बंगाल में 2001 से राजनीतिक हिंसा में मारे गए लोगों के एक पात्र आश्रित को मिलेगी ग्रुप-डी की सरकारी नौकरी, 50 हजार रुपये मासिक पारिवारिक आय, उम्र और शैक्षणिक योग्यता के साथ FIR, चार्जशीट और अदालत में आरोप तय होने का प्रमाण भी जरूरी—सबसे बड़ा सवाल, पुराने मामलों में ये दस्तावेज कहां से आएंगे?
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले ढाई दशक का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन, चुनावी मुकाबलों और राजनीतिक दलों की उठापटक का इतिहास नहीं है। इसके पन्नों में हिंसा, हत्याओं, प्रतिशोध और उन परिवारों की पीड़ा भी दर्ज है, जिनके घर से किसी राजनीतिक संघर्ष ने कमाने वाला सदस्य छीन लिया। अब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने ऐसे परिवारों को सरकारी नौकरी देने की योजना लागू की है। पहली नजर में यह फैसला उन घरों के लिए आर्थिक सुरक्षा की नई उम्मीद है, जिन्होंने वर्षों तक अपने परिजन की मौत और उसके बाद पैदा हुए आर्थिक संकट का बोझ उठाया है। लेकिन इस फैसले के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा है—क्या 2001 से अब तक के हर पात्र मामले को प्रशासन निष्पक्षता और पर्याप्त दस्तावेजों के आधार पर पहचान पाएगा?
राज्य सरकार ने 30 अक्टूबर 2026 को अधिसूचना जारी कर इस योजना को औपचारिक रूप दिया है। इसका दायरा 1 जनवरी 2001 या उसके बाद राजनीतिक हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों तक रखा गया है। योजना के तहत प्रत्येक पात्र मृतक के परिवार के एक आश्रित सदस्य को ग्रुप-डी पद पर नियुक्ति देने का प्रावधान है। सरकार ने इसके लिए अतिरिक्त पद सृजित करने की व्यवस्था को विशेष अपवाद के तौर पर रखा है। यानी मौजूदा रिक्तियों पर ही निर्भर रहने के बजाय योजना के लिए अलग पद बनाने का रास्ता भी रखा गया है। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसकी समय-सीमा में वाममोर्चा शासन के अंतिम वर्ष और तृणमूल कांग्रेस के पूरे 15 साल के शासनकाल के साथ अलग-अलग चुनावों के दौरान हुई हिंसा के मामले भी आ सकते हैं। सरकार की ओर से योजना को किसी एक राजनीतिक दल या एक शासनकाल तक सीमित नहीं बताया गया है। लेकिन इस व्यापक दायरे को जमीन पर लागू करना ही प्रशासन की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
नौकरी की घोषणा से ज्यादा कठिन होगी पात्र परिवार की पहचान
इस योजना का उद्देश्य उन परिवारों को राहत देना है, जिनके कमाने वाले सदस्य की राजनीतिक हिंसा में मौत हो गई और जिनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया। लेकिन किसी व्यक्ति की हत्या होना और उसकी मौत को आधिकारिक रूप से राजनीतिक हिंसा का मामला प्रमाणित करना दो अलग बातें हैं।

यही इस योजना की सबसे संवेदनशील कसौटी है। अधिसूचना के अनुसार, आवेदक को संबंधित जिले के जिलाधिकारी के पास आवेदन देना होगा। इसके साथ मृतक का मृत्यु प्रमाणपत्र, आवेदक का मृतक से संबंध साबित करने वाला दस्तावेज, प्राथमिकी यानी एफआईआर, चार्जशीट और अदालत में आरोप तय किए जाने से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। जिला स्तरीय स्क्रीनिंग कमेटी इन दस्तावेजों के आधार पर यह प्रमाणित करेगी कि संबंधित मौत राजनीतिक हिंसा के कारण हुई थी।
अब जरा उन परिवारों की स्थिति समझिए, जिनके परिजन की हत्या 2001, 2005 या 2010 के आसपास हुई होगी। इतने पुराने मामले में परिवार के पास मृत्यु प्रमाणपत्र तो हो सकता है, लेकिन क्या एफआईआर की प्रमाणित प्रति सुरक्षित होगी? क्या चार्जशीट दाखिल हुई थी? क्या अदालत में आरोप तय हुए थे? यदि जांच लंबी चली, मुकदमा अधूरा रहा या दस्तावेज किसी पुराने थाने, अदालत अथवा रिकॉर्ड रूम में उपलब्ध नहीं हैं, तो परिवार अपनी पात्रता कैसे साबित करेगा?
यहां सरकार को केवल आवेदन मांगने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे पुराने रिकॉर्ड खोजने, पुलिस और अदालतों के दस्तावेजों का मिलान कराने और जरूरत पड़ने पर प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने में भी परिवारों की मदद करनी होगी। अन्यथा जिस योजना का उद्देश्य पीड़ित परिवारों को राहत देना है, वही दस्तावेज जुटाने की नई दौड़ में बदल सकती है।
50 हजार की आय सीमा और उम्र की शर्त भी बनेगी कसौटी
योजना में केवल मृतक की मौत का कारण साबित करना ही पर्याप्त नहीं है। परिवार की आर्थिक स्थिति और आवेदक की पात्रता भी जांची जाएगी। टाइम्स ऑफ इंडिया की अधिसूचना आधारित रिपोर्ट के मुताबिक, आवेदन के समय परिवार की मासिक आय 50 हजार रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए। परिवार का कोई सदस्य नियमित सरकारी सेवा में नहीं होना चाहिए और परिवार में कोई आयकरदाता भी नहीं होना चाहिए।

आवेदक का भारतीय नागरिक और पश्चिम बंगाल का निवासी होना जरूरी है। सामान्य तौर पर कम से कम आठवीं कक्षा उत्तीर्ण होना चाहिए। आवेदक की आयु 1 जनवरी 2026 को कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए। सामान्य वर्ग के लिए अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए 50 वर्ष बताई गई है। पात्रता की कुछ परिस्थितियों में शैक्षणिक योग्यता और आयु सीमा में छूट की सिफारिश करने का अधिकार स्क्रीनिंग कमेटी को दिया गया है।
इन शर्तों के पीछे आर्थिक जरूरत और सरकारी नियुक्ति के सामान्य मानकों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई देती है। लेकिन यहां भी व्यावहारिक सवाल हैं। जिस परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य 20-25 साल पहले मारा गया, उसके बच्चों की उम्र अब नौकरी की निर्धारित सीमा से अधिक हो सकती है। मृतक का बेटा या बेटी उस समय छोटे रहे होंगे, लेकिन आज वे 40-45 वर्ष के हो चुके होंगे। कुछ परिवारों में मृतक के माता-पिता भी अब जीवित नहीं होंगे। कई मामलों में परिवार के सदस्यों की आर्थिक स्थिति समय के साथ बदल गई होगी।
इसलिए सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि पात्रता तय करते समय किस तारीख की पारिवारिक निर्भरता और आर्थिक स्थिति को प्राथमिकता दी जाएगी। मृतक की मौत के समय परिवार की स्थिति या आवेदन के समय की स्थिति—दोनों के बीच अंतर कई मामलों में निर्णायक हो सकता है।
राजनीतिक हिंसा का प्रमाण कौन तय करेगा?
इस पूरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण और विवाद की आशंका वाला हिस्सा है—किस मौत को राजनीतिक हिंसा माना जाएगा?

बंगाल में राजनीतिक हिंसा के आरोप अलग-अलग दलों की ओर से वर्षों से लगाए जाते रहे हैं। चुनाव के पहले, मतदान के दौरान और चुनाव परिणाम के बाद हुई घटनाओं को लेकर राजनीतिक दलों के दावे अक्सर एक-दूसरे से अलग रहे हैं। किसी पक्ष के लिए घटना राजनीतिक प्रतिशोध हो सकती है, तो दूसरे पक्ष के लिए वह व्यक्तिगत रंजिश या आपराधिक विवाद। ऐसे में प्रशासन के सामने केवल दस्तावेजों की जांच नहीं, बल्कि घटना की प्रकृति का निष्पक्ष निर्धारण भी चुनौती होगा।
सरकार ने इसके लिए जिला स्तरीय स्क्रीनिंग कमेटी बनाने का प्रावधान किया है। इसकी अध्यक्षता जिलाधिकारी करेंगे। पुलिस अधीक्षक या कोलकाता में संबंधित पुलिस उपायुक्त और गृह एवं पहाड़ी मामलों के विभाग की ओर से नामित अधिकारी इसमें शामिल होंगे। आवेदन पर निर्णय के लिए 90 दिनों की समय-सीमा निर्धारित की गई है। जिला कमेटी के फैसले से असंतुष्ट आवेदक 30 दिनों के भीतर राज्य स्तरीय कमेटी में अपील कर सकेगा।
यह व्यवस्था प्रशासनिक जवाबदेही की दिशा में एक कदम है, लेकिन निष्पक्षता की कसौटी इससे कहीं बड़ी होगी। कमेटी के सामने यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी पीड़ित को केवल उसकी राजनीतिक पहचान के कारण लाभ से वंचित न किया जाए और किसी अप्रमाणित दावे को राजनीतिक दबाव में स्वीकार भी न किया जाए। निर्णय का आधार दलगत पहचान नहीं, बल्कि घटना के तथ्य और उपलब्ध साक्ष्य होने चाहिए।
सरकारी आंकड़ों और जमीनी घटनाओं के बीच अंतर का सवाल
राजनीतिक हिंसा के मामलों की सही संख्या तय करना भी आसान नहीं रहा है। एनडीटीवी की मई 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एनसीआरबी के आंकड़ों में पश्चिम बंगाल में 2014 से 2021 के बीच राजनीतिक कारणों से 47 हत्याएं दर्ज थीं, जबकि 2022 के बाद के आंकड़ों में राजनीतिक हत्याओं की संख्या शून्य दिखाई गई। इसी रिपोर्ट ने बीरभूम के बोगतुई कांड और 2023 के पंचायत चुनावों के दौरान हुई हिंसा का उल्लेख करते हुए आधिकारिक आंकड़ों और मीडिया में सामने आई घटनाओं के बीच अंतर की ओर ध्यान दिलाया था।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर मीडिया रिपोर्ट में दर्ज मौत को स्वतः राजनीतिक हत्या मान लिया जाए। लेकिन यह जरूर स्पष्ट होता है कि राजनीतिक हिंसा की पहचान और उसकी आधिकारिक गणना में चुनौतियां मौजूद रही हैं। ब्रिटेन सरकार की भारत संबंधी एक कंट्री पॉलिसी रिपोर्ट ने भी राजनीतिक हिंसा के मामलों की सही संख्या जुटाने को कठिन बताया था। उसमें एफआईआर दर्ज न होने, कम रिपोर्टिंग और राजनीतिक प्रभाव जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया था।
ऐसे में 25 साल के मामलों की जांच के लिए केवल उपलब्ध सरकारी आंकड़ों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। पुलिस रिकॉर्ड, अदालतों के दस्तावेज, जिला प्रशासन की रिपोर्ट और परिवारों के पास उपलब्ध प्रमाणों को एक साथ देखकर निर्णय लेना होगा।
राहत का फैसला, लेकिन न्याय का विकल्प नहीं
सरकार की इस योजना का स्वागत उन परिवारों के लिए उम्मीद की तरह हो सकता है, जिन्होंने लंबे समय तक आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना किया है। लेकिन सरकारी नौकरी किसी हत्या का न्यायिक समाधान नहीं है। नौकरी परिवार को आर्थिक सहारा दे सकती है, लेकिन उससे हत्या के मामले में न्याय, दोषियों की जवाबदेही और निष्पक्ष जांच की जरूरत खत्म नहीं होती।
यह भी ध्यान रखना होगा कि योजना के तहत पात्रता मिलने का अर्थ नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं है। स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिश के अलावा पदों की उपलब्धता, पुलिस सत्यापन और मेडिकल जांच जैसी प्रक्रियाएं भी पूरी करनी होंगी। सरकार के सामने अब तीन बड़ी जिम्मेदारियां हैं। पहली, 2001 से अब तक के मामलों का जिला-वार साझा रिकॉर्ड तैयार करना। दूसरी, पुराने दस्तावेजों की अनुपलब्धता की स्थिति में परिवारों को प्रमाण जुटाने में सहायता देना और वैकल्पिक सत्यापन की पारदर्शी व्यवस्था बनाना। तीसरी, सभी राजनीतिक दलों और समुदायों के पीड़ित परिवारों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करना।

बंगाल की राजनीति में हिंसा का इतिहास किसी एक पार्टी या एक सरकार के कार्यकाल से शुरू नहीं होता और न ही किसी एक चुनाव के बाद समाप्त होता है। इसलिए इस योजना की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि इसमें किस दल के कितने परिवार शामिल हुए, इससे ज्यादा इस बात से तय होगी कि क्या हर पात्र परिवार तक बिना भेदभाव के राहत पहुंची।
ढाई दशक पुराने राजनीतिक जख्मों पर सरकारी नौकरी का मरहम तभी सार्थक होगा, जब पीड़ित परिवारों को अपनी पीड़ा साबित करने के लिए एक बार फिर व्यवस्था के दरवाजों पर भटकना न पड़े। सरकार के सामने चुनौती केवल नौकरी देने की नहीं, बल्कि यह भरोसा कायम करने की है कि राजनीतिक हिंसा में जान गंवाने वाले व्यक्ति की पहचान उसकी पार्टी से नहीं, उसके परिवार के अधिकार से होगी।
