नई दिल्ली: दुनिया की लगभग 96 प्रतिशत उथले पानी की प्रवाल भित्ति (कोरल रीफ) पारिस्थितिकी प्रणालियां वर्ष 2075 तक ढहने के बेहद गंभीर खतरे का सामना कर सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के पहले वैश्विक आकलन में 127 उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय प्रवाल भित्ति क्षेत्रों का अध्ययन किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्र का बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन इस संकट के सबसे बड़े कारण हैं।
आकलन में शामिल 127 पारिस्थितिकी प्रणालियों में से 122 को ‘गंभीर रूप से संकटग्रस्त’ (Critically Endangered) श्रेणी में रखा गया है। ये क्षेत्र दुनिया में आंकी गई प्रवाल भित्तियों के 99.8 प्रतिशत हिस्से को समेटते हैं। पश्चिमी गैलापागोस द्वीप समूह की एक प्रवाल भित्ति प्रणाली पहले ही ढह चुकी है, जबकि चार क्षेत्रों के लिए पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं थे।
समुद्र की गर्मी सबसे बड़ा खतरा
प्रवाल समुद्री तापमान में बदलाव के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। समुद्र का तापमान बढ़ने पर प्रवाल अपने ऊतकों में रहने वाले सहजीवी शैवाल को बाहर निकाल सकते हैं, जिससे वे सफेद पड़ने लगते हैं। इस प्रक्रिया को कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है।
लंबे समय तक गर्मी बने रहने पर प्रवाल मर सकते हैं और पूरी रीफ की संरचना कमजोर पड़ सकती है। लगातार बढ़ती समुद्री हीटवेव के कारण कई क्षेत्रों को ब्लीचिंग की घटनाओं के बीच उबरने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल रहा है।

IUCN के आकलन में जलवायु परिवर्तन के भविष्य के प्रभावों को शामिल करने पर खतरे का स्तर बहुत बढ़ जाता है। पिछले 50 वर्षों में देखे गए बदलावों को ही आधार बनाया जाए और भविष्य के जलवायु अनुमानों को अलग रखा जाए, तो 127 में से 30 यानी लगभग 24 प्रतिशत पारिस्थितिकी प्रणालियां गंभीर रूप से संकटग्रस्त मानी जाएंगी।
भविष्य में समुद्री गर्मी के बढ़ने की आशंका शामिल करने पर यह हिस्सा 96 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। यह अंतर बताता है कि आने वाले दशकों में उत्सर्जन घटाने और संरक्षण के कदम कितने निर्णायक हो सकते हैं।
ग्रेट बैरियर रीफ से लाल सागर तक चिंता
रिपोर्ट में दुनिया की कई प्रमुख और जैव विविधता से भरपूर प्रवाल भित्ति प्रणालियों को गंभीर खतरे वाली श्रेणी में रखा गया है। इनमें ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ, पश्चिमी प्रशांत और दक्षिण-पूर्व एशिया का कोरल ट्रायंगल, कैरेबियाई क्षेत्र की मेसोअमेरिकन बैरियर रीफ प्रणाली तथा लाल सागर की प्रवाल भित्तियां शामिल हैं। ये क्षेत्र समुद्री जीवों को आवास, भोजन और प्रजनन स्थल उपलब्ध कराने के साथ-साथ तटीय समुदायों की आजीविका और तटों की सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रदूषण और अत्यधिक मछली पकड़ना भी वजह
जलवायु परिवर्तन के अलावा स्थानीय स्तर पर होने वाला नुकसान भी प्रवाल भित्तियों की स्थिति बिगाड़ रहा है। IUCN के अनुसार 63 प्रतिशत प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी प्रणालियां मछलियों और अन्य जीवों के पारिस्थितिक संतुलन में व्यवधान से प्रभावित हैं। तोता मछली (पैरटफिश) जैसी शाकाहारी मछलियां शैवाल को नियंत्रित करने में मदद करती हैं, जबकि ग्रूपर जैसी शिकारी मछलियां खाद्य-जाल का संतुलन बनाए रखती हैं। इनकी संख्या घटने से शैवाल का फैलाव बढ़ सकता है और प्रवालों के पुनर्जीवन की क्षमता कमजोर हो सकती है।

तटीय निर्माण, कृषि और औद्योगिक प्रदूषण, गंदे पानी तथा तलछट का समुद्र में पहुंचना, अत्यधिक पर्यटन, जलीय कृषि, तेज तूफान और कुछ समुद्री जीवों के प्रकोप भी रीफ पर दबाव बढ़ाते हैं। इसलिए विशेषज्ञों के अनुसार केवल वैश्विक तापमान पर काम करना पर्याप्त नहीं होगा; स्थानीय प्रदूषण घटाना, टिकाऊ मत्स्य प्रबंधन और संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा भी जरूरी है।
प्रवाल भित्तियां क्यों जरूरी हैं?
समुद्र तल के एक प्रतिशत से भी कम हिस्से पर फैली प्रवाल भित्तियां समुद्री जीवन के लिए असाधारण महत्व रखती हैं। वे लगभग एक-चौथाई समुद्री प्रजातियों को भोजन, आश्रय या प्रजनन का आधार देती हैं। प्रवाल भित्तियां लहरों और तूफानी उछाल की ऊर्जा कम करके तटों की रक्षा करती हैं और मत्स्य पालन, पर्यटन तथा स्थानीय रोजगार से जुड़ी आजीविका को सहारा देती हैं। इनके क्षरण से समुद्री खाद्य-जाल, तटीय सुरक्षा और कई समुदायों की आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
प्रवाल भित्ति पारिस्थितिकी तंत्र के ढहने का अर्थ केवल कुछ प्रवालों का मर जाना नहीं है। जब कठोर प्रवाल, जो रीफ की जीवित और बढ़ती संरचना बनाते हैं, लगभग गायब हो जाते हैं और उनकी जगह शैवाल, टूटे अवशेष तथा स्पंज ले लेते हैं, तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र अपनी विशिष्ट संरचना और जैव विविधता खोने लगता है।
क्या प्रवाल भित्तियों को बचाया जा सकता है?
IUCN ने चेतावनी के साथ यह भी स्पष्ट किया है कि अधिकांश प्रवाल भित्तियां अभी पूरी तरह नष्ट नहीं हुई हैं। इसलिए संरक्षण और जलवायु कार्रवाई के जरिए नुकसान को कम करने का अवसर मौजूद है, हालांकि समय तेजी से सीमित हो रहा है।

विशेषज्ञ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में महत्वाकांक्षी कटौती, समुद्री संरक्षित क्षेत्रों को मजबूत करने, प्रवाल पुनर्स्थापन, प्रदूषण नियंत्रण और मछली संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन पर जोर देते हैं।
स्थानीय स्तर पर तटीय जल को स्वच्छ रखना, सीवेज और प्लास्टिक प्रदूषण घटाना, विनाशकारी मछली पकड़ने पर नियंत्रण और पर्यटन को पर्यावरण के अनुकूल बनाना रीफ की पुनर्बहाली में मदद कर सकता है। साथ ही, समुद्री तापमान और ब्लीचिंग की नियमित निगरानी से उन क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है जहां संरक्षण के प्रयास सबसे अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
आने वाले दशक होंगे निर्णायक
यह आकलन दुनिया भर की प्रवाल भित्तियों के लिए गंभीर चेतावनी है, लेकिन इसे अपरिहार्य विनाश की घोषणा नहीं समझना चाहिए। वैज्ञानिकों के अनुसार उत्सर्जन में कमी और लक्षित संरक्षण उपाय भविष्य के जोखिम को घटाने में मदद कर सकते हैं। सरकारों, वैज्ञानिक संस्थानों, स्थानीय समुदायों और पर्यटन व मत्स्य उद्योगों के समन्वित प्रयास तय करेंगे कि आने वाली पीढ़ियों को जीवंत प्रवाल भित्तियां मिलेंगी या उनका स्थान जैव विविधता से गरीब समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र ले लेगा।
रिपोर्ट: Dinman News Network

