औचक निरीक्षण, मरीजों से सीधा संवाद और जिलों तक इलाज पहुंचाने पर जोर; ICU, डायलिसिस, सर्जरी, मेडिकल शिक्षा से लेकर टीबी-अनीमिया अभियान तक स्वास्थ्य विभाग में कई स्तरों पर विस्तार का दावा
पटना। बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को जिला स्तर तक मजबूत करने की दिशा में स्वास्थ्य मंत्री निशांत की सक्रियता लगातार चर्चा में है। अस्पतालों के औचक निरीक्षण से लेकर मरीजों से सीधे बातचीत, अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठकों और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार तक कई मोर्चों पर काम करने की कोशिश दिखाई दे रही है।
विभाग का जोर इस बात पर है कि सामान्य जांच और इलाज के लिए मरीजों को बार-बार बड़े शहरों या बड़े अस्पतालों का रुख न करना पड़े।
इसी बीच ‘टीबी मुक्त बिहार’ को लेकर पटना के लोक भवन में हुई उच्चस्तरीय संगोष्ठी में राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) ने स्वास्थ्य मंत्री निशांत और स्वास्थ्य सचिव कुमार रवि के पिछले तीन-चार महीनों के टीबी उन्मूलन प्रयासों की सराहना की।

खास तौर पर अभियान को सभी जिलों तक पहुंचाने और मोबाइल एक्स-रे मशीनों के जरिए स्क्रीनिंग की पहल का उल्लेख किया गया।
अस्पताल में मंत्री की मौजूदगी, मरीजों से सीधे सवाल
स्वास्थ्य मंत्री निशांत की कार्यशैली में अस्पतालों का औचक निरीक्षण एक प्रमुख पहल के रूप में सामने आया है। ऐसे दौरों में केवल अधिकारियों से रिपोर्ट लेने के बजाय मरीजों से सीधे बातचीत कर अस्पताल की वास्तविक स्थिति समझने पर जोर दिया जा रहा है।
मरीजों को दवा मिली या नहीं, जांच में परेशानी तो नहीं, डॉक्टर और कर्मचारी उपलब्ध हैं या नहीं और अस्पताल में जरूरी सुविधाएं किस स्थिति में हैं—ऐसे सवाल सीधे मरीजों से पूछे जाने का उद्देश्य कागजों पर दर्ज व्यवस्था और जमीन पर मौजूद व्यवस्था के बीच अंतर को समझना है।
इसके साथ अधिकारियों के साथ लगातार समीक्षा बैठकों के जरिए यह देखने की कोशिश की जा रही है कि जिन सुविधाओं को शुरू करने या बढ़ाने का निर्णय हुआ है, उनका लाभ मरीजों तक पहुंच रहा है या नहीं।

निशांत का फोकस: हर छोटी जरूरत के लिए पटना क्यों आए मरीज?
स्वास्थ्य विभाग की मौजूदा दिशा का एक बड़ा हिस्सा जिला स्तर पर इलाज की क्षमता बढ़ाने पर केंद्रित है। इसका सीधा मतलब है कि मरीज को छोटी जांच, सामान्य उपचार या ऐसी सुविधा के लिए बड़े अस्पताल में रेफर न करना पड़े, जो उसके अपने जिले में उपलब्ध कराई जा सकती है।
वहीं जिन मरीजों को वास्तव में उच्च स्तरीय इलाज की जरूरत है, उन्हें समय पर मेडिकल कॉलेज या दूसरे उच्च संस्थान तक पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
यानी लक्ष्य सिर्फ रेफरल कम करना नहीं, बल्कि सही मरीज को सही जगह और सही समय पर इलाज दिलाना है।
ICU से लेकर डायलिसिस तक बढ़ीं सुविधाएं
नई सरकार के गठन के बाद स्वास्थ्य विभाग की ओर से जिला अस्पतालों में 105 नए ICU बेड और 70 वेंटिलेटर युक्त गहन चिकित्सा इकाइयां शुरू किए जाने की जानकारी दी गई है। इसके बाद राज्य में कुल 190 ICU बेड और 120 वेंटिलेटर कार्यरत होने की बात विभागीय उपलब्धियों में कही गई है।

गंभीर मरीजों के लिए इसका महत्व इसलिए है क्योंकि ICU और वेंटिलेटर जैसी सुविधा उपलब्ध होने पर हर गंभीर मरीज को शुरुआती उपचार के लिए तुरंत दूसरे शहर भेजने की जरूरत कम हो सकती है।
डायलिसिस जैसी नियमित लेकिन महंगी चिकित्सा सुविधा को भी अनुमंडल स्तर तक पहुंचाने पर काम हुआ है। राज्य के 55 अनुमंडलीय अस्पतालों में से 25 में डायलिसिस सेवा शुरू हो चुकी है।
PMCH में एक ही परिसर में कई बड़ी जांच
पटना के PMCH में सेंट्रलाइज्ड रेडियोलॉजी सिस्टम शुरू किया गया है। इसके तहत मरीजों को एक ही परिसर में अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे, CT स्कैन और MRI जैसी प्रमुख जांच सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है।
इसका उद्देश्य मरीजों को अलग-अलग जगह जांच के लिए भेजने की परेशानी कम करना है। खासकर गंभीर मरीजों और उनके परिजनों के लिए अस्पताल परिसर में ही जरूरी जांच उपलब्ध होना इलाज की प्रक्रिया को आसान बना सकता है।

LNJP में 400 बेड का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल
LNJP अस्पताल परिसर में 400 बेड वाले सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल का नया भवन तैयार हुआ है। सुपर स्पेशियलिटी सुविधा का मतलब ऐसे मरीजों के लिए अधिक विशेषज्ञ सेवाएं उपलब्ध कराना है, जिन्हें सामान्य उपचार से आगे विशेष चिकित्सा देखभाल की जरूरत होती है।
इस तरह की सुविधाओं का विस्तार बिहार में गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भरता कम करने की कोशिश का हिस्सा है।
IGIMS में आंखों से लेकर डायलिसिस तक नई सुविधाएं
पटना के IGIMS में भी कई नई चिकित्सा सुविधाएं शुरू की गई हैं।
करीब 10.25 करोड़ रुपये की लागत से छह मॉड्यूलर नेत्र ऑपरेशन थिएटर तैयार किए गए हैं। इनमें अलग-अलग जटिल नेत्र सर्जरी के लिए विशेष व्यवस्था की गई है।

करीब 6.55 करोड़ रुपये की लागत से 20 बेड का अत्याधुनिक CCM ICU शुरू किया गया है। यह गंभीर मेडिकल और सर्जिकल मरीजों की देखभाल के लिए बनाया गया है।
करीब 8.25 करोड़ रुपये की लागत से CCTV कमांड सेंटर शुरू किया गया है। इसके जरिए संस्थान परिसर की निगरानी को तकनीकी रूप से मजबूत करने की व्यवस्था की गई है।
इसके अलावा करीब 8.05 करोड़ रुपये की लागत से 16 नई मशीनों वाली डायलिसिस यूनिट शुरू की गई है। इससे किडनी रोगियों के लिए डायलिसिस क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी। इन परियोजनाओं के आंकड़ों की स्वतंत्र रिपोर्टों में भी पुष्टि हुई है।
मुजफ्फरपुर में गंभीर मरीजों के लिए क्रिटिकल केयर का विस्तार
उत्तर बिहार के मरीजों के लिए मुजफ्फरपुर में भी महत्वपूर्ण सुविधाएं जोड़ी गई हैं। होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र में अत्याधुनिक ICU कॉम्प्लेक्स और SKMCH में 30 बेड का स्पेशल क्रिटिकल केयर यूनिट शुरू किया गया है।

इसका महत्व इसलिए है क्योंकि गंभीर मरीजों को इलाज के लिए बहुत दूर दूसरे राज्यों में ले जाने की जरूरत कई मामलों में कम हो सकती है। स्थानीय स्तर पर क्रिटिकल केयर की क्षमता बढ़ने से मरीज को समय पर विशेषज्ञ देखभाल मिलने की संभावना बढ़ती है।
सिर्फ मशीनें नहीं, डॉक्टर और तकनीकी स्टाफ भी बढ़ा
स्वास्थ्य व्यवस्था केवल भवन और मशीनों से नहीं चलती। डॉक्टर, नर्सिंग और तकनीकी कर्मचारियों की उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए विभाग के अनुसार 200 विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति की गई है।
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 142 चिकित्सा शिक्षकों की नियुक्ति भी हुई है।
इसके अलावा अलग-अलग तकनीकी सेवाओं के लिए 2,219 कर्मियों की पदस्थापना की गई है। इनमें 683 OT असिस्टेंट, 100 ECG टेक्निशियन, 792 ड्रेसर और 644 एक्स-रे टेक्निशियन शामिल हैं। इन आंकड़ों की स्वतंत्र रिपोर्टों में भी पुष्टि हुई है।

इन नियुक्तियों का असर ऑपरेशन थिएटर, ECG, एक्स-रे और ड्रेसिंग जैसी सेवाओं की क्षमता बढ़ाने के रूप में देखा जा रहा है।
तीन महीने में 4.14 लाख से ज्यादा मरीज भर्ती
विभागीय उपलब्धियों के अनुसार पिछले तीन महीनों में 4.14 लाख से अधिक मरीजों को भर्ती कर इलाज दिया गया। इसी अवधि में 19 हजार से अधिक मरीजों की सर्जरी की गई।
विभाग का कहना है कि स्थानीय स्तर पर सुविधाएं बढ़ने के साथ अनावश्यक उच्च संस्थानों में रेफरल में भी कमी आई है।
यह बदलाव खास तौर पर उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें पहले जिला अस्पताल में सीमित सुविधा होने के कारण मेडिकल कॉलेज या बड़े शहर का रुख करना पड़ता था।

मेडिकल शिक्षा में भी विस्तार, दो नए कॉलेजों में MBBS सीटें
स्वास्थ्य विभाग की दिशा केवल मौजूदा अस्पतालों को मजबूत करने तक सीमित नहीं है। मेडिकल शिक्षा के विस्तार पर भी काम किया जा रहा है।
शैक्षणिक सत्र 2026-27 से समस्तीपुर के श्रीराम जानकी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल और राजकीय मेडिकल कॉलेज, छपरा में 50-50 MBBS सीटों के संचालन की अनुमति मिली है।
इसके अलावा राज्य के 16 ब्राउनफील्ड मेडिकल कॉलेज एवं अस्पतालों को PPP मॉडल पर आगे बढ़ाने के प्रस्ताव को मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिली है।
ब्राउनफील्ड परियोजना का अर्थ ऐसे मौजूदा या उपलब्ध बुनियादी ढांचे वाले संस्थानों को विकसित कर मेडिकल शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं की क्षमता बढ़ाना है।

PMCH को 5,462 बेड का बड़ा अस्पताल बनाने की तैयारी
पटना का PMCH भी बड़े विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसे 5,462 बेड वाले बड़े अस्पताल के रूप में विकसित करने का काम जारी है।
वहीं IGIMS के पुनर्विकास और विस्तार के तहत 1,200 बेड के अस्पताल, हॉस्टल और आवासीय भवनों की परियोजना में 59.24 प्रतिशत काम पूरा होने की जानकारी दी गई है।
AIIMS पटना के नए भवनों के निर्माण के लिए 26.76 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की प्रशासनिक स्वीकृति भी दी गई है।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य आने वाले वर्षों में बिहार में चिकित्सा शिक्षा, विशेषज्ञ इलाज और अस्पताल की क्षमता को एक साथ बढ़ाना है।

गरीब मरीजों के लिए इलाज की आर्थिक बाधा भी कम करने की कोशिश
महंगे इलाज के सामने सबसे बड़ी परेशानी आर्थिक होती है। इसे देखते हुए मुख्यमंत्री चिकित्सा सहायता कोष में वार्षिक आय की पात्रता सीमा 2.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 4 लाख रुपये कर दी गई है। इस बदलाव की स्वतंत्र पुष्टि भी हुई है।
विभागीय आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में 25,731 लाभार्थियों के लिए 202.63 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता स्वीकृत हुई। वहीं 1 अप्रैल 2026 से 31 जुलाई 2026 तक 8,229 लाभार्थियों के लिए 70.86 करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत किए जाने की जानकारी दी गई है।
इसका मकसद गंभीर बीमारी के इलाज के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर पड़ने वाले बोझ को कम करना है।
अस्पताल के बेड की लाइव जानकारी, रेफरल में मिलेगी मदद
स्वास्थ्य विभाग ने जिला और अनुमंडलीय अस्पतालों में बेड की रियल-टाइम मॉनिटरिंग की व्यवस्था शुरू की है।

इसका सरल मतलब है कि किसी मरीज को दूसरे अस्पताल भेजने से पहले वहां खाली बेड की जानकारी डिजिटल माध्यम से देखी जा सके। इससे रेफरल के दौरान मरीज और उसके परिवार को अस्पताल पहुंचने के बाद बेड न मिलने जैसी परेशानी कम करने में मदद मिल सकती है।
मुफ्त दवा में 504 प्रकार की दवाएं
सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवा उपलब्ध कराने के मामले में बिहार लगातार बेहतर प्रदर्शन का दावा कर रहा है। विभाग के अनुसार राज्य लगातार 23वें महीने देश में पहले स्थान पर रहा है।
वर्तमान में सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में 504 प्रकार की दवाएं, 20 अतिरिक्त श्रेणी की दवाएं और 132 प्रकार के मेडिकल डिवाइस व कंज्यूमेबल्स नि:शुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
यानी मरीज के लिए इलाज का मतलब केवल डॉक्टर की फीस से मुक्त होना नहीं, बल्कि जांच, दवा और जरूरी चिकित्सा सामग्री तक पहुंच आसान बनाना भी है।

टीबी के खिलाफ 3.50 करोड़ से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग
अब बात उस अभियान की, जिसने हाल में स्वास्थ्य विभाग की सबसे ज्यादा चर्चा कराई।
‘टीबी मुक्त बिहार’ अभियान के तहत सितंबर के अंत तक बिहार में 3 करोड़ 50 लाख 61 हजार लोगों की स्क्रीनिंग किए जाने की जानकारी स्वास्थ्य विभाग की ओर से दी गई थी।
इस स्क्रीनिंग में 3 लाख 97 हजार 409 टीबी मरीजों की पहचान हुई और उनका उपचार चल रहा था।
राज्य के सभी 38 जिलों में जिला टीबी केंद्र संचालित हैं। मरीजों की मुफ्त एक्स-रे जांच के लिए 499 केंद्र कार्यरत बताए गए हैं।

मोबाइल एक्स-रे मशीनों के जरिए स्क्रीनिंग को उन लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है, जो सामान्य परिस्थितियों में जांच केंद्र तक आसानी से नहीं पहुंच पाते।
टीबी मरीजों को इलाज के साथ पोषण का सहारा
टीबी में दवा के साथ पर्याप्त पोषण भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी वजह से निक्षय पोषण योजना के तहत चिह्नित मरीजों को हर महीने 1,000 रुपये की सहायता दी जा रही है।
इसके अलावा निक्षय मित्रों की मदद से करीब 66 हजार फूड बास्केट वितरित किए जाने की जानकारी दी गई है।
यानी टीबी अभियान को केवल बीमारी की पहचान और दवा तक सीमित न रखकर मरीज के पोषण और सामाजिक सहयोग से जोड़ने की कोशिश भी की जा रही है।

राज्यपाल ने क्यों की निशांत के काम की तारीफ?
यही वह हिस्सा है जिसने इस पूरी स्वास्थ्य कहानी को नया मोड़ दिया।
पटना के लोक भवन में 30 सितंबर 2026 को ‘टीबी मुक्त बिहार’ विषय पर उच्चस्तरीय विचार-विमर्श संगोष्ठी हुई। इसमें राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
राज्यपाल ने पिछले तीन-चार महीनों में टीबी उन्मूलन के लिए किए गए काम को लेकर स्वास्थ्य मंत्री निशांत और स्वास्थ्य सचिव कुमार रवि को बधाई दी। उन्होंने अभियान को सभी जिलों तक पहुंचाने और मोबाइल एक्स-रे के जरिए स्क्रीनिंग की पहल की सराहना की।
साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि टीबी के खिलाफ लड़ाई केवल तकनीक और मशीनों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए जागरूकता और समाज की भागीदारी भी जरूरी है। कार्यक्रम में टीबी की समय पर पहचान, जांच, उपचार, मरीजों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और इलाज बीच में न छोड़ने जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

10 जून की पहल का भी मिला फायदा
स्वास्थ्य मंत्री निशांत ने कार्यक्रम में कहा कि 10 जून 2026 को अधिवेशन भवन में आयोजित ‘टीबी मुक्त बिहार’ कार्यक्रम में राज्यपाल की ओर से दिए गए सुझावों से विभाग को लाभ मिला।
यानी सितंबर की संगोष्ठी में मिली सराहना को जून से चल रहे टीबी अभियान की आगे की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है।
बिहार टीबी एसोसिएशन के रिकॉर्ड में भी 10 जून 2026 को अधिवेशन भवन, पटना में ‘टीबी मुक्त बिहार’ कार्यक्रम में राज्यपाल अता हसनैन और स्वास्थ्य मंत्री निशांत की मौजूदगी दर्ज है।
एनीमिया से लेकर कैंसर और हृदय रोग तक स्क्रीनिंग
स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं में टीबी के साथ दूसरी गंभीर बीमारियों पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

‘एनीमिया मुक्त बिहार’ अभियान के तहत 1.20 करोड़ से अधिक लाभार्थियों की डिजिटल हीमोग्लोबिन जांच, मुफ्त दवा और पोषण परामर्श का लक्ष्य रखा गया है।
वहीं ‘जांच एवं उपचार चिकित्सा आपके द्वार’ अभियान के माध्यम से मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों की नि:शुल्क स्क्रीनिंग, जांच, परामर्श और दवा उपलब्ध कराने की पहल की जा रही है।
इसका उद्देश्य बीमारी गंभीर होने के बाद अस्पताल पहुंचने के बजाय शुरुआती स्तर पर ही उसकी पहचान करना है।
सितंबर में जिला अस्पतालों की तस्वीर बदली
स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव को केवल योजनाओं से नहीं, अस्पतालों के आंकड़ों से भी समझा जा सकता है।

विभागीय समीक्षा के अनुसार सितंबर 2026 में जिला अस्पतालों में 49,450 मरीज IPD में भर्ती हुए। जून में यह संख्या 26,443 थी। सितंबर का आंकड़ा जून की तुलना में काफी अधिक है। स्वतंत्र रिपोर्टों में भी सितंबर का 49,450 और जून का 26,443 का आंकड़ा दर्ज है।
सितंबर में मधेपुरा 8,037 IPD दाखिलों के साथ सबसे आगे रहा।
इसी दौरान जिला अस्पतालों के इमरजेंसी विभाग में 2,05,566 मरीजों का पंजीकरण हुआ।
सर्जरी में भी तेजी, गायनी से ऑर्थोपेडिक्स तक बढ़े ऑपरेशन
सर्जरी के आंकड़ों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

जून से सितंबर के बीच गायनी सर्जरी 2,156 से बढ़कर 6,131 हो गई।
जनरल सर्जरी 174 से बढ़कर 1,420 हुई।
वहीं ऑर्थोपेडिक्स सर्जरी 25 से बढ़कर 1,408 हो गई।
सितंबर में अकेले मधेपुरा में 790, पटना में 710 और वैशाली में 682 सर्जरी की गईं।

आयुष्मान भारत के तहत प्रोसीजर और सर्जरी की संख्या भी पिछले महीने के 1,728 से बढ़कर 2,098 हुई।
जिला अस्पतालों में सर्जरी की संख्या और उसकी विविधता बढ़ाने के लिए नए OT उपकरण उपलब्ध कराने और 14 स्थानों पर C-Arm मशीनें लगाने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
पूरी तस्वीर में क्या दिखता है?
इन आंकड़ों और पहलों को एक साथ देखें तो स्वास्थ्य विभाग का फोकस तीन स्तरों पर दिखाई देता है।
पहला—अस्पताल की मौजूदा व्यवस्था को मजबूत करना, जिसमें ICU, डायलिसिस, OT, रेडियोलॉजी और क्रिटिकल केयर जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

दूसरा—जिला स्तर पर इलाज की क्षमता बढ़ाना, ताकि सामान्य और जरूरी उपचार के लिए मरीजों को बड़े शहरों की ओर न जाना पड़े और जरूरत पड़ने पर ही उच्च संस्थान में रेफर किया जाए।
तीसरा—बीमारी की पहचान अस्पताल पहुंचने से पहले करना, जिसके तहत टीबी, एनीमिया, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर और हृदय रोग की स्क्रीनिंग पर जोर दिया जा रहा है।
यानी अस्पताल के अंदर इलाज से लेकर गांव और समुदाय के स्तर पर बीमारी की पहचान तक, स्वास्थ्य व्यवस्था को कई स्तरों पर जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
यही वजह है कि राज्यपाल की टिप्पणी अहम बनी
स्वास्थ्य मंत्री निशांत का कार्यकाल अभी शुरुआती महीनों में है, लेकिन विभागीय आंकड़ों में इस दौरान नई सुविधाओं, नियुक्तियों, सर्जरी, स्क्रीनिंग और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कई बदलाव दर्ज किए गए हैं।

इनमें से टीबी उन्मूलन अभियान को लेकर राज्यपाल की सार्वजनिक सराहना इस पूरी कहानी का सबसे हालिया महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अस्पतालों में जाकर व्यवस्था देखना, मरीजों से सीधे बात करना, अधिकारियों के साथ लगातार समीक्षा करना और दूसरी ओर जिला अस्पतालों से लेकर मेडिकल कॉलेजों तक सुविधाओं का विस्तार करना—स्वास्थ्य विभाग के अनुसार मौजूदा कार्यशैली का फोकस इन्हीं बिंदुओं पर है।
अब इन पहलों की असली कसौटी यही होगी कि अस्पतालों में बढ़ी सुविधाएं कितनी नियमित और प्रभावी रहती हैं, मरीजों को इलाज के लिए कितनी कम दूरी तय करनी पड़ती है और जिला स्तर पर बढ़ाई गई क्षमता का लाभ कितने लोगों तक पहुंचता है।
