारिक रूप से समझ सकें और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ सकें।

सरैया में महिला किसानों की सक्रिय भागीदारी
सरैया गांव में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में 64 किसानों ने भाग लिया। इनमें 36 महिला और 28 पुरुष किसान शामिल थे। कार्यक्रम में महिला किसानों की सक्रिय भागीदारी रही। विशेषज्ञों ने यहां जीवामृत, घनजीवामृत और नीमास्त्र तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। किसानों को इन प्राकृतिक कृषि आदानों के उपयोग से मिट्टी में जैविक गतिविधियों को बढ़ावा देने, कीट प्रबंधन में रासायनिक साधनों की निर्भरता घटाने और खेती की लागत कम करने की संभावनाओं के बारे में बताया गया।
प्रशिक्षण के बाद किसानों ने हर महीने अनुवर्ती प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने का सामूहिक अनुरोध किया। किसानों का मानना रहा कि नियमित मार्गदर्शन मिलने से प्राकृतिक खेती से जुड़ी तकनीकों को खेतों में बेहतर तरीके से अपनाया जा सकेगा।
कृषि अवशेष से केंचुआ खाद बनाने की जानकारी
दोनों गांवों में किसानों को कृषि अवशेष, फसल अवशेष और पशुओं के गोबर से केंचुआ खाद तैयार करने की वैज्ञानिक विधि भी बताई गई। विशेषज्ञों ने कृषि अपशिष्ट के पुनर्चक्रण के जरिए उसे खेती के लिए उपयोगी संसाधन में बदलने पर जोर दिया। इससे मिट्टी की संरचना सुधारने और खेती की लागत कम करने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।
प्रशिक्षण के दौरान अजोला के उपयोग और लाभों की जानकारी भी दी गई। किसानों को बताया गया कि अजोला पशुओं के लिए प्रोटीनयुक्त पूरक आहार के रूप में उपयोगी हो सकता है। इसके अलावा धान की खेती में जैव उर्वरक के रूप में भी इसके उपयोग की जानकारी दी गई।

एकीकृत कृषि प्रणाली से आय के विकल्पों पर जोर
किसानों को फसल उत्पादन के साथ मत्स्य पालन और पशुपालन को जोड़कर एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने के फायदे बताए गए। विशेषज्ञों ने कहा कि उपलब्ध कृषि संसाधनों का बेहतर उपयोग कर किसान अपनी आय के अलग-अलग स्रोत विकसित कर सकते हैं। इसके लिए पशुधन प्रबंधन, तालाब प्रबंधन और खेत से जुड़े अन्य संसाधनों के समन्वित उपयोग पर चर्चा की गई।
कार्यक्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना से डॉ. कमल शर्मा, प्रमुख, पशुधन एवं मात्स्यिकी प्रबंधन प्रभाग तथा मुख्य तकनीकी अधिकारी डॉ. काशी नाथ मौजूद रहे। कृषि विज्ञान केंद्र, भोजपुर के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. सच्चिदानंद सिंह और प्रखंड तकनीकी प्रबंधक श्री राज अभिनंदन सिंह ने भी कार्यक्रम में भाग लिया और तकनीकी सत्रों के समन्वय में सहयोग किया।
दोनों गांवों में आयोजित प्रशिक्षण के जरिए किसानों को खेती के पारंपरिक अनुभव के साथ वैज्ञानिक तकनीकों को जोड़ने की जानकारी दी गई। प्राकृतिक विकल्पों, मृदा परीक्षण और एकीकृत कृषि प्रणाली पर जोर देते हुए किसानों को कम लागत और टिकाऊ खेती की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया गया।
