उरांव और मुंडा समुदायों के ऐतिहासिक मेल-मिलाप की स्मृतियों से जुड़ा है आयोजन, 40 पड़हा की परंपरा और जतरा खूंटा की पूजा है प्रमुख पहचान; राजकीय मेले के आयोजन के लिए झारखंड सरकार देती है 70 लाख रुपये का अनुदान
रांची। झारखंड की समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक परंपराओं और सामुदायिक एकता का प्रतीक मुड़मा जतरा आज भी अपनी विशिष्ट पहचान के साथ जीवंत है। रांची जिले के मांडर प्रखंड स्थित मुड़मा गांव में आयोजित होने वाला यह ऐतिहासिक मेला केवल धार्मिक आस्था या खरीदारी का केंद्र नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सामूहिक स्मृतियों, पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक अस्मिता का महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। लगभग 1400 वर्षों की परंपरा से जुड़ा यह जतरा विशेष रूप से उरांव (कुड़ुख) और मुंडा जनजातियों के ऐतिहासिक संबंधों, पारस्परिक सहयोग और सामाजिक एकजुटता की स्मृति को आगे बढ़ाता है।
राजकीय मेले के रूप में स्थापित मुड़मा जतरा में हर वर्ष विभिन्न गांवों और पड़हा इकाइयों से जुड़े लोग जुटते हैं। पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान, जतरा खूंटा की पूजा, लोकगीत, मांदर की थाप, पारंपरिक वाद्ययंत्र और सामूहिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां इस आयोजन को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती हैं। झारखंड के अतिरिक्त पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ सहित दूसरे क्षेत्रों के जनजातीय समुदायों की भागीदारी भी इसकी व्यापक सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित करती है।
उरांव और मुंडा समुदायों के ऐतिहासिक संबंधों की स्मृति
मुड़मा जतरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि छोटानागपुर क्षेत्र में उरांव और मुंडा समुदायों के बीच स्थापित संबंधों की परंपरा से जुड़ी है। प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, रोहतासगढ़ पर मुगलों के आक्रमण के बाद उरांव समुदाय को अपना गढ़ छोड़ना पड़ा था। इसके बाद समुदाय के लोगों ने सोन नदी पार की और पलामू के रास्ते छोटानागपुर क्षेत्र की ओर प्रस्थान किया। इसी क्रम में उनके मुड़मा पहुंचने का उल्लेख मिलता है।

मान्यता के अनुसार, मुड़मा पहुंचने पर उरांव समुदाय का सामना वहां पहले से रह रहे मुंडा जनजाति के मुखियाओं से हुआ। नए क्षेत्र में बसने और भूमि के उपयोग को लेकर उत्पन्न परिस्थितियों के बीच तत्कालीन छोटानागपुर महाराजा ने मध्यस्थता की। प्रचलित विवरण के अनुसार, उनके हस्तक्षेप से ऐसा समझौता हुआ, जिसके तहत उरांव समुदाय को पश्चिमी वन क्षेत्र में बसने की सहमति मिली।
इसी ऐतिहासिक समझौते, आपसी सहमति और मेल-मिलाप की स्मृति को मुड़मा जतरा की परंपरा का आधार माना जाता है। यह आयोजन उस सामाजिक संबंध का प्रतीक है, जिसमें संघर्ष की परिस्थितियों के बीच भी संवाद, सहयोग और सह-अस्तित्व को महत्त्व दिया गया।
इस परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह आदिवासी समाज की ऐतिहासिक स्मृतियों को केवल अतीत की घटनाओं तक सीमित नहीं रखती, बल्कि वर्तमान पीढ़ी को सामुदायिक संबंधों और सांस्कृतिक निरंतरता का संदेश देती है।
40 पड़हा की परंपरा है जतरा की विशिष्ट पहचान
मुड़मा जतरा की सबसे प्रमुख विशेषताओं में उरांव समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी 40 पड़हा की परंपरा शामिल है। पड़हा छोटानागपुर क्षेत्र के आदिवासी समाज की पारंपरिक सामुदायिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग रहा है। इसके माध्यम से विभिन्न गांवों के बीच सामाजिक संबंधों, परंपरागत दायित्वों और सामुदायिक विषयों का संचालन किया जाता रहा है।

मुड़मा जतरा में 40 पड़हा की भागीदारी केवल आयोजन की परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि सामूहिक संगठन और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है। विभिन्न पड़हा से जुड़े प्रतिनिधियों और पारंपरिक पदाधिकारियों की सहभागिता इस बात को रेखांकित करती है कि जतरा का स्वरूप धार्मिक आयोजन से कहीं व्यापक है।
पड़हा व्यवस्था आदिवासी समाज की पारंपरिक संस्थागत संरचना और सामुदायिक जीवन की निरंतरता को सामने लाती है। इसमें पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक मान्यताओं, पारंपरिक नेतृत्व और सामूहिक सहभागिता का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।
मुड़मा जतरा के अवसर पर विभिन्न पड़हा से जुड़े लोगों का एक मंच पर एकत्र होना सामाजिक संवाद, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पारंपरिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। यही कारण है कि 40 पड़हा की परंपरा इस ऐतिहासिक आयोजन की पहचान का केंद्रीय हिस्सा मानी जाती है।
जतरा खूंटा की पूजा से होता है परंपरा का निर्वाह
मुड़मा जतरा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व जतरा खूंटा की पूजा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। जतरा स्थल पर स्थित इस पारंपरिक प्रतीक को समुदाय की आस्था, सांस्कृतिक स्मृतियों और सामूहिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।

परंपरा के अनुसार, जतरा के अवसर पर पाहन यानी आदिवासी पुजारी धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराते हैं। पूजा-अर्चना और दीप प्रज्वलन के साथ पारंपरिक विधि-विधान का निर्वाह किया जाता है। स्थानीय धार्मिक परंपरा में सफेद और काले मुर्गों की बलि का भी उल्लेख है।
इन अनुष्ठानों का महत्त्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इनके माध्यम से समुदाय अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाता है और नई पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराता है। जतरा खूंटा इस दृष्टि से अतीत और वर्तमान के बीच एक सांस्कृतिक कड़ी के रूप में भी महत्त्व रखता है।
मुड़मा जतरा की धार्मिक परंपराएं यह स्पष्ट करती हैं कि आदिवासी संस्कृति में आस्था, सामाजिक जीवन और सामुदायिक पहचान एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
मांदर की थाप, पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक उत्सव
मुड़मा जतरा के दौरान पूरा क्षेत्र जनजातीय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से जीवंत हो उठता है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन, मांदर की थाप, लोकगीत और सामूहिक नृत्य इस आयोजन के उत्सवी स्वरूप को विशेष पहचान देते हैं।

विभिन्न गांवों और पड़हा से जुड़े लोग अपने पारंपरिक प्रतीकों, झंडों और सांस्कृतिक पहचान के साथ जतरा में भाग लेते हैं। खोड़हा यानी पारंपरिक नृत्य दलों की भागीदारी इस आयोजन की सांस्कृतिक जीवंतता को सामने लाती है। पारंपरिक वेशभूषा और सामूहिक प्रस्तुतियों के माध्यम से लोग अपनी विरासत के प्रति जुड़ाव व्यक्त करते हैं।
झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से आने वाले जनजातीय समुदायों की सहभागिता इस आयोजन के व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व को दर्शाती है। विभिन्न क्षेत्रों से लोगों का जुटना सांस्कृतिक संपर्क और पारस्परिक परिचय को बढ़ावा देता है।
इस प्रकार मुड़मा जतरा लोकसंस्कृति के संरक्षण और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन का एक महत्त्वपूर्ण अवसर बनता है। यहां परंपरा केवल स्मरण नहीं की जाती, बल्कि सामूहिक सहभागिता के माध्यम से उसे वर्तमान जीवन में भी जीवित रखा जाता है।
सामाजिक एकता और सांस्कृतिक अस्मिता का संगम
मुड़मा जतरा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी सामुदायिक भावना है। यह आयोजन विभिन्न गांवों और सामाजिक इकाइयों से जुड़े लोगों को एक साथ लाता है। धार्मिक अनुष्ठानों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और मेल-मिलाप के माध्यम से लोगों के बीच पारंपरिक संबंध मजबूत होते हैं।

उरांव और मुंडा समुदायों के संबंधों से जुड़ी ऐतिहासिक स्मृतियां इस आयोजन को विशेष अर्थ प्रदान करती हैं। यह परंपरा सामाजिक सहमति, पारस्परिक सहयोग और साथ मिलकर रहने की भावना को रेखांकित करती है।
हालांकि, आदिवासी समाज की विविधता को समझना भी उतना ही आवश्यक है। विभिन्न जनजातीय समुदायों की भाषाएं, रीति-रिवाज, धार्मिक मान्यताएं और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां अलग-अलग हो सकती हैं। मुड़मा जतरा की विशिष्टता को समझने के लिए इससे जुड़े समुदायों की अपनी परंपराओं, ऐतिहासिक अनुभवों और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों को उचित महत्त्व देना जरूरी है।
यह आयोजन इस बात का भी उदाहरण है कि सांस्कृतिक विरासत किसी समुदाय की सामूहिक स्मृति और सामाजिक संबंधों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है। ऐसी परंपराएं बदलते समय में भी समुदायों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
राजकीय मेले की मान्यता और सरकार का 70 लाख रुपये का अनुदान
मुड़मा जतरा को राजकीय मेले की मान्यता प्राप्त है। झारखंड सरकार की ओर से इसके आयोजन के लिए 70 लाख रुपये का अनुदान दिया जाता है। यह सहायता मेले के व्यापक आयोजन और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं के लिए महत्त्वपूर्ण है।

राजकीय पहचान के साथ मुड़मा जतरा का महत्त्व प्रशासनिक और सार्वजनिक स्तर पर भी बढ़ा है। इतने बड़े पारंपरिक आयोजन में श्रद्धालुओं और आगंतुकों की सुविधा, सुरक्षा, स्वच्छता, यातायात प्रबंधन और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं का विशेष महत्त्व होता है।
हालांकि, किसी सांस्कृतिक आयोजन की वास्तविक पहचान केवल सरकारी मान्यता या वित्तीय सहायता से निर्धारित नहीं होती। उसकी मूल शक्ति स्थानीय समुदायों की सहभागिता, पारंपरिक संस्थाओं की भूमिका और सांस्कृतिक मूल्यों के निरंतर निर्वाह में निहित होती है।
इसलिए आवश्यक है कि आयोजन की व्यवस्थाओं के साथ-साथ उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को भी समान प्राथमिकता दी जाए। स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना, पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित रखना और नई पीढ़ी को इस विरासत से जोड़ना इसके दीर्घकालीन संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण है।
अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में जुटता है जनसमुदाय
मुड़मा जतरा का आयोजन परंपरागत रूप से दशहरे के बाद होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह कार्तिक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा की रात और द्वितीया के दिन से जुड़ा है। सामान्यतः अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में आयोजित होने वाला यह जतरा हर वर्ष बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित करता है। हालांकि, किसी विशेष वर्ष में आयोजन की तारीख और कार्यक्रम स्थानीय आयोजकों की निर्धारित व्यवस्था के अनुसार होते हैं।

इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक गतिविधियां और मेले से जुड़ी अन्य गतिविधियां भी संचालित होती हैं। विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले लोगों के लिए यह अपनी परंपराओं से जुड़ने, परिचितों से मिलने और सामुदायिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर होता है।
जतरा का यह स्वरूप ग्रामीण और जनजातीय जीवन की उस परंपरा को सामने लाता है, जिसमें धार्मिक आयोजन, सामाजिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति एक-दूसरे के पूरक होते हैं।
सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की जिम्मेदारी
तेजी से बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में पारंपरिक मेलों तथा सांस्कृतिक आयोजनों का महत्त्व और बढ़ जाता है। ऐसे आयोजन समुदायों को अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों, पारंपरिक कलाओं और सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहने का अवसर प्रदान करते हैं।
मुड़मा जतरा की विरासत को संरक्षित रखने के लिए आवश्यक है कि इससे संबंधित मौखिक इतिहास, पारंपरिक अनुष्ठानों, लोकगीतों और सामाजिक व्यवस्थाओं का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाए। स्थानीय बुजुर्गों, पाहनों, पारंपरिक नेतृत्व और समुदाय के अन्य जानकार लोगों के अनुभवों को दर्ज करना इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है।

इसके साथ ही, सांस्कृतिक विरासत को केवल पर्यटन या मनोरंजन के दृष्टिकोण से देखने के बजाय उसके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों को समझना जरूरी है। आयोजन की गरिमा बनाए रखने के लिए स्थानीय रीति-रिवाजों का सम्मान और समुदायों की सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखना भी आवश्यक है।
मुड़मा जतरा की परंपरा तभी अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आगे बढ़ सकेगी, जब इसके विस्तार के साथ-साथ इसकी मूल सांस्कृतिक भावना और सामुदायिक सहभागिता भी सुरक्षित रहेगी।
अतीत की स्मृतियों से भविष्य की पीढ़ियों तक
मुड़मा जतरा झारखंड की जनजातीय विरासत का ऐसा महत्त्वपूर्ण आयोजन है, जिसमें इतिहास, आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक अस्मिता का संगम दिखाई देता है। लगभग 1400 वर्षों की परंपरा से जुड़ा यह राजकीय मेला उरांव और मुंडा समुदायों की ऐतिहासिक स्मृतियों, 40 पड़हा की पारंपरिक व्यवस्था और जतरा खूंटा की पूजा के कारण विशिष्ट पहचान रखता है।
इसका महत्त्व केवल एक वार्षिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह समुदायों को अपनी जड़ों से जोड़ता है, पारंपरिक संबंधों को मजबूत करता है और सांस्कृतिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर देता है।

मुड़मा जतरा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह परंपरा को केवल अतीत की धरोहर बनाकर नहीं रखता, बल्कि उसे सामूहिक जीवन का हिस्सा बनाए रखता है। इसकी निरंतरता में आदिवासी समाज की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक संगठन और अपनी पहचान के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है।
इस ऐतिहासिक जतरा का संरक्षण वस्तुतः झारखंड की सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय विरासत के संरक्षण का ही एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
