पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज में प्रस्तावित रेल ओवर ब्रिज की जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया की मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल ने की समीक्षा, अधिकारियों को धारा 20(ए) की कार्रवाई समयसीमा में पूरी करने का आदेश
बिहार के चार जिलों में प्रस्तावित 21 रेल ओवर ब्रिज (ROB) परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया अब तेज करने की तैयारी है। पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज में रेलवे की इन महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए चल रही भू-अर्जन प्रक्रिया की समीक्षा करते हुए राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने अधिकारियों को स्पष्ट समयसीमा में काम पूरा करने का निर्देश दिया है। मंत्री ने कहा है कि सभी 21 परियोजनाओं में एक सप्ताह के भीतर धारा 20(ए) की कार्रवाई हर हाल में पूरी की जाए, ताकि रेल ओवर ब्रिज के निर्माण से जुड़ी आगे की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी नहीं हो।
इन आरओबी परियोजनाओं का सीधा संबंध उन स्थानों से है जहां रेलवे क्रॉसिंग के कारण सड़क यातायात और रेल परिचालन के बीच बार-बार व्यवधान की स्थिति बनती है। रेल ओवर ब्रिज बनने के बाद सड़क यातायात को रेलवे ट्रैक के ऊपर से गुजारने की व्यवस्था होती है। इससे रेलवे फाटक पर वाहनों के रुकने की जरूरत कम होती है और लोगों को आवागमन में सुविधा मिलने की उम्मीद रहती है। हालांकि, इन परियोजनाओं का निर्माण तभी आगे बढ़ सकता है जब जरूरी जमीन उपलब्ध हो और भू-अर्जन की कानूनी प्रक्रिया समय पर पूरी हो।
चार जिलों में 21 आरओबी, जमीन अधिग्रहण पर सरकार का फोकस
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के अनुसार, मंत्री की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में चारों जिलों में प्रस्तावित 21 रेल ओवर ब्रिज परियोजनाओं के लिए आवश्यक भूमि और भू-अर्जन की प्रगति की विस्तार से समीक्षा की गई। बैठक में नॉर्थ फ्रंटियर रेलवे और कटिहार रेल मंडल के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा एनएफ रेलवे के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी और मुख्य अभियंता भी मौजूद रहे।
बैठक में भू-अर्जन निदेशालय के निदेशक कमलेश कुमार सिंह तथा पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज के जिला भू-अर्जन पदाधिकारी भी शामिल हुए।
मंत्री डॉ. जायसवाल ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि रेलवे और जिला प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर भू-अर्जन की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने परियोजनावार प्रगति की निगरानी करने और निर्धारित अवधि में आवश्यक कार्रवाई पूरी करने पर जोर दिया।
सबसे ज्यादा आरओबी अररिया और किशनगंज में
चार जिलों की परियोजनाओं को देखें तो अररिया और किशनगंज में सबसे अधिक आरओबी प्रस्तावित हैं। विभागीय सूची के अनुसार अररिया में सात और किशनगंज में छह आरओबी परियोजनाएं शामिल हैं। कटिहार में छह तथा पूर्णिया में दो आरओबी प्रस्तावित हैं। इस तरह कुल संख्या 21 होती है।
इन परियोजनाओं में अधिकांश दो लेन के आरओबी हैं। अलग-अलग परियोजनाओं के लिए आवश्यक जमीन की मात्रा भी अलग है। जहां कुछ परियोजनाओं के लिए करीब दो से तीन एकड़ जमीन की आवश्यकता बताई गई है, वहीं कुछ परियोजनाओं के लिए पांच से छह एकड़ से अधिक भूमि की जरूरत है।
इसका अर्थ यह है कि परियोजनाओं की प्रगति केवल रेलवे की निर्माण योजना पर निर्भर नहीं है। संबंधित जमीन की पहचान, भू-अर्जन से जुड़ी वैधानिक प्रक्रिया और रेलवे तथा जिला प्रशासन के बीच समन्वय भी निर्माण की गति तय करने वाले महत्वपूर्ण चरण हैं।
कटिहार में छह आरओबी की योजना
कटिहार जिले में छह आरओबी परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इनमें एलसी संख्या KK-1 और KM-2 के स्थान पर स्टेशन KIR-DNQ और KIR-MYN के बीच दो लेन आरओबी शामिल है। इसके लिए 5.256 एकड़ भूमि की आवश्यकता बताई गई है।
इसी तरह KM-10 के स्थान पर प्रस्तावित आरओबी लोहारी गांव से गरैला को जोड़ने वाली सड़क के लिए है, जिसके लिए 4.238 एकड़ भूमि की जरूरत बताई गई है। KM-16 के स्थान पर सलमारी से मुकुरिया के बीच प्रस्तावित आरओबी के लिए भी 4.238 एकड़ भूमि आवश्यक है।
इसके अलावा NC-63 के स्थान पर पनिघट्टा से माहेशलट्टा को जोड़ने वाली सड़क के लिए आरओबी प्रस्तावित है। इसके लिए 4.314 एकड़ भूमि की आवश्यकता बताई गई है। SK-351 के स्थान पर बलरामपुर से तेलता-बगडोब को जोड़ने वाली सड़क के लिए प्रस्तावित आरओबी हेतु 3.301 एकड़ भूमि तथा KJ-5 के स्थान पर दो लेन आरओबी के लिए 4.897 एकड़ भूमि की जरूरत बताई गई है।
किशनगंज में छह परियोजनाएं
किशनगंज में भी छह आरओबी प्रस्तावित हैं। SK-318 के स्थान पर HWR-KNE के बीच प्रस्तावित आरओबी के लिए 3.489 एकड़ जमीन की जरूरत बताई गई है।
इसके अलावा SK-262, SK-269 और SK-274 के स्थान पर दो लेन आरओबी प्रस्तावित हैं। इन तीन परियोजनाओं के लिए क्रमश: 3.674, 3.130 और 3.719 एकड़ भूमि की आवश्यकता बताई गई है।
विभागीय सूची में SK-258 और SK-247 के स्थान पर भी दो लेन आरओबी प्रस्तावित हैं। इन दोनों परियोजनाओं के लिए जारी विवरण में आवश्यक भूमि का आंकड़ा नहीं दिया गया है।
पूर्णिया में दो आरओबी से जुड़ेगी सड़क कनेक्टिविटी
पूर्णिया जिले में दो आरओबी परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। KJ-18 पर PRNA-KUB के बीच दो लेन आरओबी प्रस्तावित है, जो पूर्णिया जंक्शन-कसबा-कुड़ाची वे-साइड सेक्शन में आता है। इसके लिए 2.614 एकड़ भूमि की आवश्यकता बताई गई है।
वहीं KJ-33 के स्थान पर JAG-KSY के बीच प्रस्तावित दो लेन आरओबी के लिए 5.035 एकड़ जमीन की जरूरत बताई गई है।
इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद संबंधित रेलवे क्रॉसिंग पर सड़क यातायात के लिए वैकल्पिक ऊपरी मार्ग उपलब्ध होगा। इससे स्थानीय स्तर पर आवागमन को सुगम बनाने में मदद मिल सकती है।
अररिया में सात आरओबी, कई प्रमुख रेल सेक्शन शामिल
अररिया में सबसे अधिक सात आरओबी प्रस्तावित हैं। KJ-46 के स्थान पर ARR-SMH के बीच दो लेन आरओबी के लिए 6.854 एकड़ भूमि की जरूरत बताई गई है। यह सूची में दिए गए परियोजनाओं में सबसे अधिक भूमि आवश्यकता वाली परियोजनाओं में शामिल है।
KJ-56 के लिए 4.157 एकड़, KJ-58 के लिए 4.254 एकड़ और KJ-63 के लिए 4.246 एकड़ भूमि की आवश्यकता बताई गई है। इसके अलावा KJ-72 के स्थान पर प्रस्तावित आरओबी के लिए 5.542 एकड़, KJ-43 के लिए 4.458 एकड़ और KJ-69 के स्थान पर प्रस्तावित आरओबी के लिए 4.210 एकड़ भूमि की आवश्यकता बताई गई है।
धारा 20(ए) क्यों महत्वपूर्ण है?
आम लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि धारा 20(ए) भू-अर्जन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण वैधानिक चरण है। रेलवे जैसी परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण में कई कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। संबंधित अधिनियम और परियोजना की प्रकृति के अनुसार अधिसूचना, जमीन की पहचान, आपत्तियों और मुआवजे जैसी प्रक्रियाएं आगे बढ़ती हैं।
ऐसे में मंत्री द्वारा एक सप्ताह में धारा 20(ए) की कार्रवाई पूरी करने का निर्देश मूल रूप से भू-अर्जन प्रक्रिया को अगले चरण में तेजी से ले जाने का प्रशासनिक प्रयास है। इसका यह अर्थ नहीं है कि एक सप्ताह में सभी 21 आरओबी का निर्माण शुरू हो जाएगा। निर्माण से पहले भू-अर्जन की अन्य आवश्यक प्रक्रियाएं, जमीन का हस्तांतरण और रेलवे से जुड़ी तकनीकी एवं प्रशासनिक औपचारिकताएं भी पूरी करनी होंगी।
आम लोगों को क्या फायदा होगा?
रेल ओवर ब्रिज का सबसे प्रत्यक्ष लाभ उन लोगों को मिलता है जिन्हें रेलवे क्रॉसिंग से होकर रोजाना आवागमन करना पड़ता है। ट्रेन के गुजरने के दौरान फाटक बंद होने पर सड़क पर वाहनों की कतार लग सकती है। इससे यात्रियों का समय प्रभावित होता है और कई बार आपात स्थिति में भी परेशानी पैदा हो सकती है।
आरओबी बनने के बाद सड़क यातायात को रेलवे लाइन के ऊपर से गुजारने की व्यवस्था होती है। इससे रेलवे फाटक पर निर्भरता कम होती है और संबंधित सड़क मार्ग पर यातायात का प्रवाह बेहतर हो सकता है। हालांकि, वास्तविक लाभ परियोजना के निर्माण, सड़क कनेक्टिविटी और स्थानीय यातायात व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
जमीन अधिग्रहण में देरी रोकना सरकार की प्राथमिकता
इन 21 परियोजनाओं की समीक्षा से स्पष्ट है कि सरकार अब रेलवे से जुड़ी परियोजनाओं में जमीन की उपलब्धता और भू-अर्जन प्रक्रिया को महत्वपूर्ण चरण मानकर इसकी निगरानी कर रही है। मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि किसी भी स्तर पर अनावश्यक देरी न हो।
रेलवे और राज्य सरकार के बीच समन्वय इस पूरी प्रक्रिया में अहम है। एक ओर रेलवे को परियोजना के तकनीकी और निर्माण संबंधी काम आगे बढ़ाने हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य के संबंधित विभागों को जमीन से जुड़ी वैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी है। दोनों स्तरों पर समयबद्ध काम होने पर ही परियोजनाएं निर्माण के अगले चरण में पहुंच सकेंगी।
फिलहाल सरकार का तत्काल लक्ष्य चार जिलों की इन 21 आरओबी परियोजनाओं में धारा 20(ए) की कार्रवाई को एक सप्ताह के भीतर पूरा करना है। इसके बाद भू-अर्जन की आगे की प्रक्रिया और जमीन उपलब्ध होने के आधार पर परियोजनाओं के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ेंगे।