19 अक्टूबर 1870 को जन्मीं मातंगिनी हज़ारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उन निर्भीक सेनानियों में गिनी जाती हैं, जिन्होंने उम्र, गरीबी और सामाजिक सीमाओं को अपने रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया। ‘गाँधी बुढ़ी’ के नाम से प्रसिद्ध मातंगिनी 29 सितंबर 1942 को बंगाल के मिदनापुर जिले के तामलुक में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तिरंगा लेकर निकले जुलूस का नेतृत्व करते हुए ब्रिटिश पुलिस की गोलीबारी में शहीद हुईं। उनके बारे में प्रचलित विवरण बताते हैं कि घायल होने के बाद भी वे ‘वंदे मातरम्’ कहती हुई आगे बढ़ती रहीं और झंडा थामे हुए प्राण त्यागे।
कौन थीं मातंगिनी हज़ारा?
मातंगिनी हज़ारा का जन्म बंगाल के तामलुक के निकट होगला गाँव में हुआ था। उनके जन्म-वर्ष को लेकर स्रोतों में 1869 और 1870, दोनों उल्लेख मिलते हैं; भारत सरकार के स्वतंत्रता सेनानी संबंधी प्रकाशन में 19 अक्टूबर 1870 की तारीख दी गई है। कम उम्र में विवाह और फिर विधवा होने के बाद उनका जीवन कठिन परिस्थितियों में बीता। औपचारिक शिक्षा न मिलने के बावजूद वे धीरे-धीरे जन आंदोलनों से जुड़ीं और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुईं। इसी कारण उन्हें स्नेहपूर्वक ‘गाँधी बुढ़ी’ कहा जाने लगा।
स्वाधीनता आंदोलन में भागीदारी
मातंगिनी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक कानून के विरोध सहित ब्रिटिश शासन के खिलाफ विभिन्न अभियानों में भाग लिया। चौकीदारी कर के विरोध से जुड़े आंदोलन में उनकी सक्रियता के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उनका संघर्ष केवल प्रतीकात्मक नहीं था; वे जुलूसों, सभाओं और स्थानीय जन-प्रतिरोध में सक्रिय रूप से शामिल रहीं।
29 सितंबर 1942: तिरंगे के साथ अंतिम मार्च
भारत छोड़ो आंदोलन के बाद मिदनापुर के तामलुक क्षेत्र में औपनिवेशिक प्रशासन को चुनौती देने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे। 29 सितंबर 1942 को हजारों लोगों का जुलूस तामलुक थाने और सरकारी इमारतों की ओर बढ़ा। मातंगिनी हज़ारा जुलूस के अग्रभाग में थीं। पुलिस की गोलीबारी में वे गंभीर रूप से घायल हुईं और शहीद हो गईं। ऐतिहासिक विवरणों में उनका तिरंगा थामे रहना और ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष करना उनके साहस की पहचान के रूप में दर्ज है। यह घटना भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बंगाल में जन-प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनी।

बिहार और झारखंड से ऐतिहासिक जुड़ाव: तथ्य क्या कहते हैं?
मातंगिनी हज़ारा का जन्मस्थान और उनका निर्णायक आंदोलन बंगाल के मिदनापुर-तामलुक क्षेत्र में था, जो आज पश्चिम बंगाल में है। इसलिए उन्हें बिहार या झारखंड की मूल निवासी बताना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। बिहार और बंगाल का प्रशासनिक संबंध भी समय के साथ बदला: बिहार और उड़ीसा को 1912 में बंगाल से अलग प्रांत बनाया गया था। 1942 में झारखंड के क्षेत्र बिहार प्रांत का हिस्सा थे; उन्हें उस समय बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा बताना सही नहीं है।
इसका अर्थ यह नहीं कि मातंगिनी हज़ारा की विरासत केवल बंगाल तक सीमित थी। भारत छोड़ो आंदोलन एक अखिल भारतीय संघर्ष था, और बंगाल सहित विभिन्न क्षेत्रों के स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान ने देशभर में स्वतंत्रता की भावना को बल दिया। बिहार और वर्तमान झारखंड के आंदोलनकारियों के लिए भी ऐसी शहादतें राष्ट्रीय संघर्ष की व्यापक प्रेरक विरासत का हिस्सा थीं। हालांकि, मातंगिनी के आंदोलन का बिहार या झारखंड में कोई विशिष्ट प्रत्यक्ष अभियान-संबंध स्थापित करने के लिए अलग स्थानीय ऐतिहासिक प्रमाण आवश्यक होंगे।
एक साहस जो स्मृति में जीवित है
मातंगिनी हज़ारा की कहानी हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल बड़े नेताओं तक सीमित नहीं था। साधारण पृष्ठभूमि से आईं महिलाएँ, किसान, विद्यार्थी और स्थानीय स्वयंसेवक भी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में खड़े थे। मातंगिनी का तिरंगा थामे आगे बढ़ना आज भी साहस, जनभागीदारी और स्वतंत्रता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
उनकी शहादत को याद करने का सबसे सटीक तरीका है—उनके वास्तविक जीवन और संघर्ष का सम्मान करना, साथ ही इतिहास के क्षेत्रीय तथ्यों को सही संदर्भ में समझना। मातंगिनी हज़ारा बंगाल की धरती से उठीं, लेकिन स्वतंत्र भारत की साझा स्मृति में उनका स्थान पूरे देश का है।

