भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में पाए जाने वाले चश्माधारी नाग आनुवंशिक रूप से काफी हद तक एक-दूसरे से जुड़े हैं, जबकि श्रीलंका में रहने वाले नागों का वंश-समूह अलग दिखाई देता है। वैज्ञानिकों की नई पड़ताल ने इस प्रसिद्ध विषैले सांप के विकासवादी इतिहास पर नई रोशनी डाली है। हालांकि, शोध के आधार पर श्रीलंकाई नाग को अलग प्रजाति घोषित नहीं किया गया है।
अध्ययन अक्टूबर 2026 में शोध पत्रिका Molecular Phylogenetics and Evolution में प्रकाशित हुआ। शोधकर्ताओं ने भारतीय उपमहाद्वीप के प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों से जुटाए गए 67 चश्माधारी नागों के नमूनों का विश्लेषण किया। इसमें माइटोकॉन्ड्रियल और नाभिकीय DNA सहित नौ आनुवंशिक संकेतकों का इस्तेमाल किया गया, ताकि आबादियों के बीच संबंध और उनके अलग होने के संभावित समय का अनुमान लगाया जा सके।
भारत के मुख्य भूभाग में क्षेत्रीय आनुवंशिक अंतर सीमित
अध्ययन में भारत के मुख्य भूभाग में चश्माधारी नागों की आबादियों के बीच स्पष्ट, गहरे आनुवंशिक विभाजन के प्रमाण नहीं मिले। अलग-अलग इलाकों में इन सांपों के रंग, फन पर बने निशान और विष की संरचना में अंतर हो सकता है, लेकिन ये विशेषताएं अपने आप में अलग आनुवंशिक वंश या अलग प्रजाति का निर्णायक प्रमाण नहीं हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, मुख्य भूभाग की आबादियों में आनुवंशिक विविधताओं का साझा होना इस बात से मेल खाता है कि इनके बीच लंबे समय में आवाजाही और प्रजनन के जरिए आनुवंशिक संपर्क बना रहा हो। प्राकृतिक फैलाव के साथ-साथ मानवीय गतिविधियों से अनजाने में हुए स्थानांतरण ने भी इस पैटर्न में भूमिका निभाई हो सकती है। हालांकि, हर आबादी के इतिहास को समझने के लिए और विस्तृत नमूनों की जरूरत बनी हुई है।

श्रीलंका की आबादी क्यों अलग दिखती है?
शोध में श्रीलंका के चश्माधारी नागों ने मुख्य भूभाग की आबादियों से अलग आनुवंशिक समूह बनाया। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि दोनों वंश-समूहों के बीच अलगाव लगभग 20 लाख वर्ष पहले, प्लायोसीन के अंतिम दौर या प्लाइस्टोसीन के शुरुआती चरण में हुआ हो सकता है। यह समय समुद्र-स्तर में बड़े बदलावों का भी था।
एक संभावित व्याख्या यह है कि समुद्र का स्तर कम होने पर भारत और श्रीलंका के बीच स्थल-संपर्क बनने से सांपों के पूर्वज एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक फैल सके। बाद में समुद्र का स्तर बढ़ने और भूभाग अलग होने से आबादियां एक-दूसरे से कट गईं और उनके विकास का रास्ता अलग हो गया। यह एक वैज्ञानिक परिकल्पना है; अध्ययन इसे अलगाव का निश्चित और एकमात्र कारण साबित नहीं करता।
क्या श्रीलंकाई नाग अब अलग प्रजाति है?
नहीं—कम-से-कम इस अध्ययन ने ऐसा निष्कर्ष नहीं दिया। श्रीलंका की आबादी का आनुवंशिक रूप से अलग वंश-समूह होना महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी आबादी को अलग प्रजाति मानने के लिए केवल आनुवंशिक दूरी पर्याप्त नहीं होती। वर्गिकी विशेषज्ञों को आनुवंशिक प्रमाणों के साथ शारीरिक लक्षणों, भौगोलिक वितरण, विकासवादी इतिहास और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करना पड़ता है।
चश्माधारी नाग को वैज्ञानिक नाम Naja naja से जाना जाता है। श्रीलंका के नागों को अलग प्रजाति मानने का प्रस्ताव पहले भी सामने आया था, लेकिन सीमित भौगोलिक नमूनों और कुछ आनुवंशिक संकेतकों पर अधिक निर्भरता को लेकर उस पर सवाल उठे। नया अध्ययन व्यापक नमूना और कई तरह के DNA संकेतक इस्तेमाल करता है, फिर भी शोधकर्ता प्रजाति-स्तर का फैसला जल्दबाजी में करने से बचने की जरूरत पर जोर देते हैं।

नागों की उत्पत्ति और दक्षिण एशिया तक पहुंच
अध्ययन के विकासवादी विश्लेषण से Naja वंश की उत्पत्ति अफ्रीका में होने और बाद में उसके प्रतिनिधियों के मध्य पूर्व के रास्ते दक्षिण एशिया पहुंचने की परिकल्पना को समर्थन मिलता है। शोधकर्ताओं के अनुमान के अनुसार, चश्माधारी नाग का दक्षिण एशिया में प्रसार मियोसीन काल में हुआ हो सकता है। ऐसे ऐतिहासिक अनुमान जीवाश्मों, आनुवंशिक संबंधों और भौगोलिक विश्लेषणों पर आधारित होते हैं; नए नमूने और प्रमाण भविष्य में इन समय-सीमाओं को और स्पष्ट कर सकते हैं।
यह शोध क्यों महत्वपूर्ण है?
चश्माधारी नाग भारत के उन प्रमुख विषैले सांपों में शामिल है जिनके काटने से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं और मौतें हो सकती हैं। इसकी आबादियों के आनुवंशिक संबंधों को समझना केवल विकासवाद का सवाल नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में विष की संरचना में पाए जाने वाले अंतर को समझना, सांपों की पहचान और संरक्षण की रणनीतियां विकसित करना तथा सर्पदंश से निपटने के अनुसंधान को बेहतर बनाना भी महत्वपूर्ण है।
हालांकि, इस अध्ययन से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी खास क्षेत्र का विष दूसरे क्षेत्र के विष से कितना अलग है या किसी उपचार की प्रभावशीलता पर इसका क्या असर होगा। ऐसे सवालों के लिए विष की संरचना, चिकित्सकीय परिणामों और एंटीवेनम की प्रभावशीलता पर केंद्रित अलग अध्ययन आवश्यक हैं।
शोध का बड़ा संदेश यह है कि एक ही प्रजाति के भीतर भी विकासवादी इतिहास हर जगह समान नहीं होता। भारत के मुख्य भूभाग में चश्माधारी नागों की आनुवंशिक समानता और श्रीलंका की आबादी का अलग वंश-समूह बनना दिखाता है कि समुद्र-स्तर, भौगोलिक अलगाव, प्राकृतिक फैलाव और मानव गतिविधियां जीव-जंतुओं की विविधता को आकार दे सकती हैं। आगे के अध्ययन इस बात को स्पष्ट करने में मदद करेंगे कि यह आनुवंशिक अंतर प्रजाति-वर्गीकरण और संरक्षण के लिए क्या मायने रखता है।

