दवा चाहिए तो बताना होगा क्यों! बिहार में प्रखंड से राज्य तक इंडेंट की होगी जांच, 90 दिन का बफर स्टॉक भी जरूरी
पटना: सरकारी अस्पतालों में कभी जरूरी दवा की कमी और कभी जरूरत से ज्यादा दवाओं के स्टॉक की समस्या से निपटने के लिए बिहार स्वास्थ्य विभाग ने दवा आपूर्ति व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। अब अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों की ओर से भेजी जाने वाली दवाओं और चिकित्सा सामग्रियों की मांग सिर्फ पुराने रिकॉर्ड या पिछले साल की खपत देखकर तय नहीं होगी। प्रखंड से लेकर जिला और फिर राज्य स्तर तक इंडेंट की समीक्षा होगी और वास्तविक जरूरत के आधार पर ही मांग को मंजूरी मिलेगी।
नई व्यवस्था का सबसे बड़ा मकसद तीन समस्याओं पर एक साथ लगाम लगाना है—जरूरी दवाओं का Stock-out, जरूरत से ज्यादा खरीद यानी Over-stock और दवाओं के Expiry होने से सरकारी संसाधनों की बर्बादी।
स्वास्थ्य विभाग के इस फैसले के तहत Indent Review & Confirmation Committee (IRCC) का गठन प्रखंड, जिला और राज्य—तीनों स्तरों पर किया गया है।
मरीजों की संख्या से लेकर मौसम तक देखा जाएगा
नई व्यवस्था में दवा की मांग तय करने का तरीका बदल दिया गया है। अब किसी अस्पताल को जितनी दवा चाहिए, उसके पीछे वास्तविक जरूरत का आधार भी देखा जाएगा।
कमेटी यह जांच करेगी कि संबंधित स्वास्थ्य संस्थान में—
- कितने मरीज OPD में आ रहे हैं?
- IPD में मरीजों की संख्या कितनी है?
- इमरजेंसी में कितना दबाव है?
- पिछले समय में वास्तविक खपत कितनी रही?
- वर्तमान में कितना स्टॉक उपलब्ध है?
- कौन-सी दवाएं एक्सपायरी के करीब हैं?
- सप्लाई में कितनी दवाएं रास्ते में हैं?
- खरीद प्रक्रिया में कितनी मात्रा पहले से लंबित है?
- इलाके में किसी मौसमी बीमारी का प्रकोप तो नहीं है?
- वहां कौन-कौन सी विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हैं?
- नई स्वास्थ्य योजनाओं या सेवाओं के कारण दवा की जरूरत बढ़ी है या नहीं?
यानी अब सिर्फ “इतनी दवा चाहिए” लिखकर इंडेंट भेजना पर्याप्त नहीं होगा। मांग के पीछे आंकड़ा और तर्क भी देना होगा।
तीन स्तर पर बनेगी निगरानी की व्यवस्था
नई व्यवस्था को तीन हिस्सों में बांटा गया है।
1. प्रखंड स्तर पर हर महीने होगी समीक्षा
प्रखंड स्तर की कमेटी हर महीने 1 से 10 तारीख के बीच दवाओं की मांग का सत्यापन करेगी।
इसकी अध्यक्षता संबंधित चिकित्सा पदाधिकारी प्रभारी करेंगे। प्रखंड स्वास्थ्य प्रबंधक सदस्य सचिव होंगे, जबकि प्रखंड अनुश्रवण एवं मूल्यांकन सहायक और फार्मासिस्ट सदस्य के रूप में शामिल होंगे।
सत्यापन के बाद इंडेंट को DVDMS पोर्टल पर दर्ज किया जाएगा और चिकित्सा पदाधिकारी प्रभारी उसका अनुमोदन करेंगे।
2. जिला स्तर पर होगी दूसरी जांच
प्रखंड से सत्यापित होकर आई मांग की जिला स्तर पर भी समीक्षा होगी।
जिला कमेटी की अध्यक्षता सिविल सर्जन करेंगे। जिला कार्यक्रम प्रबंधक सदस्य सचिव होंगे। जिला स्टोर के चिकित्सा पदाधिकारी प्रभारी, जिला अनुश्रवण एवं मूल्यांकन पदाधिकारी और फार्मासिस्ट कमेटी के सदस्य होंगे।
जिला स्तर की बैठक प्रत्येक महीने 11 से 15 तारीख के बीच होगी।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रावधान किया गया है। यदि किसी दवा की मांग पिछली तिमाही की औसत खपत की तुलना में करीब 20 से 25 प्रतिशत या उससे ज्यादा असामान्य रूप से बढ़ी हुई मिलती है, तो कमेटी उसके कारणों की जांच करेगी।
इसका सीधा मतलब है कि अचानक बढ़ी मांग को बिना सवाल किए आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।
राज्य स्तर पर भी होगी निगरानी
प्रखंड और जिला स्तर के बाद राज्य स्तर पर भी इंडेंट रिव्यू कमेटी बनाई गई है। इसमें राज्य स्वास्थ्य समिति और बिहार चिकित्सा सेवाएं एवं आधारभूत संरचना निगम लिमिटेड (BMSICL) के प्रबंध निदेशक समेत वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।
राज्य कमेटी हर एक इंडेंट को अलग-अलग जांचने के बजाय सैंपल के आधार पर प्रखंड और जिला स्तर पर हुई समीक्षा की गुणवत्ता और एकरूपता की जांच करेगी।
राज्य स्तरीय कमेटी की बैठक हर महीने 15 से 20 तारीख के बीच होगी।
इससे व्यवस्था में एक तरह का थ्री-लेयर चेक बनाया गया है—
प्रखंड में सत्यापन → जिला में समीक्षा → राज्य में निगरानी।
90 दिन का बफर स्टॉक क्यों महत्वपूर्ण?
नई व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा 90 दिन का बफर स्टॉक है।
इसका उद्देश्य यह है कि अस्पतालों में जरूरी दवाओं की अचानक कमी न हो। अंतिम सत्यापित इंडेंट तय करते समय यह भी देखा जाएगा कि संस्थान के पास पर्याप्त सुरक्षित स्टॉक मौजूद रहे।
लेकिन यहां संतुलन भी जरूरी है।
बहुत कम दवा होगी तो मरीजों को परेशानी हो सकती है और बहुत ज्यादा दवा खरीदने पर उसके इस्तेमाल से पहले एक्सपायर होने का खतरा बढ़ सकता है।
यही वजह है कि नई व्यवस्था का मूल फोकस केवल ज्यादा दवा उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि “जरूरत के मुताबिक सही मात्रा में दवा” उपलब्ध कराना है।
एक्सपायरी दवाओं से होने वाली बर्बादी पर भी नजर
सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में दवाओं की खरीद के बाद उनका समय पर उपयोग नहीं होना एक महत्वपूर्ण प्रबंधन चुनौती हो सकती है।
यदि किसी अस्पताल में जरूरत से ज्यादा दवा पहुंच जाती है और वह इस्तेमाल से पहले एक्सपायर हो जाती है, तो इससे दोहरा नुकसान होता है—एक तरफ सरकारी धन का इस्तेमाल हुआ और दूसरी तरफ मरीज के लिए उपलब्ध होने वाला संसाधन बेकार हो गया।
नई व्यवस्था में कमेटी को यह भी देखना होगा कि कौन-सी दवाएं एक्सपायरी के करीब हैं और कितनी मात्रा पहले से उपलब्ध है।
इससे भविष्य की खरीद का आकलन ज्यादा वास्तविक आधार पर करने में मदद मिल सकती है।
गलत इंडेंट भेजने पर सामूहिक जवाबदेही
नई व्यवस्था में सिर्फ समीक्षा का प्रावधान ही नहीं है, बल्कि जवाबदेही भी तय की गई है।
प्रखंड और जिला स्तरीय कमेटियों को गलत, जरूरत से ज्यादा, अधूरी या बिना उचित कारण भेजी गई मांग के लिए सामूहिक रूप से जवाबदेह बनाया गया है।
सत्यापित इंडेंट के साथ जरूरी प्रमाणन भी देना होगा।
यानी अब इंडेंट प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों के सामने यह स्पष्ट रहेगा कि भेजी गई मांग के पीछे वास्तविक आंकड़े और जरूरत का आधार होना चाहिए।
स्वास्थ्य मंत्री ने बताई व्यवस्था की प्राथमिकता
स्वास्थ्य मंत्री निशांत ने कहा है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य दवा आपूर्ति प्रणाली को अधिक पारदर्शी, जरूरत आधारित और जवाबदेह बनाना है।
उनके मुताबिक इससे सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में दवाओं और जरूरी चिकित्सा सामग्रियों की उपलब्धता बेहतर तरीके से सुनिश्चित की जा सकेगी और मरीजों को समय पर आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
असली बदलाव खरीद में नहीं, मांग तय करने के तरीके में
इस पूरी व्यवस्था को सिर्फ दवाओं की खरीद से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। इसका असली बदलाव मांग तय करने की प्रक्रिया में है।
पहले यदि किसी संस्थान की पिछली खपत को आधार बनाकर लगातार उसी तरह का इंडेंट भेजा जाता रहा, तो बीमारी का पैटर्न बदलने, मरीजों की संख्या घटने-बढ़ने या नई स्वास्थ्य सेवा शुरू होने की स्थिति में वास्तविक जरूरत और उपलब्ध स्टॉक के बीच अंतर पैदा हो सकता है।
नई व्यवस्था इस अंतर को कम करने की कोशिश करती है।
मसलन, किसी इलाके में मौसमी बीमारी के कारण मरीजों की संख्या अचानक बढ़ती है तो मांग बढ़ाने का आधार उपलब्ध होगा। दूसरी तरफ यदि किसी दवा का पर्याप्त स्टॉक पहले से मौजूद है या बड़ी मात्रा में सप्लाई रास्ते में है, तो उसी हिसाब से नया इंडेंट कम किया जा सकेगा।
यानी सिस्टम का लक्ष्य “ज्यादा खरीद” नहीं, बल्कि “सही समय पर सही मात्रा में उपलब्धता” है।
अब असली परीक्षा क्रियान्वयन की
नई व्यवस्था में नियम और कमेटियां बना दी गई हैं, लेकिन इसका वास्तविक असर जमीन पर इनके क्रियान्वयन से तय होगा।
इसके लिए जरूरी होगा कि अस्पतालों में स्टॉक का सही और समय पर डेटा दर्ज हो, DVDMS पर जानकारी अपडेट रहे, कमेटियां नियमित बैठक करें और वास्तविक खपत की सही रिपोर्टिंग हो।
अगर आंकड़े ही गलत होंगे तो तीन स्तर की समीक्षा के बावजूद इंडेंट का आकलन सही नहीं हो पाएगा।
इसके उलट यदि OPD, IPD, इमरजेंसी, स्टॉक, एक्सपायरी और सप्लाई से जुड़े आंकड़े नियमित और सही तरीके से अपडेट होते हैं तो यह व्यवस्था सरकारी दवा प्रबंधन को ज्यादा व्यवस्थित बनाने में मदद कर सकती है।
मरीज के लिए इसका मतलब क्या?
आम मरीज के नजरिए से इस पूरी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—जरूरी दवा अस्पताल में समय पर मिलेगी या नहीं?
नई व्यवस्था सफल होती है तो इसका असर तीन जगह दिखाई देना चाहिए—जरूरी दवाओं की कमी कम हो, अनावश्यक स्टॉक घटे और एक्सपायरी के कारण दवाओं की बर्बादी कम हो।
फिलहाल सरकार ने इसके लिए प्रखंड से राज्य तक निगरानी का ढांचा तैयार कर दिया है। अब इस व्यवस्था की असली परीक्षा अस्पतालों में होगी, जहां इंडेंट के आंकड़े, उपलब्ध स्टॉक और मरीजों की वास्तविक जरूरत को एक साथ मिलाकर देखा जाएगा।