कभी रात के अंधेरे में बंदूक के दम पर होती थी लूट और रंगदारी, आज मोबाइल स्क्रीन के जरिए हो रही लाखों-करोड़ों की ठगी
नालंदा से अविनाश पांडेय
नालंदा की पहचान दुनिया भर में ज्ञान, शिक्षा और ऐतिहासिक विरासत की धरती के रूप में रही है। लेकिन पिछले करीब ढाई दशकों में जिले के अपराध जगत ने भी एक लंबा सफर तय किया है। वर्ष 1998 के आसपास अपराध की दुनिया में निमोछिया/निमोचिया गिरोह के उभरने से लेकर वर्ष 2026 के साइबर अपराध और नशे के बढ़ते कारोबार तक, अपराध का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है।
करीब दो दशक पहले अपराधियों के हाथों में बंदूकें होती थीं और रात के अंधेरे में सड़क रोककर लूट, अपहरण, रंगदारी और वर्चस्व की लड़ाई होती थी। आज अपराध का बड़ा हिस्सा मोबाइल फोन, फर्जी वेबसाइट, डिजिटल पेमेंट, सोशल मीडिया और ऑनलाइन पहचान के जरिए अंजाम दिया जा रहा है।
यानी समय के साथ अपराध की भाषा भी बदल गई है—तब अपराधी बंदूक लेकर निकलते थे, आज कई अपराधी मोबाइल लेकर घर बैठे वारदात कर रहे हैं।
1998 के आसपास उभरा निमोछिया गिरोह
वर्ष 1998 के आसपास नालंदा में निमोछिया गिरोह के सक्रिय होने की चर्चा सामने आई। बताया जाता है कि यह गिरोह मुख्य रूप से बिंद, सरमेरा, अस्थावां, कतरीसराय और राजगीर इलाके में सक्रिय रहा।
गिरोह का नाम विशेष रूप से रात के समय होने वाली लूटपाट, रंगदारी और अन्य संगठित आपराधिक गतिविधियों से जोड़ा जाता था। उस दौर में ग्रामीण और अर्द्धशहरी इलाकों में अपराधियों का आतंक पुलिस के लिए बड़ी चुनौती था।
सड़क पर वाहनों को रोकना, हथियार के बल पर लूट करना और व्यवसायियों या प्रभावशाली लोगों से रंगदारी मांगना उस समय के अपराध का प्रमुख स्वरूप माना जाता था।
2005 में अमित कुमार की तैनाती और अपराधियों पर शिकंजा
वर्ष 2005 में 1994 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी अमित कुमार की नालंदा के पुलिस अधीक्षक के रूप में तैनाती हुई। करीब 2005 से 2007 के दौरान उनके कार्यकाल को जिले में संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई के महत्वपूर्ण दौर के रूप में देखा जाता है।
निमोछिया गिरोह की गतिविधियों पर लगाम लगाने और उसके नेटवर्क को कमजोर करने में पुलिस की कार्रवाई को अहम माना गया। उस समय अपराधियों के खिलाफ लगातार अभियान चलाए गए और संगठित आपराधिक गिरोहों पर पुलिस का दबाव बढ़ा।
यह वह दौर था जब पुलिस के सामने चुनौती सिर्फ अपराध दर्ज करने की नहीं, बल्कि गैंग के नेटवर्क, उसके हथियारों और उसके आर्थिक स्रोतों को तोड़ने की थी।
2000 से 2006: अपहरण और रोड होल्डअप का दौर
नालंदा में वर्ष 2000 से 2006 के बीच अपराध का स्वरूप आज की तुलना में काफी अलग था।
उस दौर में फिरौती के लिए अपहरण, लूट, रोड होल्डअप, रंगदारी और वर्चस्व की लड़ाई बड़ी चुनौती मानी जाती थी। अपराधियों के पास अत्याधुनिक हथियार होने की घटनाएं भी सामने आती थीं।
मार्च 2003 का दौर विशेष रूप से चर्चा में रहा। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उस एक महीने में ही शिक्षक कबिन्द्र पासवान, स्कूल संचालक संजय, ऑटो पार्ट्स डीलर पप्पू, एक मुखिया और उनके मुंशी समेत कई लोगों के अलग-अलग थाना क्षेत्रों से अपहरण की घटनाएं सामने आई थीं।
सरमेरा, बिंद, राजगीर और इस्लामपुर जैसे क्षेत्रों में अपहरण की घटनाओं ने पुलिस और प्रशासन के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी थी। इनमें कुछ मामलों में अपहृत लोगों की हत्या की बात भी सामने आई।
उस समय अपहरण सिर्फ व्यक्तिगत अपराध नहीं रह गया था, बल्कि कई मामलों में यह संगठित अपराध और फिरौती के नेटवर्क का हिस्सा बन चुका था।
गैंगवार और जातीय संघर्ष ने बढ़ाई चुनौती
नालंदा और आसपास के इलाकों में उस समय अपराध के साथ-साथ गुटीय और जातीय वर्चस्व की लड़ाई भी कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बनी हुई थी।
महतो गैंग और सिंह गैंग जैसे नामों से जुड़े वर्चस्व संघर्षों का जिक्र उस दौर की आपराधिक पृष्ठभूमि में किया जाता रहा है। हत्या, सामूहिक हिंसा, रंगदारी और अपहरण जैसी घटनाओं ने कई इलाकों में भय का माहौल बनाया।
उस समय अपराधी गिरोहों के बीच संघर्ष में अत्याधुनिक हथियारों के इस्तेमाल की घटनाएं भी सामने आती थीं।
आज की तुलना में उस दौर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि अपराध दिखाई देता था—बंदूक, वाहन, गिरोह और आमने-सामने की हिंसा के रूप में।
कतरीसराय से बदलने लगा अपराध का तरीका
नालंदा के कतरीसराय इलाके का नाम बाद के वर्षों में अलग तरह की ठगी के मामलों से जुड़ने लगा।
दो दशक पहले इंटरनेट और स्मार्टफोन का आज जैसा विस्तार नहीं था। ऐसे में ठगी का तरीका भी पारंपरिक था। लोगों को यौनवर्धक दवाओं, गंभीर बीमारियों के इलाज या अन्य उत्पादों के नाम पर डाक और फोन के माध्यम से ठगी किए जाने की शिकायतें सामने आने लगीं।
यही वह समय था जब अपराध का एक नया रूप आकार ले रहा था—बिना हथियार, बिना सड़क पर उतरे और बिना पीड़ित के सामने आए पैसा ऐंठना।
आने वाले वर्षों में यही तरीका तेजी से डिजिटल अपराध में बदल गया।
2016 के बाद शराबबंदी ने खड़ा किया नया आपराधिक नेटवर्क
बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद नालंदा में भी अवैध शराब के कारोबार ने अपराध की एक नई परत जोड़ दी।
शराब की अवैध बिक्री, तस्करी, भंडारण और होम डिलीवरी से जुड़े नेटवर्क सामने आने लगे। इसमें छोटे स्तर के स्थानीय अपराधियों से लेकर बड़े तस्करी नेटवर्क तक की भूमिका की जांच पुलिस करती रही है।
जहां दो दशक पहले शराब का कारोबार कानूनी होने के कारण इससे जुड़ा समानांतर आपराधिक नेटवर्क बड़ी चुनौती नहीं था, वहीं शराबबंदी के बाद अवैध शराब की तस्करी एक आर्थिक अपराध के रूप में सामने आई।
2022: जहरीली शराब कांड ने झकझोर दिया नालंदा
जनवरी 2022 में नालंदा के सोहसराय थाना क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से कई लोगों की मौत का मामला सामने आया। इस घटना के बाद अवैध शराब के कारोबार के खिलाफ पुलिस ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई की।
इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया कि शराबबंदी के बावजूद जहरीली शराब और अवैध शराब का नेटवर्क किस तरह काम कर रहा है।
इसके बाद शराब तस्करी के खिलाफ लगातार छापेमारी, गिरफ्तारी और शराब बरामदगी की कार्रवाई तेज हुई।
2025 तक पहुंचते-पहुंचते अपराध का नया चेहरा
समय के साथ नालंदा में बड़े संगठित गैंग और खुलेआम वर्चस्व की लड़ाई वाले अपराधों में कमी आई, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं रहा कि अपराध खत्म हो गया।
अपराधियों ने तरीका बदल लिया।
बंदूक की जगह मोबाइल,
रोड होल्डअप की जगह फर्जी लिंक,
रंगदारी की जगह डिजिटल ठगी,
और आमने-सामने की धमकी की जगह ऑनलाइन पहचान का इस्तेमाल।
यही बदलाव आज नालंदा के अपराध परिदृश्य की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
2026: साइबर अपराध बना सबसे बड़ी नई चुनौती
वर्ष 2026 में नालंदा में अपराध का एक बड़ा हिस्सा साइबर क्राइम और डिजिटल फ्रॉड से जुड़ा दिखाई देता है।
फर्जी वेबसाइट, फर्जी कस्टमर केयर, बैंकिंग फ्रॉड, सरकारी योजनाओं के नाम पर ठगी, एटीएम और डिजिटल पेमेंट से जुड़े अपराध तथा सोशल मीडिया के जरिए लोगों को निशाना बनाना—अपराध के ये तरीके तेजी से बढ़े हैं।
सबसे खतरनाक तरीकों में से एक ‘डिजिटल हाउस अरेस्ट’ भी है।
इसमें साइबर अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी दूसरी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पीड़ित को वीडियो कॉल पर डराते हैं। पीड़ित को घंटों या कई दिनों तक ऑनलाइन निगरानी में रखने का दबाव बनाया जाता है और फिर बैंक खाते से रकम ट्रांसफर कराई जाती है।
नालंदा में भी इस तरह के कई मामले सामने आने के बाद साइबर अपराध पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।
साइबर थाना बना नई चुनौती से लड़ने का हथियार
साइबर अपराध के बढ़ते मामलों को देखते हुए सरकार ने विशेष साइबर थानों की व्यवस्था की है।
नालंदा में भी साइबर थाना के माध्यम से ऑनलाइन ठगी, डिजिटल फ्रॉड, सोशल मीडिया अपराध और अन्य साइबर मामलों की जांच की जा रही है।
पारंपरिक अपराध की जांच में जहां घटनास्थल, हथियार, वाहन और प्रत्यक्षदर्शी महत्वपूर्ण होते थे, वहीं साइबर अपराध की जांच में मोबाइल नंबर, आईपी एड्रेस, बैंक खाते, डिजिटल ट्रांजेक्शन, चैट, कॉल रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यानी पुलिसिंग का तरीका भी अपराध के साथ बदल गया है।
2026 में महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों ने भी बढ़ाई चिंता
वर्ष 2026 में नालंदा में महिलाओं और नाबालिगों से जुड़े कुछ गंभीर आपराधिक मामलों ने कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ाई।
26 मार्च 2026 को नूरसराय थाना क्षेत्र के अजयपुर गांव में एक विवाहित महिला के साथ भीड़ द्वारा कथित तौर पर अमानवीय व्यवहार का मामला सामने आया। आरोप है कि अफवाहों के आधार पर महिला को सड़क पर घसीटा गया, उसके कपड़े फाड़े गए और उसके साथ छेड़खानी की गई। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला व्यापक चर्चा में आया। पुलिस ने मामले में आरोपियों की गिरफ्तारी की कार्रवाई की।
इसके अगले दिन 27 मार्च 2026 को हरनौत में एक 16 वर्षीय छात्रा की गोली मारकर हत्या किए जाने की घटना ने भी लोगों को झकझोर दिया।
वहीं अप्रैल 2026 में नालंदा थाना क्षेत्र में एक नाबालिग छात्रा से कथित दुष्कर्म और उसके बाद आत्महत्या का मामला भी सामने आया। इन घटनाओं ने महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए।
26 साल में बदल गई अपराध की पूरी तस्वीर
अगर वर्ष 2000 और वर्ष 2026 के नालंदा की अपराध तस्वीर को एक साथ रखकर देखा जाए तो अंतर साफ नजर आता है।
| पहलू | लगभग 2000–2006 | वर्ष 2026 |
|---|---|---|
| अपराध का मुख्य स्वरूप | अपहरण, लूट, रंगदारी | साइबर ठगी, डिजिटल फ्रॉड |
| अपराध का माध्यम | बंदूक, वाहन, सड़क | मोबाइल, इंटरनेट, बैंकिंग |
| संगठित गिरोह | गैंगवार और वर्चस्व | डिजिटल नेटवर्क और आर्थिक अपराध |
| अपहरण | फिरौती के लिए अपहरण | डिजिटल धमकी/हाउस अरेस्ट |
| शराब | वैध बिक्री | तस्करी और अवैध कारोबार |
| हथियार | अपराध में प्रमुख भूमिका | कई मामलों में डिजिटल माध्यम प्रमुख |
| पुलिस जांच | घटनास्थल और भौतिक साक्ष्य | डिजिटल एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य |
| अपराध का दायरा | मुख्यतः स्थानीय | राज्य और देशभर के पीड़ित |
‘बंदूक से मोबाइल’ तक पहुंचा अपराध
नालंदा के पिछले करीब 26 वर्षों के अपराध इतिहास को अगर एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है—
“अपराध खत्म नहीं हुआ, उसका तरीका बदल गया।”
वर्ष 1998 के आसपास निमोछिया जैसे गिरोहों से लेकर 2000 के दशक के अपहरण और रोड होल्डअप, 2010 के दशक के अवैध शराब नेटवर्क और 2020 के दशक के साइबर अपराध तक अपराध का पूरा मॉडल बदल गया।
पहले अपराधी को पीड़ित के सामने जाना पड़ता था। अब वह हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी किसी के बैंक खाते तक पहुंच सकता है।
पहले रंगदारी के लिए अपराधी दरवाजे पर पहुंचता था। आज एक फोन कॉल या वीडियो कॉल के जरिए किसी परिवार को डराकर लाखों रुपये ट्रांसफर कराए जा सकते हैं।
पहले अपराध का निशान सड़क पर मिलता था, अब वह मोबाइल स्क्रीन, बैंक खाते और डिजिटल ट्रांजेक्शन में छिपा होता है।
चुनौती अब भी कायम, लेकिन पुलिसिंग भी बदली
नालंदा के सामने आज चुनौती सिर्फ पारंपरिक अपराधियों से निपटने की नहीं है। पुलिस को अब ऐसे अपराधियों से भी मुकाबला करना पड़ रहा है जो तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, अपनी वास्तविक पहचान छिपा रहे हैं और देश के दूसरे हिस्सों में बैठे लोगों को निशाना बना रहे हैं।
साथ ही शराब तस्करी, नशे का कारोबार, महिलाओं के खिलाफ अपराध, जमीनी विवाद, आपसी रंजिश और स्थानीय हिंसा जैसी पारंपरिक चुनौतियां भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।
इसलिए नालंदा की वर्तमान अपराध तस्वीर को सिर्फ ‘साइबर क्राइम’ तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा।
आज नालंदा में अपराध के पुराने और नए दोनों रूप मौजूद हैं—फर्क सिर्फ इतना है कि अपराधी के हाथ में अब बंदूक के साथ-साथ मोबाइल भी आ गया है।