इतिहास | 6 नवंबर | विश्व पर्यावरण | जलवायु कूटनीति
क्योटो प्रोटोकॉल को प्रभावी बनाने की दिशा में रूस का अनुसमर्थन निर्णायक साबित हुआ। हालांकि प्रचलित विवरणों में कभी-कभी 6 नवंबर 2004 को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हस्ताक्षर की तारीख बताया जाता है, आधिकारिक जापानी सरकारी दस्तावेज़ के अनुसार पुतिन ने अनुसमर्थन संबंधी संघीय कानून पर 4 नवंबर 2004 को हस्ताक्षर किए थे। रूस ने 18 नवंबर को संयुक्त राष्ट्र में अनुसमर्थन दस्तावेज़ जमा किया और इसी के बाद प्रोटोकॉल के लागू होने की 90 दिनों की अवधि शुरू हुई। अंततः 16 फरवरी 2005 को यह अंतरराष्ट्रीय समझौता प्रभावी हुआ।
जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध वैश्विक प्रयास की पृष्ठभूमि
बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में वैज्ञानिक प्रमाणों ने स्पष्ट करना शुरू कर दिया था कि मानवीय गतिविधियों से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही है। कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का उपयोग, औद्योगिक उत्पादन, परिवहन और भूमि उपयोग में बदलाव कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ाते हैं। ये गैसें पृथ्वी के वायुमंडल में ऊष्मा को रोकती हैं और वैश्विक तापमान में वृद्धि में योगदान देती हैं।
जलवायु परिवर्तन की चुनौती किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है। इसका असर समुद्र-स्तर, वर्षा के पैटर्न, कृषि, जल संसाधनों, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसी कारण 1990 के दशक में देशों ने संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से एक साझा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने की दिशा में काम तेज किया।

1992 का जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन
1992 में रियो डी जेनेरियो में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन के दौरान संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) को स्वीकार किया गया। यह जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बुनियाद बना। कन्वेंशन का उद्देश्य वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को ऐसे स्तर पर स्थिर करना था जिससे जलवायु प्रणाली में खतरनाक मानवीय हस्तक्षेप रोका जा सके।
हालांकि कन्वेंशन ने देशों के लिए नीतियां बनाने और उत्सर्जन की जानकारी देने का ढांचा तैयार किया, लेकिन औद्योगिक देशों के लिए ठोस, संख्यात्मक उत्सर्जन कटौती लक्ष्य तय करने की जरूरत बनी रही। इसी जरूरत से आगे चलकर क्योटो प्रोटोकॉल का जन्म हुआ।
11 दिसंबर 1997: क्योटो प्रोटोकॉल को अपनाया गया
जापान के क्योटो शहर में 1 से 11 दिसंबर 1997 तक UNFCCC के तीसरे सम्मेलन (COP3) का आयोजन हुआ। इसी सम्मेलन में 11 दिसंबर 1997 को क्योटो प्रोटोकॉल अपनाया गया। यह जलवायु परिवर्तन पर पहला ऐसा प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समझौता था जिसने विकसित देशों और संक्रमणशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन सीमित करने या घटाने के बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किए।
प्रोटोकॉल ने औद्योगिक देशों के लिए सामूहिक रूप से 2008 से 2012 की पहली प्रतिबद्धता अवधि में 1990 के स्तर की तुलना में औसतन कम-से-कम 5 प्रतिशत उत्सर्जन घटाने का लक्ष्य रखा। अलग-अलग देशों के लक्ष्य अलग थे। उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ के लिए 8 प्रतिशत और जापान के लिए 6 प्रतिशत की कटौती निर्धारित की गई थी। यह लक्ष्य सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं था; समझौते में विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखा गया।

क्योटो प्रोटोकॉल को लागू करने की शर्त
किसी अंतरराष्ट्रीय संधि को अपनाना और उसका कानूनी रूप से प्रभावी होना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। क्योटो प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 25 के अनुसार, इसके लागू होने के लिए कम-से-कम 55 देशों द्वारा अनुसमर्थन आवश्यक था। साथ ही उन विकसित देशों का हिस्सा, जिन्होंने अनुसमर्थन किया हो, 1990 में Annex I देशों के कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के कम-से-कम 55 प्रतिशत के बराबर होना चाहिए था।
पहली शर्त अपेक्षाकृत जल्दी पूरी हो गई, लेकिन दूसरी शर्त के लिए कुछ बड़े उत्सर्जक देशों का समर्थन जरूरी था। अमेरिका ने प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर तो किए, लेकिन उसका अनुसमर्थन नहीं किया। रूस का निर्णय इसलिए निर्णायक बन गया, क्योंकि उसके 1990 के उत्सर्जन का हिस्सा इस गणना में महत्वपूर्ण था। रूस के बिना आवश्यक 55 प्रतिशत उत्सर्जन सीमा पूरी नहीं हो पा रही थी।
रूस में अनुसमर्थन की प्रक्रिया: सितंबर से नवंबर 2004
रूस में क्योटो प्रोटोकॉल के अनुसमर्थन का फैसला कई संवैधानिक और संसदीय चरणों से होकर गुजरा। जापान के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक विवरण के अनुसार, रूसी सरकार ने 30 सितंबर 2004 को प्रोटोकॉल के अनुसमर्थन का निर्णय लिया। इसके बाद विधेयक 7 अक्टूबर को राज्य ड्यूमा में पेश किया गया और 22 अक्टूबर को निचले सदन ने इसे मंजूरी दी।
27 अक्टूबर 2004 को रूस की संघीय परिषद (ऊपरी सदन) ने भी विधेयक पारित कर दिया। इसके बाद विधेयक राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा गया। जापान के पर्यावरण मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के 5 नवंबर 2004 के आधिकारिक वक्तव्यों के अनुसार, पुतिन ने 4 नवंबर को अनुसमर्थन संबंधी संघीय कानून पर हस्ताक्षर किए। इसीलिए 6 नवंबर को हस्ताक्षर की तारीख बताना सही नहीं है।

18 नवंबर 2004: संयुक्त राष्ट्र में दस्तावेज जमा
रूस के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से घरेलू विधायी प्रक्रिया पूरी हुई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुसमर्थन की औपचारिकता तब पूरी हुई जब रूस ने अपना अनुसमर्थन दस्तावेज संयुक्त राष्ट्र महासचिव—जो इस संधि के डिपॉजिटरी थे—के पास जमा किया। UNFCCC सचिवालय ने 18 नवंबर 2004 को जारी प्रेस विज्ञप्ति में पुष्टि की कि उसी दिन रूसी अनुसमर्थन दस्तावेज प्राप्त हुआ।
यह तारीख निर्णायक थी। रूस के दस्तावेज जमा होते ही क्योटो प्रोटोकॉल के लागू होने की निर्धारित शर्त पूरी हो गई और 90 दिनों की उलटी गिनती शुरू हुई। UNFCCC ने घोषणा की कि प्रोटोकॉल 16 फरवरी 2005 से कानूनी रूप से प्रभावी होगा। इस तरह रूस का निर्णय केवल राष्ट्रीय विधायी कदम नहीं रहा, बल्कि उसने एक वैश्विक जलवायु समझौते को लागू करने का रास्ता खोल दिया।
16 फरवरी 2005: क्योटो प्रोटोकॉल प्रभावी हुआ
16 फरवरी 2005 को क्योटो प्रोटोकॉल लागू हुआ। उस समय यह 128 पक्षकारों के लिए बाध्यकारी बना। बाद में इसकी सदस्यता बढ़ती गई और संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन के अनुसार वर्तमान में इसके 192 पक्षकार हैं। इसके लागू होने से औद्योगिक देशों के उत्सर्जन लक्ष्यों, अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजार और स्वच्छ विकास तंत्र (Clean Development Mechanism—CDM) को कानूनी आधार मिला।
क्योटो प्रोटोकॉल ने तीन प्रमुख बाजार-आधारित व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया: उत्सर्जन व्यापार (Emissions Trading), संयुक्त कार्यान्वयन (Joint Implementation) और स्वच्छ विकास तंत्र (Clean Development Mechanism)। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य देशों को उत्सर्जन घटाने के लिए आर्थिक रूप से अधिक लचीले रास्ते उपलब्ध कराना था। विशेष रूप से CDM के माध्यम से विकसित देश विकासशील देशों में ऐसी परियोजनाओं में निवेश कर सकते थे जिनसे उत्सर्जन में कमी आए और सतत विकास को भी प्रोत्साहन मिले।

भारत और विकासशील देशों के लिए प्रोटोकॉल का महत्व
भारत ने क्योटो प्रोटोकॉल का अनुसमर्थन 26 अगस्त 2002 को किया था। भारत जैसे विकासशील देशों को पहली प्रतिबद्धता अवधि में विकसित देशों की तरह बाध्यकारी मात्रात्मक उत्सर्जन कटौती लक्ष्य नहीं दिए गए। यह व्यवस्था इस सिद्धांत पर आधारित थी कि जलवायु परिवर्तन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और आर्थिक क्षमता सभी देशों की समान नहीं है।
भारत के लिए स्वच्छ विकास तंत्र एक महत्वपूर्ण अवसर बना। इसके तहत नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, औद्योगिक प्रक्रियाओं और अन्य परियोजनाओं के माध्यम से प्रमाणित उत्सर्जन कटौती हासिल की जा सकती थी। इससे विकासशील देशों में स्वच्छ तकनीक और निवेश को बढ़ावा देने की संभावना बनी। हालांकि प्रोटोकॉल की संरचना और कार्बन बाजार की वास्तविक प्रभावशीलता पर आगे चलकर बहस भी हुई।
क्योटो से पेरिस तक: जलवायु समझौतों की बदलती दिशा
क्योटो प्रोटोकॉल जलवायु कूटनीति में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, लेकिन इसकी सीमाएं भी थीं। अमेरिका जैसे बड़े उत्सर्जक देश इसके बाध्यकारी लक्ष्यों में शामिल नहीं हुए। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के उत्सर्जन में वृद्धि ने भी वैश्विक प्रयास को जटिल बनाया। पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक चली। बाद में दोहा संशोधन के माध्यम से दूसरी प्रतिबद्धता अवधि 2013 से 2020 के लिए तय की गई।
2015 में अपनाया गया पेरिस समझौता जलवायु सहयोग की अधिक व्यापक व्यवस्था लेकर आया। इसमें लगभग सभी देशों ने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) प्रस्तुत करने और समय-समय पर उन्हें मजबूत करने की प्रक्रिया स्वीकार की। क्योटो और पेरिस समझौतों की संरचना अलग है, लेकिन दोनों ने जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक सहयोग को संस्थागत रूप देने में भूमिका निभाई।

इतिहास में इस घटनाक्रम की विरासत
क्योटो प्रोटोकॉल की कहानी यह दिखाती है कि वैश्विक पर्यावरणीय समझौते केवल सम्मेलन में हस्ताक्षर से लागू नहीं होते। उन्हें राष्ट्रीय संसदों, सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और कूटनीतिक वार्ताओं से गुजरना पड़ता है। रूस का अनुसमर्थन इस प्रक्रिया में निर्णायक कड़ी बना। पुतिन के 4 नवंबर 2004 के हस्ताक्षर, 18 नवंबर को संयुक्त राष्ट्र में दस्तावेज जमा होना और 16 फरवरी 2005 को प्रोटोकॉल का प्रभावी होना—इन तीनों तारीखों का अपना अलग कानूनी और ऐतिहासिक महत्व है।
6 नवंबर 2004 को इस व्यापक घटनाक्रम की समयरेखा में याद किया जा सकता है, लेकिन उस दिन पुतिन के हस्ताक्षर होने का दावा सही नहीं है। जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध वैश्विक सहयोग की दिशा में रूस का फैसला इसलिए ऐतिहासिक बना क्योंकि उसने क्योटो प्रोटोकॉल को कागजी समझौते से आगे बढ़ाकर लागू होने योग्य अंतरराष्ट्रीय कानून में बदलने की राह खोल दी।
