कोलकाता: भारत के समुद्री व्यापार और पूर्वी भारत की आर्थिक गतिविधियों में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले कलकत्ता पोर्ट के प्रशासनिक इतिहास में 17 अक्टूबर 1870 एक महत्वपूर्ण तारीख है। इसी दिन पोर्ट ऑफ कलकत्ता के सुधार और प्रबंधन के लिए नियुक्त कमिश्नरों के माध्यम से बंदरगाह का संचालन एक औपचारिक प्रशासनिक व्यवस्था के अधीन आया। यह व्यवस्था ब्रिटिश शासन के दौर में व्यापारिक आवाजाही, जहाजों की सुविधा और हुगली नदी के चुनौतीपूर्ण जलमार्ग के प्रबंधन से जुड़ी थी। आज यही ऐतिहासिक बंदरगाह श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट, कोलकाता के नाम से जाना जाता है।
17 अक्टूबर 1870: पोर्ट कमिश्नरों की व्यवस्था
भारत सरकार और बंदरगाह प्राधिकरण के ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1870 में पोर्ट ऑफ कलकत्ता के सुधार के लिए कमिश्नरों की नियुक्ति की गई। यह कदम Act V of 1870 के तहत उठाया गया था। इसका उद्देश्य बंदरगाह की सुविधाओं, संचालन और प्रशासन को अधिक व्यवस्थित बनाना था। इसीलिए 17 अक्टूबर 1870 को कोलकाता पोर्ट के संस्थागत इतिहास में एक अहम पड़ाव माना जाता है।
उस समय कलकत्ता ब्रिटिश भारत का एक प्रमुख प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र था। बंदरगाह से वस्तुओं का आयात-निर्यात, औद्योगिक गतिविधियों की आपूर्ति और पूर्वी भारत के बड़े भूभाग से व्यापार जुड़ा था। बंदरगाह का बेहतर प्रबंधन केवल जहाजों के आवागमन का सवाल नहीं था, बल्कि शहर और उसके विस्तृत व्यापारिक क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों से भी जुड़ा था।
हुगली नदी पर स्थित अनोखा बंदरगाह
कोलकाता पोर्ट की एक विशेषता यह है कि यह समुद्र के खुले तट पर नहीं, बल्कि हुगली नदी के भीतर स्थित एक नदीय प्रमुख बंदरगाह है। समुद्र से काफी अंदर होने के कारण जहाजों को लंबे और सावधानीपूर्वक नेविगेशन वाले जलमार्ग से गुजरना पड़ता है। नदी की गहराई, ज्वार-भाटा, गाद जमने और चैनल की स्थिति जैसे पहलू इसके संचालन को हमेशा महत्वपूर्ण बनाते रहे हैं।

बंदरगाह का प्रभाव कोलकाता शहर तक सीमित नहीं रहा। इसका व्यापारिक hinterland पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्रों तक फैला रहा, जिसमें बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्र भी शामिल रहे। समय के साथ नेपाल और भूटान जैसे स्थलरुद्ध पड़ोसी देशों के व्यापार के लिए भी यह मार्ग उपयोगी रहा। इस तरह कोलकाता पोर्ट पूर्वी भारत के लिए एक प्रमुख व्यापारिक प्रवेश-द्वार बना।
औपनिवेशिक व्यापार से आधुनिक बंदरगाह तक
बंदरगाह का विकास ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की जरूरतों से गहराई से जुड़ा था। कच्चे माल, निर्मित वस्तुओं और अन्य व्यापारिक माल की आवाजाही ने कलकत्ता को एक बड़े वाणिज्यिक केंद्र के रूप में विकसित करने में भूमिका निभाई। हालांकि, इस इतिहास को केवल व्यापारिक सफलता की कहानी के रूप में नहीं देखना चाहिए; बंदरगाह का निर्माण और संचालन औपनिवेशिक शासन की आर्थिक प्राथमिकताओं और सत्ता-संबंधों के भीतर हुआ था।
1870 में कमिश्नरों के अधीन व्यवस्था शुरू होने के बाद बंदरगाह पर सुविधाओं का विस्तार हुआ। उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में किडरपुर डॉक और बज-बज क्षेत्र में तेल से जुड़ी सुविधाओं का विकास हुआ। आगे चलकर जहाजों के आकार, माल की मात्रा और व्यापारिक जरूरतों में बदलाव के अनुसार बंदरगाह के ढाँचे में भी विस्तार किया गया।
पोर्ट कमिश्नरों से पोर्ट ट्रस्ट तक
कलकत्ता पोर्ट के प्रशासन में समय के साथ कई बदलाव हुए। पोर्ट कमिश्नरों ने लंबे समय तक बंदरगाह का संचालन किया। Major Port Trusts Act, 1963 के प्रावधानों के लागू होने के बाद जनवरी 1975 में यह व्यवस्था पोर्ट ट्रस्ट के रूप में आगे बढ़ी। इस परिवर्तन ने बंदरगाह के प्रशासनिक ढाँचे को नए कानूनी आधार से जोड़ा।

भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी बंदरगाह राष्ट्रीय व्यापार, माल परिवहन और औद्योगिक आपूर्ति में महत्वपूर्ण रहा। बीसवीं सदी में समुद्री व्यापार की तकनीक, जहाजों के आकार, कंटेनर परिवहन और बंदरगाहों के बीच प्रतिस्पर्धा ने इसकी चुनौतियाँ बदल दीं। इसी क्रम में हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स का विकास हुआ, जिससे बड़े जहाजों और विभिन्न प्रकार के माल के प्रबंधन की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिली।
2020 में नया नाम: श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट
जनवरी 2020 में कोलकाता पोर्ट की 150वीं वर्षगाँठ के अवसर पर इसका नाम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखने की घोषणा की गई। जून 2020 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट का नाम बदलकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट करने को मंजूरी दी। आज इसका आधिकारिक नाम Syama Prasad Mookerjee Port, Kolkata है और यह केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है।
कोलकाता पोर्ट का ऐतिहासिक महत्व
17 अक्टूबर 1870 की तारीख बंदरगाह के औपचारिक प्रशासन की शुरुआत को याद करने का अवसर है। इस संस्था का इतिहास भारत में व्यापार, शहरी विकास, औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था और स्वतंत्रता के बाद के आर्थिक परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। समय के साथ इसकी भूमिका और संरचना बदली है, लेकिन पूर्वी भारत के व्यापारिक नेटवर्क में इसका महत्व बना हुआ है।
कोलकाता पोर्ट की कहानी यह भी दिखाती है कि किसी बंदरगाह का विकास केवल घाटों, गोदियों और जहाजों तक सीमित नहीं होता। उसके पीछे नदी और पर्यावरण की चुनौतियाँ, तकनीकी बदलाव, श्रम, प्रशासन, व्यापारिक नीतियाँ और व्यापक क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का योगदान होता है। इसी बहुआयामी इतिहास के कारण 17 अक्टूबर 1870 भारतीय बंदरगाह इतिहास की उल्लेखनीय तारीखों में शामिल है।

