इतिहास | 6 नवंबर | राष्ट्रीय सुरक्षा | भारत-चीन युद्ध 1962
1962 के भारत-चीन युद्ध के बीच प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने रक्षा से जुड़े विषयों पर व्यापक सलाह और राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय के लिए 6 नवंबर को 30 सदस्यीय राष्ट्रीय रक्षा परिषद गठित की। यह परिषद कार्यकारी सैन्य कमान नहीं, बल्कि सरकार को सलाह देने और देश की सामूहिक क्षमता जुटाने का मंच थी।
6 नवंबर 1962 भारतीय रक्षा और प्रशासनिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण तारीख है। भारत-चीन युद्ध के गंभीर दौर में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय रक्षा परिषद (National Defence Council) का गठन किया। इसका उद्देश्य रक्षा से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े मामलों पर सरकार को सलाह देना था। रक्षा नीति के इतिहास पर शोध करने वाले लorne J. Kavic ने अपनी पुस्तक India’s Quest for Security: Defence Policies, 1947–1965 में लिखा है कि 6 नवंबर को 30 सदस्यीय परिषद गठित की गई थी।
इस परिषद के गठन को समझने के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह सेना की कमान संभालने वाली या युद्धक्षेत्र में सैन्य रणनीति तय करने वाली संस्था नहीं थी। इसका स्वरूप सलाहकार था। इसका व्यापक उद्देश्य राजनीतिक नेतृत्व, सैन्य अनुभव, प्रशासनिक क्षमता और सार्वजनिक जीवन के प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाकर राष्ट्रीय संकट के समय रक्षा संबंधी प्रयासों को समन्वित करना था।

1962 का युद्ध और राष्ट्रीय संकट
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद 1950 के दशक से गंभीर होता गया था। तिब्बत में चीन की स्थिति, अक्साई चिन से होकर सड़क निर्माण, सीमांकन पर मतभेद और सीमा क्षेत्रों में दोनों देशों की सैन्य चौकियों के विस्तार ने तनाव बढ़ाया। 1959 के बाद सीमा पर झड़पों और कूटनीतिक विरोधों का सिलसिला तेज हुआ। भारत ने अपनी सीमाओं पर चौकियां स्थापित करने की नीति अपनाई, जबकि चीन ने भारतीय दावों और गतिविधियों को चुनौती दी।
20 अक्टूबर 1962 को चीन ने लद्दाख और तत्कालीन नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA, आज का अरुणाचल प्रदेश) के मोर्चों पर व्यापक सैन्य हमला किया। भारतीय सेना को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, अपर्याप्त साजोसामान, संचार और रसद संबंधी चुनौतियों तथा रणनीतिक गलत आकलनों का सामना करना पड़ा। युद्ध ने देश की राजनीतिक व्यवस्था, रक्षा तैयारियों और सार्वजनिक मनोबल को गहरे संकट में डाल दिया।
4 नवंबर 1962 को राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन के आक्रमण को स्वतंत्र भारत के सामने आए असाधारण संकट के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि देश को केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय, जनता की भागीदारी और व्यापक राष्ट्रीय प्रयास की आवश्यकता है। इसी संबोधन में उन्होंने प्रस्तावित राष्ट्रीय रक्षा परिषद की संरचना और उसकी व्यापक भूमिका का संकेत दिया।
नेहरू की 4 नवंबर की घोषणा: परिषद का विचार
नेहरू के 4 नवंबर 1962 के भाषण का मूल पाठ नेहरू आर्काइव में उपलब्ध है। उसमें उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय रक्षा परिषद में मंत्रिमंडल की आपात समिति, तीनों सेनाओं के तत्कालीन प्रमुख, कुछ सेवानिवृत्त जनरल और अन्य रक्षा सेवाओं के वरिष्ठ अधिकारी तथा सार्वजनिक जीवन के प्रमुख व्यक्ति शामिल किए जाने का विचार था। राज्यों के प्रतिनिधित्व पर भी विचार किया जा रहा था, ताकि परिषद राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधिक हो, लेकिन अनावश्यक रूप से बड़ी न बन जाए।

यह प्रस्ताव युद्धकालीन निर्णय-प्रक्रिया के व्यापक पुनर्गठन का हिस्सा था। अक्टूबर 1962 में आपात स्थिति घोषित होने के बाद मंत्रिमंडल की आपात समिति बनाई गई थी। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और रक्षा विभाग में भी कामकाज तेज करने के लिए व्यवस्थाएं की जा रही थीं। राष्ट्रीय रक्षा परिषद इस व्यवस्था का एक सलाहकारी और समन्वयकारी घटक थी।
नेहरू के भाषण में परिषद के साथ-साथ राष्ट्रीय रक्षा कोष, राज्यों की भागीदारी और नागरिक समितियों की भूमिका का भी उल्लेख था। उन्होंने नागरिक समितियों को जनमनोबल बनाए रखने, अफवाहों पर नियंत्रण, आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर निगरानी और राष्ट्रीय प्रयासों के लिए योगदान जुटाने में उपयोगी बताया। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार रक्षा को केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं देख रही थी, बल्कि उसे आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक भागीदारी से जोड़ने का प्रयास कर रही थी।
6 नवंबर 1962: राष्ट्रीय रक्षा परिषद का गठन
रक्षा नीति के इतिहासकार लorne J. Kavic के अध्ययन के अनुसार, 6 नवंबर 1962 को 30 सदस्यीय राष्ट्रीय रक्षा परिषद गठित की गई। इसका दायित्व सरकार को रक्षा से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े मामलों में सलाह देना था। युद्ध की परिस्थितियों में इस प्रकार की संस्था का गठन इस बात का संकेत था कि सरकार रक्षा संबंधी विचार-विमर्श में केवल तत्कालीन मंत्रियों तक सीमित न रहकर सैन्य नेतृत्व, अनुभवी पूर्व अधिकारियों और सार्वजनिक जीवन के प्रतिनिधियों को भी शामिल करना चाहती थी।
परिषद को कार्यकारी अधिकार या सेना पर प्रत्यक्ष नियंत्रण प्राप्त होने का प्रमाण उपलब्ध विवरणों में नहीं मिलता। युद्ध संचालन, सैन्य आदेश और रक्षा मंत्रालय के प्रशासनिक निर्णय अलग सरकारी तथा सैन्य व्यवस्थाओं के माध्यम से चलते रहे। इसलिए राष्ट्रीय रक्षा परिषद को आधुनिक अर्थ में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद या युद्धकालीन सैन्य मुख्यालय के समान मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।

नेहरू आर्काइव में 16 नवंबर 1962 का एक पत्र भी उपलब्ध है, जिसमें नेहरू ने लोकसभा सदस्य रामेश्वर टांटिया को लिखा कि राष्ट्रीय रक्षा परिषद के लिए मुख्यमंत्रियों का चयन मोटे तौर पर राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में किया गया था। उन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री को सीमा क्षेत्र से संबंधित मामलों में परामर्श दिए जाने की बात भी कही। यह पत्र परिषद में राज्यों की भागीदारी और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की भूमिका को समझने में मदद करता है।
राष्ट्रीय रक्षा परिषद और राष्ट्रीय विकास परिषद में अंतर
1962 के घटनाक्रम में दो मिलते-जुलते नाम वाली संस्थाओं का उल्लेख मिलता है, जिनमें भ्रम होना स्वाभाविक है। राष्ट्रीय विकास परिषद (National Development Council) योजना और विकास से जुड़े केंद्र-राज्य विमर्श का मंच थी। नवंबर 1962 में उसकी बैठक युद्धकालीन संकट और राष्ट्रीय संसाधनों के उपयोग पर विचार के लिए हुई। इसके विपरीत राष्ट्रीय रक्षा परिषद विशेष रूप से रक्षा से जुड़े विषयों पर सरकार को सलाह देने के लिए गठित की गई थी।
4 और 5 नवंबर 1962 को राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक हुई थी। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की नवंबर 1962 की योजना पत्रिका में इस बैठक के बाद जारी घोषणा प्रकाशित हुई, जिसमें राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने देश की रक्षा के लिए अपने-अपने राज्यों के मानव संसाधन, धन और सामग्री के योगदान का संकल्प व्यक्त किया। यह राष्ट्रीय विकास परिषद की भूमिका थी; इसे 6 नवंबर को गठित राष्ट्रीय रक्षा परिषद के साथ एक ही संस्था नहीं समझना चाहिए।
राष्ट्रीय रक्षा परिषद और नेशनल डिफेंस कॉलेज अलग संस्थाएं
एक अन्य महत्वपूर्ण अंतर राष्ट्रीय रक्षा परिषद और नेशनल डिफेंस कॉलेज (National Defence College) के बीच है। नेशनल डिफेंस कॉलेज की स्थापना का प्रस्ताव 6 मई 1959 को कैबिनेट डिफेंस कमेटी ने मंजूर किया था। रक्षा मंत्रालय ने 15 सितंबर 1959 को इसकी स्थापना के औपचारिक आदेश जारी किए और 27 अप्रैल 1960 को इसका पहला पाठ्यक्रम शुरू हुआ। यह वरिष्ठ सैन्य और सिविल अधिकारियों को राष्ट्रीय सुरक्षा, युद्ध की उच्च दिशा, रणनीति और नीति संबंधी व्यापक अध्ययन-प्रशिक्षण देने वाली संस्था है।

इसके विपरीत 6 नवंबर 1962 को गठित राष्ट्रीय रक्षा परिषद युद्धकालीन संदर्भ में सरकार को सलाह देने वाला निकाय थी। दोनों के नाम में ‘राष्ट्रीय रक्षा’ शब्द होने के बावजूद उनका उद्देश्य, गठन का समय और कार्यक्षेत्र अलग-अलग थे।
युद्धकालीन निर्णय-व्यवस्था में बदलाव
राष्ट्रीय रक्षा परिषद का गठन ऐसे समय हुआ जब केंद्र सरकार की रक्षा व्यवस्था में कई बदलाव किए जा रहे थे। जवाहरलाल नेहरू ने 31 अक्टूबर 1962 को रक्षा मंत्रालय का कार्यभार अपने पास ले लिया था। 14 नवंबर को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण को रक्षा मंत्री बनाया गया। इसी दौर में रक्षा उत्पादन और आर्थिक समन्वय से जुड़े मंत्रालयों तथा पदों में भी फेरबदल हुए।
युद्ध ने यह प्रश्न सामने रखा कि भारत की रक्षा तैयारियों में राजनीतिक नेतृत्व, सैन्य कमान, खुफिया आकलन, रक्षा उत्पादन, रसद, विदेश नीति और आर्थिक संसाधनों के बीच बेहतर तालमेल कैसे स्थापित किया जाए। राष्ट्रीय रक्षा परिषद इस व्यापक चिंता का एक संस्थागत उत्तर थी, हालांकि इसे युद्ध के संचालन की केंद्रीय कमान समझना सही नहीं होगा।
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
6 नवंबर 1962 को राष्ट्रीय रक्षा परिषद का गठन भारतीय राज्य की उस प्रतिक्रिया का हिस्सा था, जिसमें युद्ध के संकट को केवल सीमा पर सैनिक कार्रवाई का प्रश्न नहीं माना गया। सरकार ने रक्षा से जुड़े मामलों में व्यापक सलाह, राज्यों के प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक सहयोग को महत्व देने की कोशिश की। यह अनुभव भारत की रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी संस्थागत सोच के विकास के इतिहास में एक उल्लेखनीय पड़ाव है।

इस घटना का महत्व समझते समय 1962 के युद्ध की कठिनाइयों और तत्कालीन संस्थाओं की सीमाओं दोनों को ध्यान में रखना चाहिए। परिषद की स्थापना अपने आप में सैन्य कमजोरी का समाधान नहीं थी और न ही उसने युद्ध संचालन का नियंत्रण संभाला। उसका महत्व इस बात में था कि राष्ट्रीय संकट के बीच रक्षा विषयों पर सरकार को सलाह देने और विभिन्न क्षेत्रों के अनुभव को जोड़ने के लिए एक व्यापक मंच बनाया गया।
इस प्रकार 6 नवंबर 1962 की तारीख केवल एक परिषद के गठन की स्मृति नहीं है। यह उस दौर की कहानी भी है जब भारत को अपनी रक्षा व्यवस्था, राष्ट्रीय समन्वय और संकट के समय नागरिक भागीदारी पर नए सिरे से विचार करना पड़ा।
