धरती पर जीवन का संतुलन बनाए रखने के लिए जैवविविधता का संरक्षण आज दुनिया की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में शामिल हो गया है। जंगलों की कटाई, समुद्री और स्थलीय संसाधनों का अत्यधिक दोहन, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और आक्रामक बाहरी प्रजातियों के प्रसार ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ा दिया है। इसका असर केवल पेड़-पौधों और वन्यजीवों तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव जीवन, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है। इसी चुनौती से निपटने के लिए दुनिया के देशों ने साझा प्रयासों को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है।
आर्मेनिया की राजधानी येरेवान में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जैवविविधता सम्मेलन यानी कॉप17 (COP17) का 31 अक्टूबर 2026 को समापन हुआ। दो सप्ताह तक चले इस सम्मेलन में देशों ने प्रकृति संरक्षण से जुड़े करीब 50 फैसलों को आगे बढ़ाया। सम्मेलन का प्रमुख परिणाम ‘येरेवान पाथवे’ (Yerevan Pathway) रहा। इसके माध्यम से वर्ष 2030 तक वैश्विक जैवविविधता लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उन क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां अब पहले से अधिक तेजी से काम करने की जरूरत है। साथ ही जैवविविधता संरक्षण के लिए करीब दो अरब अमेरिकी डॉलर की नई वित्तीय प्रतिबद्धताओं और पहलों की घोषणा भी हुई।
2030 के लक्ष्य हासिल करने की चुनौती
जैवविविधता का अर्थ पृथ्वी पर मौजूद जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, सूक्ष्मजीवों और उनके प्राकृतिक आवासों में पाई जाने वाली विविधता से है। इसमें जंगल, नदियां, समुद्र, घास के मैदान, रेगिस्तान और अन्य पारिस्थितिकी तंत्र भी शामिल हैं। इन सभी का आपसी संबंध धरती पर जीवन के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
संयुक्त राष्ट्र जैवविविधता सम्मेलन के दौरान हुई पहली वैश्विक समीक्षा में सामने आया कि दुनिया के देश जैवविविधता संरक्षण के लिए तय किए गए लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में अभी पर्याप्त प्रगति नहीं कर पाए हैं। वर्ष 2030 तक निर्धारित 23 लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अब केवल चार वर्ष शेष हैं। ऐसे में मौजूदा प्रयासों को तेज करना जरूरी माना गया है।

ये लक्ष्य वर्ष 2022 में अपनाए गए ‘कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैवविविधता फ्रेमवर्क’ का हिस्सा हैं। इस समझौते का उद्देश्य प्रकृति के नुकसान को रोकना और पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षण एवं पुनर्बहाली की दिशा में आगे बढ़ाना है।
इस फ्रेमवर्क का चर्चित लक्ष्य ‘30 बाय 30’ है। इसके तहत वर्ष 2030 तक पृथ्वी के कम से कम 30 प्रतिशत स्थलीय और अंतर्देशीय जल क्षेत्रों के साथ समुद्री एवं तटीय क्षेत्रों का संरक्षण सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार करना और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग को बढ़ावा देना है।
क्या है येरेवान पाथवे?
सम्मेलन में अपनाया गया येरेवान पाथवे वैश्विक जैवविविधता फ्रेमवर्क की पहली समीक्षा के निष्कर्षों के आधार पर तैयार की गई साझा कार्यदिशा है। इसमें उन प्राथमिकताओं को रेखांकित किया गया है, जिन पर वर्ष 2030 तक विशेष ध्यान देने की जरूरत होगी।
इसके तहत प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाली सब्सिडी और आर्थिक प्रोत्साहनों में सुधार, विकासशील देशों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने, राष्ट्रीय बजट को जैवविविधता लक्ष्यों के अनुरूप बनाने और संरक्षण संबंधी योजनाओं की निगरानी को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

सम्मेलन में यह भी स्पष्ट किया गया कि केवल पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अलग-अलग कार्यक्रम चलाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए आर्थिक नीतियों और निवेश के तरीकों में भी बदलाव करना जरूरी है। जिन गतिविधियों को सरकारी सब्सिडी या अन्य वित्तीय प्रोत्साहन के जरिए बढ़ावा मिलता है और जिनसे प्रकृति को नुकसान पहुंचता है, उनकी समीक्षा करने की जरूरत बताई गई।
संरक्षण के लिए करीब दो अरब डॉलर की नई प्रतिबद्धताएं
कॉप17 के दौरान जैवविविधता संरक्षण के लिए करीब दो अरब अमेरिकी डॉलर की नई वित्तीय प्रतिबद्धताओं और पहलों की घोषणा हुई। इसमें अलग-अलग माध्यमों से धन जुटाने और संरक्षण कार्यक्रमों को सहायता देने की योजनाएं शामिल हैं।
सम्मेलन के आधिकारिक विवरण के अनुसार, लगभग 56 करोड़ डॉलर की राशि ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी (GEF-9) की पुनर्भरण प्रक्रिया और ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क फंड के तहत शामिल है। इसके अलावा प्रजातियों के संरक्षण और पुनर्बहाली से जुड़ी स्पीशीज रिकवरी एलायंस के माध्यम से करीब 50 करोड़ डॉलर की घोषणा की गई।
वहीं, वैल्यू नेचर फंड के जरिए 33 करोड़ डॉलर से अधिक की राशि जुटाने की पहल सामने आई। इसका उद्देश्य प्रकृति संरक्षण में निजी पूंजी की भागीदारी को बढ़ावा देना है। इन घोषणाओं को जैवविविधता संरक्षण के लिए जरूरी वित्तीय संसाधन जुटाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

ध्यान देने वाली बात: इन आंकड़ों को एक ही कोष में उपलब्ध धनराशि के रूप में नहीं समझना चाहिए। ये विभिन्न वित्तीय व्यवस्थाओं, प्रतिबद्धताओं और पहलों से संबंधित हैं।
आदिवासी और स्थानीय समुदायों की भूमिका को महत्व
सम्मेलन का एक अन्य महत्वपूर्ण परिणाम आदिवासी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से जुड़ा रहा। लंबे समय से इन समुदायों की पारंपरिक जानकारी और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में उनकी भूमिका को वैश्विक स्तर पर अधिक महत्व देने की मांग होती रही है।
कॉप17 में जैवविविधता सम्मेलन के पक्षकार देशों ने अनुच्छेद 8(j) से संबंधित नए स्थायी सहायक निकाय के संचालन नियमों पर सहमति जताई। इन नियमों को आधिकारिक रूप से ‘सेवान गाइडलाइंस’ (Sevan Guidelines) नाम दिया गया है।
इस पहल का उद्देश्य जैवविविधता से जुड़ी वैश्विक नीतियों और फैसलों में आदिवासी समुदायों तथा स्थानीय लोगों की भूमिका को मजबूत करना है। इन समुदायों के पास जंगलों, वन्यजीवों, औषधीय पौधों और पारंपरिक प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़ा लंबे समय का अनुभव और स्थानीय ज्ञान मौजूद है।

सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि प्रकृति संरक्षण की योजनाएं बनाते समय उन लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए, जो सीधे तौर पर प्राकृतिक संसाधनों के साथ रहते और उन पर निर्भर करते हैं।
करीब 50 फैसलों में कई पर्यावरणीय मुद्दे शामिल
येरेवान सम्मेलन में जैवविविधता संरक्षण से जुड़े करीब 50 फैसलों को अपनाया गया। इनमें संरक्षित क्षेत्र, वन जैवविविधता, वन्यजीव प्रबंधन, आक्रामक बाहरी प्रजातियां, समुद्री एवं तटीय जैवविविधता, सिंथेटिक बायोलॉजी और जैव सुरक्षा जैसे विषय शामिल रहे।
आक्रामक प्रजातियां वे बाहरी जीव या पौधे होते हैं, जो किसी नए क्षेत्र में पहुंचकर वहां की स्थानीय जैवविविधता और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनके नियंत्रण और प्रभावों के आकलन को भी संरक्षण के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा गया।
इसके अलावा जैवविविधता की निगरानी और जवाबदेही के लिए नए संकेतकों और मापदंडों को विकसित करने की पहल हुई। इससे देशों को अपनी संरक्षण योजनाओं की प्रगति का आकलन करने में मदद मिल सकेगी।

एशियाई विकास बैंक ने भी जैवविविधता बॉन्ड और निवेश से जुड़े नए प्रयासों को प्रोत्साहित करने के लिए पहल की। इसके तहत प्रकृति संरक्षण के लिए निवेश आकर्षित करने और जैवविविधता की निगरानी को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया गया।
पर्यावरणीय बहुपक्षवाद पर जोर
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की कार्यकारी निदेशक इन्गेर ऐंडरसन ने सम्मेलन के परिणामों को पर्यावरणीय मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि येरेवान में देशों ने मतभेदों के बावजूद साथ आकर समझौते की भावना के साथ अहम फैसले लिए।
उनके अनुसार, कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैवविविधता फ्रेमवर्क के लक्ष्यों को वास्तविक कार्रवाई में बदलना अब सबसे बड़ी जरूरत है। इसके लिए देशों को अपनी नीतियों, निवेश और विकास संबंधी फैसलों में जैवविविधता संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी।
वहीं, जैविक विविधता पर सम्मेलन की कार्यकारी सचिव एस्ट्रिड शोमेकर ने कहा कि प्रकृति की रक्षा करते हुए उसके विनाश को वित्तीय सहायता देना जारी नहीं रखा जा सकता। उन्होंने संसाधनों को उन देशों और समुदायों तक पहुंचाने की जरूरत बताई, जिन्हें संरक्षण के लिए उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

शोमेकर के अनुसार, येरेवान में सरकारों के बीच बनी सहमति की असली परीक्षा इस बात से होगी कि वे अपने देशों में लौटने के बाद कौन-से ठोस बदलाव लागू करती हैं।
अब 2028 में इक्वाडोर में होगा अगला सम्मेलन
जैवविविधता पर संयुक्त राष्ट्र का अगला सम्मेलन यानी कॉप18 वर्ष 2028 में इक्वाडोर में आयोजित होगा। कॉप17 के दौरान इक्वाडोर को अगले सम्मेलन की मेजबानी के लिए चुना गया।
इस समय तक वर्ष 2030 के वैश्विक जैवविविधता लक्ष्यों को हासिल करने के लिए केवल दो वर्ष शेष रह जाएंगे। ऐसे में अगला सम्मेलन अब तक किए गए प्रयासों की प्रगति और शेष चुनौतियों के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
फैसलों को जमीन पर उतारना होगी असली चुनौती
कुल मिलाकर, येरेवान सम्मेलन ने जैवविविधता संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वित्तीय संसाधनों और आदिवासी समुदायों की भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में कई अहम फैसले किए हैं। लेकिन इन फैसलों का वास्तविक महत्व तभी सामने आएगा, जब देश इन्हें अपनी राष्ट्रीय नीतियों, बजट और जमीनी स्तर की संरक्षण योजनाओं में लागू करेंगे। प्रकृति को बचाने की चुनौती केवल सम्मेलनों में सहमति बनाने से पूरी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए लगातार और मापने योग्य कार्रवाई की जरूरत होगी।

