सुघर छपरा मौजा की कृषि योग्य भूमि का अब तक तय नहीं हुआ लगान रेट, 2015 में अंचलाधिकारी ने भेजी थी रिपोर्ट; तीन-चार पीढ़ियों से किसान कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर
Buxar News। सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में 345 बीघा कृषि योग्य जमीन का स्पष्ट रूप से दर्ज न होना और दशकों बाद भी उसका लगान रेट निर्धारित नहीं किया जाना बक्सर के राजस्व एवं भूमि सुधार व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बिहार-उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे सुघर छपरा मौजा की यह जमीन पिछले कई दशकों से कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के बीच उलझी हुई है।
किसानों का कहना है कि जमीन पर उनके परिवारों की कई पीढ़ियां गुजर चुकी हैं, लेकिन आज तक सरकारी स्तर पर लगान निर्धारण और जमाबंदी की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है।
स्थिति यह है कि किसान जमीन का लगान देने के लिए तैयार हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से लगान रेट ही तय नहीं किया गया। ऐसे में 345 बीघा जमीन का कितना लगान बकाया है, इसका वास्तविक आकलन भी संभव नहीं हो पा रहा है। दूसरी ओर, वर्षों से राजस्व की प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण सरकारी खजाने को भी संभावित राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

2015 में भेजी गई रिपोर्ट, फिर भी नहीं हुआ लगान निर्धारण
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ब्रह्मपुर के अंचलाधिकारी ने वर्ष 2015 में भूमि सुधार उपसमाहर्ता, डुमरांव को जांच रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें इस जमीन का लगान रेट निर्धारित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात थी। रिपोर्ट भेजे जाने के बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ सका।
किसानों और जमीन के हिस्सेदारों का कहना है कि वे अंचल से लेकर अनुमंडल और जिला स्तर तक अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन वर्षों की दौड़-धूप के बाद भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ।
यह मामला केवल एक-दो परिवारों तक सीमित नहीं है। लंबे समय से जमीन का मामला लंबित रहने के कारण अब इसमें कई पीढ़ियों और अनेक हिस्सेदारों की भागीदारी हो चुकी है। कुछ हिस्सेदार स्थानीय स्तर पर हैं, जबकि कुछ परिवार के सदस्य बाहर रहते हैं। ऐसे में सभी हिस्सेदारों की पहचान और उनके हिस्से का निर्धारण भी अपने आप में बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन गया है।
सर्व देव तिवारी और शैलेंद्र तिवारी कर रहे हैं प्रयास
वर्तमान समय में जमीन से जुड़े मामलों को आगे बढ़ाने के लिए सर्व देव तिवारी और शैलेंद्र तिवारी के परिवार की ओर से भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। बताया जाता है कि दोनों परिवारों का इस जमीन में बड़ा हिस्सा है और वे लंबे समय से प्रशासनिक स्तर पर मामले को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।

किसानों का कहना है कि उनकी मौजूदा पीढ़ी ही नहीं, बल्कि इससे पहले की पीढ़ियां भी इस विवाद और प्रशासनिक प्रक्रिया का सामना करती रही हैं। वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर लगाने में कितना समय और पैसा खर्च हुआ, इसका सही हिसाब अब प्रभावित परिवारों के लिए भी बता पाना मुश्किल है।
1956 से शुरू हुई जमीन की कानूनी लड़ाई
सुघर छपरा मौजा की जमीन को लेकर विवाद नया नहीं है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक इस जमीन की पहली बड़ी कानूनी लड़ाई वर्ष 1956 से शुरू हुई थी। इसके बाद मामला अलग-अलग न्यायिक स्तरों तक पहुंचा।
1962 में जिला जज की अदालत में मामला चला और बाद में वर्ष 1988 में पटना हाई कोर्ट तक भी इसकी सुनवाई हुई। इसके बाद राजस्व निर्धारण से जुड़े स्तरों पर भी किसानों ने अपनी लड़ाई जारी रखी। अपर समाहर्ता और समाहर्ता के स्तर से लेकर बीएलटी, पटना तक मामला पहुंचा और उपलब्ध विवरण के अनुसार विभिन्न न्यायिक प्रक्रियाओं में किसानों के पक्ष में फैसले हुए।
इन आदेशों और फैसलों के आधार पर ही आगे की राजस्व प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद बनी थी। इसी क्रम में 2015 में ब्रह्मपुर के अंचलाधिकारी ने जांच के बाद लगान रेट निर्धारित करने के लिए रिपोर्ट भेजी, लेकिन इसके बावजूद आज तक अंतिम स्तर पर लगान निर्धारण नहीं हो सका।

बिहार-यूपी सीमा परिवर्तन से जुड़ा है पूरा मामला
सुघर छपरा मौजा की जमीन का इतिहास बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमा परिवर्तन से भी जुड़ा हुआ है। दोनों राज्यों के बीच सीमा विवाद के समाधान के लिए गठित त्रिवेदी आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर वर्ष 1968 में संसद ने बिहार-यूपी सीमा परिवर्तन अधिनियम पारित किया था।
इस प्रक्रिया के तहत दोनों राज्यों के बीच कई गांवों की अदला-बदली हुई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उस समय भोजपुर जिले के 85 गांव उत्तर प्रदेश को दिए गए, जबकि इसके बदले उत्तर प्रदेश के 22 गांव बिहार के भोजपुर जिले को मिले। उस समय बक्सर और भोजपुर एक ही जिला हुआ करते थे।
इन्हीं 22 गांवों में सुघर छपरा मौजा भी शामिल था। यह मौजा बेचिरागी बताया जाता है। सीमा परिवर्तन के बाद जमीन बिहार के प्रशासनिक दायरे में आई, लेकिन बाद की राजस्व रिकॉर्ड प्रक्रिया में स्थिति स्पष्ट रूप से आगे नहीं बढ़ सकी।
रिविजनल सर्वे के बाद भी नहीं बनी जमाबंदी
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि रिविजनल सर्वे के बाद भी सुघर छपरा मौजा का लगान निर्धारित नहीं किया गया और अंचल कार्यालय में जमाबंदी भी नहीं बनाई गई।

किसानों का कहना है कि जब वे सरकार को राजस्व देने के लिए तैयार हैं, तो फिर प्रशासनिक स्तर पर लगान रेट निर्धारित करने और जमाबंदी कायम करने में इतनी लंबी देरी क्यों हो रही है।
यह स्थिति राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। यदि किसी जमीन का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है या उसमें तकनीकी समस्या है, तो उसे दुरुस्त करने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की होती है। लेकिन यहां दशकों से समस्या के बने रहने के कारण किसान पीढ़ी-दर-पीढ़ी परेशान हो रहे हैं।
सरकारी राजस्व का भी हो सकता है नुकसान
345 बीघा कृषि योग्य भूमि का लगान निर्धारित नहीं होने से केवल किसानों को ही परेशानी नहीं हो रही, बल्कि सरकारी राजस्व के नुकसान की आशंका भी बनी हुई है। यदि इतने बड़े भू-भाग का वर्षों से लगान निर्धारित नहीं हुआ है, तो संभावित बकाया राशि कितनी होगी, इसका अनुमान लगाना भी आसान नहीं है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब जरूरत इस बात की है कि राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग पूरे मामले की रिकॉर्ड के आधार पर समीक्षा करे, पुराने न्यायिक आदेशों और सर्वे रिकॉर्ड को सामने रखे तथा जमीन के वर्तमान हिस्सेदारों की स्थिति स्पष्ट करते हुए लगान निर्धारण और जमाबंदी की प्रक्रिया पूरी करे।

सुघर छपरा मौजा का मामला सिर्फ जमीन के रिकॉर्ड का विवाद नहीं रह गया है। यह दशकों से चली आ रही प्रशासनिक देरी, किसानों की कानूनी लड़ाई और सरकारी राजस्व व्यवस्था की कार्यप्रणाली से जुड़ा मामला बन चुका है। अब किसानों की नजर इस बात पर है कि प्रशासन इस पुराने मामले को कब तक सुलझाता है और 345 बीघा जमीन को राजस्व रिकॉर्ड में स्पष्ट पहचान कब मिलती है।
