23 अक्टूबर 1778 को जन्मीं कित्तूर की रानी चेन्नम्मा भारतीय इतिहास की उन साहसी शासकाओं में गिनी जाती हैं, जिन्होंने अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी की विस्तारवादी नीतियों के सामने झुकने के बजाय सशस्त्र प्रतिरोध का रास्ता चुना। कर्नाटक की इस वीरांगना का संघर्ष 1857 के विद्रोह से कई दशक पहले हुआ था और वह आज भी साहस, स्वाभिमान तथा मातृभूमि की रक्षा का प्रतीक हैं।
काकती से कित्तूर की रानी बनने तक
रानी चेन्नम्मा का जन्म तत्कालीन दक्षिण भारत के काकती गांव में हुआ था, जो आज कर्नाटक के बेलगावी जिले में स्थित है। बचपन से ही उनमें घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और धनुर्विद्या जैसे कौशल सीखने की रुचि बताई जाती है। उनका विवाह कित्तूर के शासक राजा मल्लसर्जा से हुआ और वे कित्तूर राज्य की रानी बनीं। पति और पुत्र के निधन के बाद राज्य के उत्तराधिकार का प्रश्न गंभीर हो गया।
अंग्रेज़ी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष
1824 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कित्तूर के उत्तराधिकार के मामले में हस्तक्षेप किया और रानी द्वारा उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार किए गए शिवलिंगप्पा को मान्यता देने से इनकार कर दिया। कंपनी की इस कार्रवाई को रानी ने अपने राज्य के अधिकारों और स्वायत्तता पर हमला माना। उन्होंने राज्य को कंपनी के अधीन करने के प्रयास का विरोध किया और अपने सैनिकों को संघर्ष के लिए तैयार किया।
अक्टूबर 1824 में अंग्रेज़ अधिकारियों और कित्तूर की सेना के बीच लड़ाई हुई। इस संघर्ष के पहले चरण में कित्तूर की सेना ने प्रभावी प्रतिरोध किया और ब्रिटिश अधिकारी सेंट जॉन ठाकरे मारे गए। हालांकि, कंपनी ने बाद में अधिक सैन्य बल के साथ फिर हमला किया। दिसंबर 1824 में कित्तूर का किला अंग्रेज़ों के कब्ज़े में चला गया और रानी चेन्नम्मा को बंदी बना लिया गया। उन्होंने 1829 में बैलहोंगल में कैद के दौरान अंतिम सांस ली।

लक्ष्मीबाई से पहले का प्रतिरोध
रानी चेन्नम्मा की कहानी अक्सर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के साहस के साथ याद की जाती है। दोनों ने अपने-अपने समय में अंग्रेज़ी सत्ता की दखलंदाज़ी का विरोध किया। लेकिन चेन्नम्मा का सशस्त्र संघर्ष 1824 में हुआ था—1857 के व्यापक विद्रोह से लगभग तीन दशक पहले। इसलिए उनका जीवन भारत में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध शुरुआती संगठित प्रतिरोधों को समझने के लिए विशेष महत्व रखता है।
इतिहास में उन्हें केवल युद्धभूमि की वीरांगना के रूप में नहीं, बल्कि अपने राज्य के अधिकारों की रक्षा करने वाली दृढ़ राजनीतिक नेतृत्वकर्ता के रूप में भी देखा जाता है। उनके साथ संगोली रायन्ना और गुरुसिद्धप्पा जैसे सहयोगियों का नाम भी कित्तूर के प्रतिरोध की स्मृति में लिया जाता है।
आज भी जीवित है उनकी विरासत
कर्नाटक में रानी चेन्नम्मा की स्मृति लोकगीतों, जनपरंपराओं और सार्वजनिक आयोजनों में जीवित है। कित्तूर उत्सव के दौरान उनके संघर्ष और साहस को याद किया जाता है। नई दिल्ली के संसद परिसर में भी उनकी प्रतिमा स्थापित है, जो राष्ट्रीय स्तर पर उनके योगदान की पहचान है।
रानी चेन्नम्मा जयंती हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता और स्वाभिमान की भावना किसी एक दौर या एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी। उनका जीवन बताता है कि सत्ता और सैन्य शक्ति में असमानता होने पर भी अन्यायपूर्ण हस्तक्षेप के सामने प्रतिरोध की आवाज़ उठाई जा सकती है।

जयंती पर संदेश
23 अक्टूबर को वीरांगना कित्तूर रानी चेन्नम्मा को याद करना भारत के उन आरंभिक स्वतंत्रता-संघर्षों को सम्मान देना है, जिन्होंने आगे आने वाली पीढ़ियों को साहस और संघर्ष की प्रेरणा दी। उनकी विरासत इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं, बल्कि अधिकार, आत्मसम्मान और दृढ़ संकल्प के मूल्यों में आज भी प्रासंगिक है।
