आज लता मंगेशकर का जन्म दिवस है। लोग उन्हें प्यार से लता दी कहते हैं। जब वह गाती थीं तो लगता था जैसे साक्षात सरस्वती उनकी जिह्वा पर बैठ वीणा की तान छेड़ देती थीं। इस सुरों की मल्लिका की आवाज में गजब का जादुई सम्मोहन था। उनके स्वर में भारतीय गीत-संगीत का एक वृहत्तर और विराट युग साकार हो उठता है। सुरों की इस साधिका की गायिकी की शुरुआत 13 साल की उम्र में ही हो गई थी। यह यात्रा 2022 तक चली।
लता दी के स्वर में हजारों अविस्मरणीय गीतों की थाती हम सब के बीच मौजूद है। उनके गीतों में लोक की कई देशज अभिव्यक्तियों का अद्भुत और अतुलनीय विस्तार देखने-सुनने को मिलता है। गायिकी का उनका फलक काफी व्यापक है। उन्होंने भावगीत, स्त्रोत पाठ, भजन, कव्वाली के साथ-साथ नात, अभंग, हीर और पदावली गायन तक को गाया। उनका सांगीतिक संसार बहुआयामी था।
लता मंगेशकर
स्वर कोकिला • भारत रत्न • महान पार्श्वगायिका
माता-पिता और भाई-बहन
| रिश्ता | नाम | परिचय |
|---|---|---|
| पिता | पंडित दीनानाथ मंगेशकर | गायक और मराठी संगीत नाटक कलाकार |
| माता | शेवंती मंगेशकर | परिवार की मातृशक्ति |
| बहन | मीना खडीकर | गायिका और संगीतकार |
| बहन | आशा भोसले | प्रसिद्ध पार्श्वगायिका |
| बहन | उषा मंगेशकर | गायिका |
| भाई | हृदयनाथ मंगेशकर | संगीतकार और गायक |
13 साल की उम्र में शुरू हुई गायिकी की यात्रा
1942 में पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर के निधन के बाद किशोरवय में ही घर की जिम्मेदारियां उठा लीं। पर यह इतना आसान नहीं था। तब लता जी ने गायिकी को ही अपने और अपने परिवार की जीविका के लिए माध्यम बनाया। पहला गीत 13 साल की उम्र में मराठी फिल्म किती हसाल के लिए रिकॉर्ड कराया था। अभिनय भी किया, पर मुकाम गायिकी में बनाया।
आधुनिक भारतीय सांगीतिक इतिहास की कई स्मृतियां जिस कालखंड में आकार लेती हैं, उसे लता दी ने भी समृद्ध किया। उन्होंने अपने गीतों में संगीत की बारीकियां, शुचिता, नवोन्मेष और शास्त्रीय शुद्धता का अद्भुत संतुलन बनाए रखा। उनकी मौलिक और मखमली आवाज का जादू अब भी संगीत प्रेमियों को सम्मोहित करता है।
सोलो गीत को लेकर उठे सवालों का दिया जवाब
जैसे रामधारी सिंह दिनकर को जब कहा जाने लगा कि वे केवल वीर रस की कविताएं ही लिख सकते हैं, तो उन्होंने उर्वशी श्रृंगार रस में लिखकर सबका मुंह बंद किया, उसी तरह लता जी को भी सोलो गीत को लेकर कहा जाने लगा कि वे इसे नहीं गा सकतीं। ऐसे गीत आशा भोसले ही गा सकती हैं। लता जी ने सोलो गीत गाए और क्या खूब गाए। जैसे- चोरी-चोरी का रसिक बलमा… और मुगल-ए-आजम के प्यार किया तो डरना क्या से लेकर दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे फिल्म का गाना मेरे ख्वाबों में जो आए आदि।
संघर्ष के दिनों में परिवार की जिम्मेदारियां भी निभाईं
लता मंगेशकर अपने संघर्ष के दिनों में अपनी गायिकी के साथ-साथ पारिवारिक जिम्मेदारियां भी बखूबी निभाती रहीं। इंद्रजीत सिंह अपनी किताब गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर में लिखते हैं कि लता जी का भूखे रहकर लोकल ट्रेन का सफर करना और फिर पैदल स्टूडियो पहुंचना उनके संघर्ष का हिस्सा था।
सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक बड़े गुलाम अली खां ने लता जी के लिए कभी कहा था कि- कमबख्त कभी बेसुरी होती ही नहीं। यह उनकी बेमिसाल गायिकी का बड़ा पारितोषिक है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि लता मंगेशकर को क्रिकेट से भी बहुत प्रेम था। उसी तरह उनमें राष्ट्र प्रेम भी कूट-कूटकर भरा हुआ था। ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी को भला कौन भूल सकता है।
उनकी साधना में गुरुओं और संगीतकारों का बड़ा योगदान
उनकी साधना का इतना बड़ा विस्तार यूं ही नहीं हुआ था। उनकी असाधारण सफलता में साधना के साथ-साथ उस्ताद अमान अली खां भेंडीफाजारवाले, अमानत खां देवासवाले, भालजी पेंडारकर, मास्टर विनायक तथा संगीतकार मास्टर गुलाम हैदर, अनिल विश्वास और खेमचंद्र प्रकाश जैसे गुरुओं, शुभचिंतकों और मार्गदर्शकों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
नौशाद, एसडी बर्मन और रोशन की कालजयी धुनों से लेकर शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और एआर रहमान के आर्केस्ट्रेशन तक लता जी का स्वर आज भी सुनने का विलक्षण अनुभव देता है।
उनकी संगीत यात्रा का कैनवास बहुत विस्तृत है। इसीलिए उनकी संगीत यात्रा ने भारतीय स्वर-संस्कृति को विश्व मंच पर पहचान दिलाई।
जन्म तिथि पर उनको नमन।