सदियों से समाज ने स्त्री के अस्तित्व को केवल उसकी बाहरी त्वचा और बनावटी सुंदरता के तराजू में तोला है। हर पल, हर समय उससे ‘परफेक्ट’ और सुंदर दिखने की यह अपेक्षा दरअसल उसके दिमाग, उसकी मेधा और उसकी आंतरिक शक्ति को दबाने की एक अनकही बंदिश है। औरत कोई नुमाइश की वस्तु या सजावटी सामान नहीं है, जिसका काम दूसरों की आँखों को तसल्ली देना हो। वह एक मुकम्मल इंसान है, जिसका असली मूल्य उसके स्वाभिमान, उसके विचारों और उसकी अदम्य इच्छाशक्ति में बसता है। रूप के इस थोपे गए पैमाने को तोड़ना अब बेहद ज़रूरी है।
आज कहने को तो समाज और दुनिया इतनी प्रगति कर चुके हैं, महिलाएँ भी हर क्षेत्र में काफी आगे निकल चुकी हैं, लेकिन अफ़सोस कि इस तथाकथित आधुनिक समाज की मानसिकता आज भी स्त्री के शरीर और उसके रूप-रंग से आगे नहीं बढ़ पाई है। इसका सबसे ताज़ा और शर्मनाक उदाहरण बॉलीवुड अभिनेत्री कटरीना कैफ की हालिया सोशल मीडिया ट्रोलिंग है।
स्त्री सृजन करती है, उसे जननी कहा गया है… फिर उसके मातृत्व से ज्यादा उसके सौंदर्य की चिंता क्यों?
कटरीना कैफ मां बनीं तो बदला शरीर ट्रोलर्स की नजर में आ गया; सवाल सिर्फ एक अभिनेत्री का नहीं, उस सोच का है जो औरत को हर उम्र, हर दौर और हर हाल में खूबसूरत दिखने के लिए मजबूर करती है
स्त्री सृजन करती है। अपने भीतर एक नए जीवन को जगह देती है, उसे जन्म देती है और फिर उसके पालन-पोषण में अपना शरीर, समय, नींद और ऊर्जा तक लगा देती है। उसे इसलिए ‘जननी’ कहा गया है। लेकिन विडंबना देखिए कि उसी जननी के शरीर में मातृत्व के बाद आया बदलाव समाज के लिए सवाल बन जाता है।
इस भद्दी ट्रोलिंग के खिलाफ जहाँ ऋतिक रोशन, परिणीति चोपड़ा और खुशबू सुंदर जैसे कलाकारों ने कटरीना का समर्थन किया, वहीं हाल ही में बिग बॉस 20 के ‘वीकेंड का वार’ पर सलमान खान ने भी इन ट्रोलर्स को ‘परजीवी’ कहते हुए कड़ी फटकार लगाई और याद दिलाया कि माँ बनने के बाद वजन बढ़ना पूरी तरह स्वाभाविक है।
खुद कटरीना ने भी इन थोपे गए ब्यूटी स्टैंडर्ड्स पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि आज उनके लिए सबसे ज़रूरी उनका बच्चा और उनकी खुद की सेहत है, न कि बाहरी दुनिया को खुश करना। यह घटना साबित करती है कि यह समाज आज भी कितना खोखला है, जो ब्रह्मांड की सबसे अनमोल रचना—एक माँ—को भी महज़ अपनी आँखों के सुकून का ज़रिया समझता है।
लेकिन सवाल यह नहीं है कि कटरीना का वजन कितना बढ़ा या उनका चेहरा पहले से कितना अलग दिख रहा है।
सवाल यह है कि आखिर किसी महिला के मां बनने के बाद सबसे पहले हमारी नजर उसके शरीर पर ही क्यों जाती है?
क्या वह मां बनी है या किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में शामिल हुई है?
क्या गर्भावस्था के बाद शरीर का बदलना कोई अपराध है?
मां बनने के बाद ‘वापस पहले जैसी’ होने का दबाव क्यों?
गर्भावस्था महिला के शरीर में बड़े शारीरिक बदलाव लाती है। प्रसव के बाद वजन और शरीर की बनावट में बदलाव सामान्य हो सकते हैं और हर महिला के लिए रिकवरी का समय अलग होता है। इसके लिए कोई एक तय समयसीमा नहीं होती।
फिर भी समाज ने एक शब्द गढ़ दिया है—‘बाउंस बैक’।
जैसे मां बनना कोई ऐसी परीक्षा हो, जिसके बाद महिला को तुरंत पुराने शरीर में लौटकर यह साबित करना हो कि उसने कुछ बदला ही नहीं।
कटरीना जैसी अभिनेत्री के मामले में यह दबाव और बढ़ जाता है, क्योंकि वर्षों से उनकी पहचान ग्लैमर और फिटनेस से जोड़ी जाती रही है। लेकिन अभिनेत्री होना उन्हें इंसान होने से अलग नहीं करता। उनके शरीर को भी गर्भावस्था और मातृत्व के वही बदलाव झेलने पड़ते हैं, जो किसी भी महिला के शरीर में हो सकते हैं।
मर्द उम्रदराज हो तो ‘मैच्योर’, औरत क्यों ‘बूढ़ी’?
यह सवाल सिर्फ कटरीना का नहीं है।
हमारे समाज में पुरुष की उम्र बढ़ने को अक्सर अनुभव, व्यक्तित्व और परिपक्वता के रूप में देखा जाता है। वहीं महिला के लिए उम्र बढ़ना अक्सर उसकी खूबसूरती के कम होने से जोड़ दिया जाता है।
पुरुष के सफेद बाल उसकी शख्सियत का हिस्सा हो सकते हैं।
महिला के सफेद बालों पर उसे ‘उम्र छिपाने’ की सलाह मिलने लगती है।
पुरुष का वजन बढ़ जाए तो वह सामान्य बात है।
महिला का वजन बढ़ जाए तो उसकी फिटनेस, सुंदरता और यहां तक कि उसके आत्मविश्वास तक पर सवाल उठने लगते हैं।
क्यों?
औरत कुछ भी करे, समाज को शिकायत क्यों?
और सिर्फ इतनी नहीं है।
अगर कोई महिला अपने प्राकृतिक रूप में उम्र बढ़ने देती है तो उसे कहा जाता है कि उसने खुद का ध्यान रखना छोड़ दिया।
अगर वह कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट या सर्जरी करवाती है तो कहा जाता है—‘अब तो चेहरा नकली हो गया।’
अगर वह मेकअप करे तो कहा जाता है—‘बिना मेकअप के दिखाओ।’
अगर बिना मेकअप सामने आए तो कहा जाता है—‘पहले जैसी खूबसूरत नहीं रही।’
अगर वजन बढ़ जाए तो ताने।
अगर वजन बहुत कम कर ले तो ताने।
प्राकृतिक सुंदरता भी स्वीकार नहीं, बदलाव भी स्वीकार नहीं
महिला अगर अपने शरीर को स्वीकार करे तो उसे कहा जाता है कि उसने खुद को संभालना छोड़ दिया।
और अगर वह अपने शरीर में बदलाव करे तो कहा जाता है कि वह ‘आर्टिफिशियल’ हो गई।
कॉस्मेटिक सर्जरी करवाए तो सवाल।
न करवाए तो सवाल।
उम्र के निशान दिखें तो सवाल।
उन्हें छिपाए तो भी सवाल।
यानी समस्या महिला के चुनाव में नहीं है।
समस्या यह है कि समाज महिला के चुनाव को स्वीकार करना ही नहीं चाहता।
यानी महिला कुछ भी करे, समाज के पास टिप्पणी तैयार है।
आखिर औरत करे तो करे क्या?
यही वह दोहरा दबाव है, जिसने महिलाओं की सुंदरता को उनके अस्तित्व से जोड़ दिया है।
शायद जवाब बहुत सीधा है—वह अपने लिए जिए।
किसी महिला का शरीर जनता की संपत्ति नहीं है, जिस पर हर व्यक्ति अपनी राय देने का अधिकार समझे। वह शरीर उसका है। उसका वजन उसका है। उसकी उम्र उसकी है। उसके चेहरे पर झुर्रियां हों या वह किसी कॉस्मेटिक प्रक्रिया का चुनाव करे—उसकी जिंदगी का फैसला करने का अधिकार आखिर उसे ही होना चाहिए।
मां बनने के बाद महिला से यह उम्मीद करना कि वह तुरंत उसी शरीर में लौट आए, जो गर्भावस्था से पहले था, अपने आप में एक क्रूर सामाजिक दबाव है।
गर्भावस्था कोई आठ-दस महीने की ‘ब्यूटी ब्रेक’ नहीं है। एक महिला का शरीर इस दौरान बच्चे को जन्म देने के लिए खुद को बदलता है। प्रसव के बाद भी शरीर और मन को सामान्य होने में समय लग सकता है।
और इस पूरी प्रक्रिया के बाद अगर समाज का पहला सवाल यही हो कि ‘वजन कितना बढ़ गया?’, तो समस्या महिला के शरीर में नहीं, हमारी सोच में है।
हमें यह भी समझना होगा कि किसी महिला की पहचान सिर्फ पत्नी, मां या खूबसूरत चेहरा होने से नहीं बनती।
वह एक इंसान है।
उसकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं, अपनी थकान है, अपनी पसंद है, अपनी असुरक्षाएं हैं और अपने फैसले हैं।
शादी के बाद महिला अपना घर छोड़ती है, नए परिवार में जाती है, रिश्तों को संभालती है। गर्भावस्था और प्रसव के दौरान उसका शरीर असाधारण बदलावों से गुजरता है। लेकिन इन सबके बीच भी उससे उम्मीद रहती है कि वह हमेशा ‘सुंदर’ दिखे।
क्यों?
क्या मां बनने की कीमत यह है कि महिला अपने बदले हुए शरीर को लेकर अपराधबोध में जिए?
क्या उम्र बढ़ने की सजा यह है कि उसे हर दिन अपनी शक्ल आईने में जांचनी पड़े?
और क्या खूबसूरती की परिभाषा इतनी संकरी होनी चाहिए कि उसमें सिर्फ एक खास उम्र, एक खास वजन और एक खास चेहरे की जगह हो?
कैटरीना कैफ हों या कोई आम महिला—किसी के शरीर पर टिप्पणी करने से पहले इतना जरूर याद रखना चाहिए कि हम जिस शरीर का मजाक बना रहे हैं, हो सकता है उसी शरीर ने किसी जिंदगी को जन्म दिया हो, किसी परिवार को संभाला हो और किसी मुश्किल दौर को चुपचाप झेला हो।
सबसे भारी विडंबना: औरत ही औरत की सबसे बड़ी आलोचक क्यों?
सबसे भारी विडंबना यह है कि औरत ही औरत की सबसे बड़ी आलोचक बन जाती है। जिस गर्भावस्था, प्रसव और मातृत्व की यात्रा से एक महिला गुजरती है, उसी सच्चाई से दूसरी महिला भी परिचित होती है।
वह जानती है कि मां बनने के बाद शरीर बदलता है, वजन बढ़ सकता है, चेहरे पर बदलाव आ सकते हैं और शरीर को पहले जैसी स्थिति में लौटने में समय लग सकता है। फिर भी कई बार वही औरत दूसरी औरत के शरीर, उम्र, चेहरे और सुंदरता को लेकर सबसे कठोर हो जाती है।
अगर कोई महिला उससे अधिक सुंदर दिखाई दे तो तुलना शुरू हो जाती है—कौन ज्यादा सुंदर है, किसका रंग बेहतर है, किसका शरीर बेहतर है। और अगर कोई महिला उससे कम सुंदर दिखाई दे, उसका वजन बढ़ा हो या उम्र उसके चेहरे पर नजर आने लगी हो, तो उसे कमतर समझने में भी देर नहीं लगती। अर्थात दूसरी स्त्री चाहे उससे बेहतर दिखाई दे या उसकी नजर में कम सुंदर लगे, दोनों ही स्थितियों में उसके लिए कोई न कोई टिप्पणी तैयार रहती है।
यह केवल किसी के रूप पर टिप्पणी करने की बात नहीं है। यह उस सोच का परिणाम है, जिसमें महिलाओं को एक-दूसरे के सामने खड़ा करके उनकी सुंदरता और उनकी कीमत तय की जाती है। जबकि हर स्त्री अपने जीवन में अलग परिस्थितियों, अलग संघर्षों और अलग शारीरिक बदलावों से गुजरती है।
सबसे दुखद बात यह है कि जिस पीड़ा को एक स्त्री स्वयं जानती है, उसी पीड़ा से गुजर रही दूसरी स्त्री के प्रति वह संवेदनशील होने के बजाय उसकी आलोचना करने लगती है।
जिस शरीर को उसने खुद मातृत्व के लिए बदलते देखा है, उसी बदलाव के लिए दूसरी स्त्री को शर्मिंदा करना—इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी?
शायद अब समय आ गया है कि स्त्री दूसरी स्त्री को सुंदरता की कसौटी पर परखने के बजाय उसके संघर्ष को समझे, उसके बदलाव को स्वीकार करे और उसके प्रति संवेदनशील बने।
क्योंकि स्त्री को स्त्री से प्रतियोगिता नहीं, स्त्री का साथ चाहिए।
कटरीना का मामला इसलिए बड़ा है
कटरीना सिर्फ इसलिए चर्चा में नहीं हैं कि वह एक अभिनेत्री हैं। उनका मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दिखाता है कि प्रसिद्धि और पैसा भी किसी महिला को शरीर पर होने वाली सामाजिक निगरानी से पूरी तरह नहीं बचा सकते।
उनकी सार्वजनिक उपस्थिति के बाद हुई ट्रोलिंग पर सलमान खान ने भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि गर्भावस्था के बाद वजन बढ़ना स्वाभाविक है और लोगों को किसी महिला के शरीर को निशाना बनाकर ट्रोल नहीं करना चाहिए।
लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण जवाब किसी और की तरफ से नहीं, खुद कटरीना की सोच से आता है।
हाल की बातचीत में उन्होंने बताया कि अब उनके लिए ‘अपना सबसे अच्छा दिखना’ सिर्फ बाहरी रूप से जुड़ा नहीं है; उनके लिए स्वस्थ महसूस करना और भीतर से अच्छा महसूस करना ज्यादा मायने रखता है।
यही बदलाव शायद इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्योंकि कल कटरीना की जगह कोई दूसरी महिला होगी।
और उसके बाद कोई आम मां।
जिसके पास न करोड़ों फॉलोअर्स होंगे, न अपनी आवाज पहुंचाने का मंच।
उसे भी वही ताने सुनने पड़ेंगे—‘मोटी हो गई’, ‘पहले जैसी नहीं रही’, ‘खुद का ध्यान नहीं रखती’।
इसलिए मुद्दा कटरीना का शरीर नहीं है।
मुद्दा यह है कि स्त्री को देखने के समाज के दृष्टिकोण में बदलाव आखिर कब आएगा?
स्त्री का शरीर उसकी उपलब्धि नहीं, उसका जीवन है
सिमोन द बोवुआर (Simone de Beauvoir) के विचारों से प्रेरित: “नारी पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। समाज उसे बचपन से ही यह सिखाता है कि उसका सबसे बड़ा हथियार और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उसका रूप ही है, ताकि वह कभी अपनी असली ताकत न पहचान सके।
“जिस दिन एक स्त्री सुंदर दिखने के दबाव से मुक्त हो जाएगी, उस दिन वह अपने अस्तित्व की वास्तविक ऊंचाइयों को छुएगी।”
स्त्री कोई नुमाइश नहीं, ब्रह्मांड की सबसे अनमोल रचना है। समाज की संकीर्ण सोच ने हमेशा ईश्वर की सबसे नायाब कृति को महज़ ‘बाहरी खूबसूरती’ के पिंजरे में कैद करना चाहा है। जिस स्त्री के भीतर संसार को रचने की अदम्य ताकत है, जो एक नए जीवन को जन्म देकर ‘जननी’ बनती है, उसका वजूद किसी की आँखों को सुकून देने की बंदिशों पर नहिं टिक सकता है।
यह इस दौर की सबसे कड़वी सच्चाई है कि जब एक स्त्री मातृत्व के सबसे खूबसूरत और पवित्र दौर से गुज़र रही होती है, और
अब वक्त है कि समाज
स्त्री को उसकी उपलब्धियों, गुणों, कर्म, मातृत्व और व्यक्तित्व को उसके सौंदर्य से ऊपर देखना सीखे।