विशेष लेख | 7 नवंबर | विज्ञान एवं अंतरिक्ष इतिहास | मंगल अन्वेषण
7 नवंबर 1996 को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने मंगल ग्रह के रहस्यों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण रोबोटिक अंतरिक्ष यान मार्स ग्लोबल सर्वेयर (Mars Global Surveyor—MGS) प्रक्षेपित किया। फ्लोरिडा के केप कैनावेरल से डेल्टा-II रॉकेट के जरिए रवाना हुआ यह ऑर्बिटर मंगल की कक्षा में पहुंचकर लगभग एक दशक तक ग्रह की सतह, वातावरण, स्थलाकृति, गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय गुणों का अध्ययन करता रहा। इसके आंकड़ों ने मंगल के भूवैज्ञानिक इतिहास और वहां पानी की संभावित भूमिका को समझने में वैज्ञानिकों की मदद की।
7 नवंबर 1996: केप कैनावेरल से मंगल की ओर उड़ान
मार्स ग्लोबल सर्वेयर का प्रक्षेपण 7 नवंबर 1996 को स्थानीय समय के अनुसार दोपहर 12 बजकर 00 मिनट 49 सेकंड पर फ्लोरिडा स्थित केप कैनावेरल एयर स्टेशन के लॉन्च कॉम्प्लेक्स 17A से हुआ। इसे तीन चरणों वाले डेल्टा-II 7925 प्रक्षेपण यान ने अंतरिक्ष की ओर रवाना किया। यह मिशन नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) के नेतृत्व में विकसित किया गया था।
इस मिशन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य 1993 में संपर्क खो चुके मार्स ऑब्जर्वर मिशन के कई वैज्ञानिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाना था। मार्स ऑब्जर्वर के असफल होने के बाद मंगल के वैश्विक अध्ययन की योजना को नए अंतरिक्ष यान के जरिए पूरा करने का प्रयास किया गया। मार्स ग्लोबल सर्वेयर ने इसी वैज्ञानिक विरासत को आगे बढ़ाया और मंगल की व्यवस्थित मैपिंग के लिए एक नया अध्याय शुरू किया।

मिशन का उद्देश्य: मंगल का वैश्विक मानचित्र तैयार करना
मार्स ग्लोबल सर्वेयर का लक्ष्य केवल मंगल की कुछ तस्वीरें लेना नहीं था। इसे ग्रह की सतह और वातावरण का व्यापक सर्वेक्षण करने के लिए बनाया गया था। वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि मंगल की भौगोलिक संरचना कैसी है, वहां की जलवायु किस तरह बदलती है, सतह पर कौन-कौन से खनिज मौजूद हैं, ग्रह का गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र कैसे वितरित है और उसके प्राचीन चुंबकीय इतिहास के क्या संकेत मिलते हैं।
अंतरिक्ष यान में छह प्रमुख वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए थे:
- Mars Orbiter Camera (MOC): मंगल की सतह की विस्तृत तस्वीरें लेने और मौसम संबंधी बादलों तथा धूल की गतिविधियों को देखने के लिए।
- Mars Orbiter Laser Altimeter (MOLA): लेजर की मदद से सतह की ऊंचाई मापने और ग्रह का सटीक स्थलाकृतिक मानचित्र बनाने के लिए।
- Thermal Emission Spectrometer (TES): सतह और वातावरण से निकलने वाली अवरक्त ऊर्जा का अध्ययन कर खनिज संरचना, धूल और तापीय गुणों को समझने के लिए।
- Magnetometer/Electron Reflectometer: मंगल के चुंबकीय क्षेत्र और उसकी सतही तथा अंतरिक्षीय अंतःक्रियाओं की जांच के लिए।
- Radio Science Experiment: रेडियो संकेतों के विश्लेषण से ग्रह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र और वायुमंडलीय गुणों का अध्ययन करने के लिए।
- Mars Relay Antenna: मंगल की सतह पर उतरने वाले भविष्य के लैंडर और रोवर अभियानों के संचार में सहायता देने के लिए।
मंगल तक दस महीने की यात्रा और कक्षा में प्रवेश
पृथ्वी से मंगल तक की यात्रा लगभग दस महीने चली। 12 सितंबर 1997 को मार्स ग्लोबल सर्वेयर ने अपना मुख्य इंजन चालू कर मंगल की गुरुत्वाकर्षण पकड़ में प्रवेश किया और एक अत्यधिक अंडाकार कक्षा में स्थापित हुआ। यह चरण मिशन के लिए निर्णायक था, क्योंकि अंतरिक्ष यान को वैज्ञानिक मैपिंग के लिए कम ऊंचाई वाली लगभग वृत्ताकार कक्षा में पहुंचना था।
प्रक्षेपण के बाद एक सौर पैनल पूरी तरह खुलकर अपनी निर्धारित स्थिति में लॉक नहीं हो पाया था और लगभग 20 डिग्री के कोण पर रह गया। इससे अंतरिक्ष यान की ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर नहीं पड़ा, लेकिन मंगल के वातावरण की मदद से कक्षा बदलने की योजना जटिल हो गई। इंजीनियरों ने मिशन को बचाने के लिए एयरोब्रेकिंग की प्रक्रिया में बदलाव किया।

एयरोब्रेकिंग: ग्रह के वातावरण को ब्रेक की तरह इस्तेमाल करना
एयरोब्रेकिंग (Aerobraking) ऐसी तकनीक है जिसमें अंतरिक्ष यान ग्रह के ऊपरी, अत्यंत विरल वातावरण से बार-बार गुजरता है। वातावरण का हल्का घर्षण उसकी गति और कक्षा की ऊंचाई को धीरे-धीरे कम करता है। इससे बड़ी मात्रा में ईंधन खर्च किए बिना अंतरिक्ष यान को वांछित कक्षा में पहुंचाया जा सकता है।
मार्स ग्लोबल सर्वेयर के सौर पैनल की समस्या के कारण इंजीनियरों को वातावरण में प्रवेश की गहराई और प्रक्रिया की गति को सावधानी से नियंत्रित करना पड़ा। जिस एयरोब्रेकिंग चरण को लगभग 130 दिनों में पूरा करने की योजना थी, उसमें करीब 17 महीने लग गए। इसके बावजूद अंतरिक्ष यान फरवरी 1999 में अपनी नियोजित मैपिंग कक्षा के करीब पहुंच गया और 9 मार्च 1999 से उसका प्राथमिक वैश्विक मानचित्रण अभियान शुरू हुआ।
मंगल के बारे में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजें
मार्स ग्लोबल सर्वेयर ने मंगल की सतह की दो लाख से अधिक तस्वीरें और विशाल मात्रा में वैज्ञानिक आंकड़े पृथ्वी तक पहुंचाए। उसके अवलोकनों ने मंगल को एक स्थिर, निर्जीव और भूवैज्ञानिक रूप से निष्क्रिय दुनिया मानने वाली सरल धारणा को चुनौती दी।
1. प्राचीन चुंबकीय क्षेत्र के प्रमाण
मैग्नेटोमीटर के आंकड़ों ने मंगल की पपड़ी में शक्तिशाली लेकिन स्थानीयकृत चुंबकीय विसंगतियों का पता लगाया। इससे संकेत मिला कि ग्रह के शुरुआती इतिहास में उसकी पपड़ी के कुछ हिस्से ऐसे समय में ठंडे हुए होंगे जब मंगल के पास वैश्विक चुंबकीय क्षेत्र मौजूद था। आज पृथ्वी की तरह मंगल के चारों ओर वैश्विक चुंबकीय कवच नहीं है; उसकी पपड़ी में पुराने चुंबकीय इतिहास के निशान सुरक्षित हैं।

2. पानी से जुड़ी भू-आकृतियों के संकेत
मार्स ऑर्बिटर कैमरा ने कुछ ढलानों पर छोटी नालियों और गली (gullies) जैसी संरचनाएं देखीं। इन संरचनाओं ने वैज्ञानिकों के बीच यह प्रश्न उठाया कि क्या मंगल की सतह या उसके निकट अतीत में तरल पानी बहा है और क्या कुछ परिस्थितियों में आज भी पानी से जुड़ी प्रक्रियाएं सक्रिय हो सकती हैं। इन तस्वीरों को मंगल पर वर्तमान में स्थायी बहते पानी का निर्णायक प्रमाण नहीं समझना चाहिए; वे पानी की भूमिका की जांच के लिए महत्वपूर्ण संकेत थे।
3. सतह की ऊंचाई और विशाल भू-आकृतियों का मानचित्रण
लेजर अल्टीमीटर ने मंगल की सतह की ऊंचाई मापकर ग्रह का वैश्विक स्थलाकृतिक चित्र तैयार करने में मदद की। इससे विशाल ज्वालामुखियों, गहरे प्रभाव-गर्तों, घाटियों और उत्तरी-दक्षिणी गोलार्धों के बीच ऊंचाई के अंतर का अधिक व्यवस्थित अध्ययन संभव हुआ।
4. मौसम और जलवायु की निगरानी
अंतरिक्ष यान ने धूल भरी आंधियों, बादलों, ध्रुवीय बर्फ और मौसमी बदलावों का अवलोकन किया। इससे वैज्ञानिकों को मंगल के वातावरण की गतिशीलता और ऋतुओं के साथ बदलते पैटर्न को समझने में मदद मिली।
बाद के मंगल अभियानों के लिए आधार
मार्स ग्लोबल सर्वेयर का योगदान उसके अपने वैज्ञानिक परिणामों तक सीमित नहीं रहा। इसके द्वारा पहचाने गए खनिजों, सतही संरचनाओं और संभावित जल-संबंधी क्षेत्रों के आंकड़ों ने बाद के मंगल अभियानों के लिए उपयोगी संदर्भ उपलब्ध कराया। मिशन ने मंगल की कक्षा में रहते हुए अन्य अंतरिक्ष यानों के लिए वातावरण संबंधी जानकारी भी जुटाई और रोवर अभियानों के संचार में रिले सहायता देने की क्षमता विकसित की।

विशेष रूप से मंगल की सतह पर उतरने वाले अभियानों के लिए सुरक्षित और वैज्ञानिक रूप से उपयोगी स्थान चुनने में वैश्विक मानचित्रों का महत्व रहा। मार्स ग्लोबल सर्वेयर के अवलोकनों ने मंगल के अध्ययन को अलग-अलग तस्वीरों से आगे बढ़ाकर तुलनात्मक और वैश्विक विज्ञान में बदलने में योगदान दिया।
14 नवंबर 2006: लगभग एक दशक बाद मिशन का अंत
मार्स ग्लोबल सर्वेयर ने 1999 से अपने मुख्य मानचित्रण अभियान को संचालित किया और उसके बाद विस्तारित मिशन में भी काम जारी रखा। 2006 में अंतरिक्ष यान से संपर्क टूट गया। नासा के अनुसार, नवंबर 2006 में हुई घटनाओं की एक श्रृंखला—जिसमें कंप्यूटर संबंधी त्रुटि और संभवतः बैटरी की विफलता शामिल थी—के कारण अंतरिक्ष यान ने पृथ्वी से संपर्क करना बंद कर दिया। 14 नवंबर 2006 को मिशन का अंत घोषित किया गया।
अपने संचालन काल में इस ऑर्बिटर ने मंगल के बारे में वैज्ञानिक समझ को गहराई दी और भविष्य के रोबोटिक अभियानों के लिए मूल्यवान डेटा छोड़ा। अंतरिक्ष यान भले ही निष्क्रिय हो गया, लेकिन उसके द्वारा भेजे गए आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण आगे भी जारी रहा।
निष्कर्ष: मंगल को समझने की दिशा में निर्णायक मिशन
7 नवंबर 1996 को प्रक्षेपित मार्स ग्लोबल सर्वेयर ने मंगल ग्रह के अध्ययन को नई वैज्ञानिक ऊंचाई दी। उसने ग्रह की सतह का मानचित्रण किया, चुंबकीय इतिहास के संकेत खोजे, जल-संबंधी भू-आकृतियों का अध्ययन किया और बाद के रोवर अभियानों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई। एक खराब सौर पैनल के बावजूद एयरोब्रेकिंग की जटिल प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करना अंतरिक्ष इंजीनियरिंग की उल्लेखनीय उपलब्धि थी।

इस मिशन की सबसे बड़ी विरासत यह है कि इसने मंगल को केवल दूर से दिखाई देने वाले लाल ग्रह के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल भूवैज्ञानिक और जलवायवीय दुनिया के रूप में समझने का रास्ता मजबूत किया। मार्स ग्लोबल सर्वेयर का प्रक्षेपण आधुनिक रोबोटिक अंतरिक्ष अन्वेषण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बना हुआ है।
