वह साल 1999 के दिन थे। स्वतंत्र भारत के दफ्तर में सुरमई रंग की हाफ सर्किल मेज़, जिसका बॉर्डर नीला था। इसी मेज़ पर रखी उनकी खींची तस्वीर इतनी नायाब थी, जो बहुत कुछ भूल जाने के बावजूद आजतक मेरे ज़ेहन में महफूज़ है। चौथाई सदी से ज़्यादा का वक़्त गुज़र चुका है मगर वह तस्वीर आज भी समय की धुंध से बेअसर है। बादलों से भरा गहरा आसमान और इस आसमान में बिजली की तरह चमकती बिजली को कैमरे से लपक लेने का वह हुनर। कुदरत के इस लम्हे को कैप्चर करने के लिए क्लिक की टाइमिंग का अंदाजा जिस शख्स को था, वह थे फ़ोटो जर्नलिस्ट आर बी थापा जी जिनको सब थापा भाई कहते थे।
थापा भाई बहुत सीनियर थे और हम ट्रेनी। उनको देख खुद-ब-खुद दिमाग़ में ‘हिन्दी चीनी भाई-भाई’ का कोरस बजने लगता। सूरत चाइनीज़ और जिस्म गठा हुआ ज़रूर था मगर मुस्कुराहट खालिस दोस्ताना। ऐसा लगता था कि रोल और कैमरा लादे कुछ ज़्यादा ही झुक जाते हैं मगर इस भारी भरकम बैग को लादना और उसकी हिफाज़त करना आसान भी नहीं था।
शायद जर्नलिज़्म में फोटोग्राफी की परिभाषा मोर देन थाउजेंड वर्ड्स ऐसे ही नहीं बनी। फोटो जर्नलिज्म की दुनिया में थापा वह बड़ा नाम है जो इस लेन में आने वाले बच्चों के लिए एक सबक़ बनेगा। 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के वह और उनका कैमरा गवाह थे। हंगामी हालत में कारसेवकों के आक्रोश के बीच जान की परवाह किए बिना उन्होंने एक तबाह होती इमारत की पहली और बेहद खास तस्वीरें अपने कैमरे में कैद की थीं। फिर अपने साथ इस रोल को कारसेवकों से बचाते लखनऊ तक लाना उससे भी बड़ी मुहिम थी। तस्वीरें अखबार के दफ्तर तक सुरक्षित पहुंची और उसके बाद पूरी दुनिया ने उसे देखा। फोटोग्राफी की दुनिया के ये ऐसे कारनामे थे जिसके लिए मोर देन मिलियन वर्ड भी छोटा है।
खबर छूट गई तो रिपोर्टर मैनेज कर सकता है मगर लम्हा गुज़र गया तो कोई भरपाई नहीं। और फिर थापा भाई के ख़ज़ाने में तो अनगिनत ऐसे यादगार लम्हे थे। क्या सियासत और क्या विरासत। ड्यूटी पर हों या ड्यूटी का ऑफ। एक कैमरामैन की आँख का लेंस अगर खुला है तो हर लम्हा वह ड्यूटी पर ही होता है।

मगर अफ़सोस कि जिस इंसान ने कैमरे के लेंस की बदौलत अपने हुनर के बूते पर बेशुमार इंसाफ मांगती तस्वीरों को क्लिक किया आज वह खुद एक नाइंसाफी (हार्ट अटैक) का शिकार हो गया। उम्र साठ के ऊपर रही होगी मगर सेहत साथ छोड़ती गई। ज़िंदगी के आखिरी दिनों में वह बीमार रहे। मुफलिसी इलाज और देखभाल के रस्ते में रोड़ा बनी। जिस शख्स के हुनर को हाथों हाथ लिया जाना चाहिए था, जिसके गिर्द सीखने वालों का जमावड़ा होना चाहिए था और जिसको उसके किए कामों की बदौलत एक अच्छी रायल्टी का हक़दार होना चाहिए था, उस शख्स ने राम मनोहर लोहिया अस्पताल में अपनी आखिरी सांसें पूरी किं और इस दुनिया से रुखसत हो गया।
थापा भाई! आज फिर आपकी वही तस्वीर याद आ रही है और याद आ रहे हैं शहरयार। जब उन्होंने रचा होगा- ‘कहिए तो आसमां को ज़मीं पर उतार लाएं’, तब कहाँ सोचा होगा कि इस मुहावरे को कुछ बदलाव के साथ थापा भाई साकार कर देंगे। वह आसमां नहीं उसमें चमकती बिजली को ऐसा क़ैद कर लेंगे कि आपके न होने पर भी वह लमहा अपने क़ैद होने पर रश्क करेगा।
