Dinman Times
  • वीडियो
  • वेब स्टोरीज
Sign In
  • होम
  • देश
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • दिल्‍ली
    • झारखण्‍ड
    • उत्तराखंड
    • पश्चिम बंगाल
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Reading: 3 नवंबर 1948: जवाहरलाल नेहरू का संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहला ऐतिहासिक भाषण
साझा करें
Notification
Font ResizerAa
Dinman Times
  • वेब स्टोरीज
  • होम
  • देश
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Search
  • होम
  • देश
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • दिल्‍ली
    • झारखण्‍ड
    • उत्तराखंड
    • पश्चिम बंगाल
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Follow US
© 2026. All Rights Reserved.

Home - देश - 3 नवंबर 1948: जवाहरलाल नेहरू का संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहला ऐतिहासिक भाषण

3 नवंबर 1948: जवाहरलाल नेहरू का संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहला ऐतिहासिक भाषण

प्रशांत कुमार
Last updated: नवम्बर 3, 2026 3:59 अपराह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 2 घंटे पहले
जवाहरलाल नेहरू
साझा करें

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत को अपनी विदेश नीति, संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों को विश्व मंच पर स्पष्ट करने की चुनौती का सामना करना पड़ा। इसी दौर में 3 नवंबर 1948 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) में पहला ऐतिहासिक संबोधन भारतीय कूटनीतिक इतिहास की एक उल्लेखनीय घटना के रूप में याद किया जाता है। यह वह समय था जब जम्मू-कश्मीर का प्रश्न संयुक्त राष्ट्र के सामने था और भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष अपनी स्थिति स्पष्ट करनी थी।

आजाद भारत और विश्व मंच पर नई भूमिका

15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्वतंत्र पहचान स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू की। ब्रिटिश शासन से विरासत में मिली कई चुनौतियों के साथ देश को विभाजन, शरणार्थी संकट, रियासतों के एकीकरण और सीमाई सुरक्षा जैसे प्रश्नों से भी जूझना पड़ा। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विदेश नीति को भारत की संप्रभुता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांतों से जोड़ने पर जोर दिया।

संयुक्त राष्ट्र भारत के लिए ऐसा मंच था जहां वह नवस्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपने विचार रख सकता था और अंतरराष्ट्रीय विवादों पर अपनी स्थिति दर्ज करा सकता था। भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद उसकी विदेश नीति और प्रतिनिधित्व को नई राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप आकार दिया जा रहा था।

3 नवंबर 1948 का संबोधन: ऐतिहासिक संदर्भ

नेहरू के इस संबोधन को समझने के लिए 1947-48 की जम्मू-कश्मीर की परिस्थितियों को देखना आवश्यक है। अक्टूबर 1947 में कबायली हमलावरों के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश और उसके बाद राज्य के भारत में विलय के घटनाक्रम ने भारत-पाकिस्तान के बीच सशस्त्र संघर्ष को जन्म दिया। भारत ने इस प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र में उठाया था। जनवरी 1948 में मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के समक्ष आया और आगे चलकर महासभा में भी इस पर चर्चा हुई।

Dinman Times ads 728-90

3 नवंबर 1948 के संबोधन में नेहरू ने भारत के दृष्टिकोण और कश्मीर से जुड़े घटनाक्रम की पृष्ठभूमि पर बात रखी। उस समय भारत का मुख्य तर्क था कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति बाहरी आक्रमण और सुरक्षा संकट से पैदा हुई थी तथा राज्य के भारत में विलय का कानूनी आधार मौजूद था। भारत ने यह भी कहा कि क्षेत्र में सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद जनता की इच्छा का सम्मान करने की प्रतिबद्धता उसके रुख का हिस्सा है।

ये भी पढ़े

खगड़िया में ट्रेन रोककर मारपीट और फायरिंग का आरोप, STF ने शुभम कुमार उर्फ रवि को किया गिरफ्तार
टिकट की दावेदारी करने पहुंचे BJP नेता राजबीर कश्यप की संजीव बालियान के आवास पर मौत, बाथरूम में मिले अचेत
पटना में नेशनल रेड रन 4.0 का भव्य आयोजन, HIV जागरूकता के संदेश के साथ दौड़े देशभर के युवा
25 साल की राजनीतिक हिंसा के जख्मों पर नौकरी का मरहम, लेकिन इंसाफ की राह में दस्तावेजों की बड़ी दीवार !

कश्मीर प्रश्न और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका

कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में पहुंचने के बाद सुरक्षा परिषद ने युद्धविराम, सैनिकों की वापसी और जनमत-संग्रह से संबंधित प्रस्तावों पर विचार किया। 1948 में संयुक्त राष्ट्र आयोग ने भी समाधान के लिए चरणबद्ध प्रस्ताव रखे। इन प्रस्तावों के क्रियान्वयन को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच शर्तों, क्रम और सुरक्षा संबंधी आशंकाओं पर मतभेद बने रहे। इसलिए विवाद का समाधान तत्काल संभव नहीं हो पाया।

इस पृष्ठभूमि में नेहरू का संबोधन केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि नवस्वतंत्र भारत की उस कोशिश का हिस्सा था जिसमें वह अपने राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को विश्व समुदाय के सामने प्रस्तुत कर रहा था। भारत की स्थिति को समझने के लिए उस समय के सैन्य घटनाक्रम, विलय-पत्र, संयुक्त राष्ट्र में हुई बहसों और दोनों देशों के आधिकारिक रुख को साथ पढ़ना आवश्यक है।

नेहरू की विदेश नीति और बहुपक्षीय कूटनीति

नेहरू अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान में बातचीत और बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका को महत्व देते थे। उनका मानना था कि नवस्वतंत्र देशों को वैश्विक मामलों में अपनी स्वतंत्र आवाज और निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में भारत की भागीदारी इसी व्यापक दृष्टिकोण से जुड़ी थी।

Dinman Times ads 728-90

बाद के वर्षों में भारत ने उपनिवेशवाद-विरोध, नस्लीय भेदभाव के विरोध, शांति, निरस्त्रीकरण और विकासशील देशों के सहयोग जैसे मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई। नेहरू के दौर की विदेश नीति को आज अलग-अलग ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टिकोणों से परखा जाता है, लेकिन यह निर्विवाद है कि स्वतंत्र भारत की शुरुआती कूटनीतिक पहचान गढ़ने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

ऐतिहासिक महत्व

3 नवंबर 1948 का संबोधन उस समय का प्रतीक है जब भारत एक नए स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अपनी जगह बना रहा था। देश के सामने घरेलू पुनर्निर्माण के साथ-साथ सीमा, सुरक्षा और कूटनीति की कठिन चुनौतियां थीं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की बात रखना इन चुनौतियों को वैश्विक मंच पर समझाने और समर्थन जुटाने की प्रक्रिया का हिस्सा था।

इस घटना को याद करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि कश्मीर विवाद का इतिहास जटिल है और उसके विभिन्न पक्षों की व्याख्याएं अलग-अलग हैं। इसलिए उस दौर के भाषणों और प्रस्तावों को उनके मूल ऐतिहासिक संदर्भ में समझना चाहिए, न कि बाद की राजनीतिक धारणाओं के आधार पर।

एक नजर में

  • तारीख: 3 नवंबर 1948
  • वक्ता: जवाहरलाल नेहरू
  • पद: स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री
  • मंच: संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly)
  • प्रमुख ऐतिहासिक संदर्भ: जम्मू-कश्मीर प्रश्न और भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति
  • महत्व: स्वतंत्र भारत की शुरुआती बहुपक्षीय कूटनीति का महत्वपूर्ण प्रसंग

नेहरू का यह संबोधन स्वतंत्र भारत की उस ऐतिहासिक यात्रा की याद दिलाता है, जिसमें देश ने विश्व मंच पर अपनी आवाज, संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों को स्थापित करने का प्रयास किया।

Dinman Times ads 728-90
TAGGED:Education NewsIndia NewsIndian PoliticsInternational NewsWorld News
ख़बर साझा करें
Facebook Whatsapp Whatsapp Telegram Email Print
पिछली ख़बर ऑपरेशन कैक्टस 3 नवंबर 1988: ऑपरेशन कैक्टस – मालदीव में तख्तापलट की कोशिश नाकाम कर भारत ने बचाई सरकार
अगली ख़बर द बॉम्बे टाइम्स एंड जर्नल ऑफ कॉमर्स 3 नवंबर 1838: ‘द बॉम्बे टाइम्स एंड जर्नल ऑफ कॉमर्स’ की शुरुआत – द टाइम्स ऑफ इंडिया की ऐतिहासिक यात्रा
Google prefered

गूगल पर फेवरेट बनाएँ

ये भी पढ़ें

खगड़िया ट्रेन फायरिंग केस में शुभम कुमार गिरफ्तार

खगड़िया में ट्रेन रोककर मारपीट और फायरिंग का आरोप, STF ने शुभम कुमार उर्फ रवि को किया गिरफ्तार

माउंट एवरेस्ट के पास हेलीकॉप्टर टक्कर, भारतीय की मौत

माउंट एवरेस्ट के पास दो हेलीकॉप्टरों की टक्कर, भारतीय पर्यटक की मौत; तीन लोग घायल

राजबीर कश्यप

टिकट की दावेदारी करने पहुंचे BJP नेता राजबीर कश्यप की संजीव बालियान के आवास पर मौत, बाथरूम में मिले अचेत

पटना में नेशनल रेड रन 4.0, HIV जागरूकता का संदेश

पटना में नेशनल रेड रन 4.0 का भव्य आयोजन, HIV जागरूकता के संदेश के साथ दौड़े देशभर के युवा

विश्व जेलीफिश दिवस

3 नवंबर: विश्व जेलीफिश दिवस – समुद्री पारिस्थितिकी में जेलीफिश की अहम भूमिका

Dinman Ads

Get Connected with us on social networks

Facebook-f X-twitter Instagram Youtube Linkedin-in

Poppular Categories

  • बिहार
  • देश
  • अपराध
  • राजनीति
  • मनोरंजन
  • विदेश
  • धर्म
  • खेल
  • टेक्नोलॉजी
  • पटना

Download APP

Google-play Apple
  • About us
  • Privacy Policy
  • Terms and Condition
  • Cookies Policy
  • Contact us
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?