हॉलीवुड अभिनेत्री फ्रीडा पिंटो ने भारतीय फिल्मों और टेलीविजन में महिलाओं के बदलते चित्रण की सराहना की है। उनका कहना है कि अब पर्दे पर ऐसी महिला किरदार भी दिखाई दे रही हैं जिनमें कमियां, विरोधाभास और जटिलताएं हैं—वे केवल त्याग करने वाली, कर्तव्य निभाने वाली या आदर्श मानी जाने वाली महिलाओं तक सीमित नहीं हैं।
पिंटो ने यह बात समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कही। उनके मुताबिक, भारतीय मनोरंजन जगत में महिला पात्रों को अधिक वास्तविक और बहुआयामी रूप में दिखाने की दिशा में सकारात्मक बदलाव आया है। उनकी टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब फिल्मों और वेब सीरीज में महिलाओं की आकांक्षाओं, निजी फैसलों और सामाजिक दबावों को लेकर कहानियां अधिक विविध हो रही हैं।
‘परफेक्ट’ किरदारों से आगे बढ़ती कहानियां
फ्रीडा पिंटो ने कहा कि उन्हें ऐसे किरदार अधिक दिलचस्प और भरोसेमंद लगते हैं जो पूरी तरह निर्दोष या आदर्श नहीं होते। उनके अनुसार, जब महिला पात्रों को अपनी कमजोरियों, उलझनों और अलग-अलग इच्छाओं के साथ दिखाया जाता है, तो दर्शकों के लिए उनसे जुड़ना आसान हो सकता है।
उनकी बात का आशय यह है कि महिला प्रतिनिधित्व केवल किसी फिल्म में महिला को मुख्य भूमिका देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। किरदार को अपनी सोच, गलतियों, निर्णयों और बदलाव की गुंजाइश के साथ विकसित होने का अवसर भी मिलना चाहिए। इससे कहानी में महिलाओं का अनुभव अधिक वास्तविक और व्यापक बन सकता है।

भारतीय सिनेमा में बदलाव की उम्मीद
पिंटो ने कहा कि भारत में उन्हें रचनात्मकता के और विस्तार की उम्मीद है। उन्होंने युवाओं के विचारों और बदलाव लाने की इच्छा का उल्लेख करते हुए कहा कि इन विचारों को सामने आने और विकसित होने का अवसर मिलना चाहिए। उनके मुताबिक, रचनात्मक अभिव्यक्ति को दबाने के बजाय उसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
फिल्म और टेलीविजन में महिलाओं की छवि लंबे समय तक कई बार सामाजिक अपेक्षाओं, पारिवारिक जिम्मेदारियों या नैतिक आदर्शों के तय दायरों में दिखाई जाती रही है। हाल के वर्षों में अलग-अलग तरह की महिला-केंद्रित कहानियों और जटिल पात्रों पर चर्चा बढ़ी है। हालांकि, पिंटो की टिप्पणी को पूरे उद्योग की तस्वीर नहीं, बल्कि बदलते प्रतिनिधित्व पर उनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के रूप में देखना चाहिए।
‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ से मिली वैश्विक पहचान
फ्रीडा पिंटो को 2008 की ऑस्कर-विजेता फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर से अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली थी, जिसमें उन्होंने लतिका का किरदार निभाया था। इसके बाद वह राइज ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स, इम्मॉर्टल्स और त्रिशना जैसी फिल्मों में नजर आईं। अभिनय के साथ-साथ वह निर्माण कार्य और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर भी सक्रिय रही हैं।
पिंटो 2027 के पिरेली कैलेंडर में शामिल नौ प्रमुख भारतीय महिलाओं में से एक हैं। इस कैलेंडर में अभिनेत्री अदिति राव हैदरी, संगीतकार अनुष्का शंकर, कवयित्री रूपी कौर, मॉडल लक्ष्मी मेनन और टीवी होस्ट पद्मा लक्ष्मी सहित अन्य हस्तियां भी शामिल हैं। पिंटो ने कैलेंडर के फोटोशूट के अनुभव के बारे में कहा कि उन्हें अच्छा लगा कि फोटोग्राफर ने भारत और महिलाओं को किसी पूर्वनिर्धारित छवि में बांधने की कोशिश नहीं की।

आगे ‘अनकस्टम्ड अर्थ’ में आएंगी नजर
पिंटो की आगामी परियोजनाओं में अनकस्टम्ड अर्थ नाम की आठ कड़ियों वाली सीरीज शामिल है, जो झुम्पा लाहिड़ी के 2008 के कहानी-संग्रह से प्रेरित है। इसमें सिद्धार्थ भी नजर आएंगे और रिपोर्ट के अनुसार यह सीरीज 17 दिसंबर को नेटफ्लिक्स पर प्रीमियर होने वाली है।
महिला किरदारों में विविधता क्यों मायने रखती है?
फिल्मों और धारावाहिकों में अलग-अलग अनुभवों वाली महिलाओं को जगह मिलना दर्शकों को समाज और रिश्तों की अधिक व्यापक तस्वीर दिखा सकता है। किसी किरदार का अपूर्ण होना उसे कमजोर नहीं बनाता; कई बार यही पहलू उसके संघर्ष, विकास और फैसलों को अधिक विश्वसनीय बनाते हैं। साथ ही, वास्तविक विविधता के लिए जरूरी है कि महिलाओं को केवल रूढ़ छवियों के उलट दिखाने के लिए नहीं, बल्कि उनकी पूरी मानवीय जटिलता के साथ लिखा जाए।
फ्रीडा पिंटो की टिप्पणी इसी बदलाव की अहमियत पर ध्यान दिलाती है: ऐसी कहानियां, जिनमें महिलाओं को केवल आदर्श या प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि अपने अनुभवों, विरोधाभासों और स्वतंत्र फैसलों वाली इंसान के रूप में देखा जाए।
