कैमरा खराब होने पर SHO को GD में दर्ज करना होगा सही समय; पूछताछ या गिरफ्तारी के लिए लाए हर व्यक्ति की एंट्री जरूरी, 24 घंटे की अवैध हिरासत पर ₹10 हजार मुआवजा
प्रयागराज: Allahabad HC CCTV Rules: पुलिस थाने में लगे CCTV कैमरे अब सिर्फ लगे हुए दिखना काफी नहीं होगा, उन्हें लगातार काम करना भी जरूरी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि थानों में लगे CCTV सिस्टम 24 घंटे और साल के 365 दिन चालू रहने चाहिए।
अगर तकनीकी खराबी के कारण निगरानी व्यवस्था बंद होती है, तो उस दौरान पुलिस को हर गतिविधि का रिकॉर्ड रखना होगा। थाना प्रभारी (SHO) को CCTV बंद होने का सटीक समय जनरल डायरी (GD) में दर्ज करना होगा और यह भी बताना होगा कि इसकी सूचना लिखित रूप से किस अधिकारी को दी गई। साथ ही जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) को इसकी जानकारी देनी होगी।
कोर्ट ने ये निर्देश राघवेंद्र दुबे और एक अन्य बनाम उत्तर प्रदेश सरकार व अन्य मामले में 23 सितंबर 2026 को दिए। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने राघवेंद्र दुबे की गिरफ्तारी को रद्द करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया और 24 घंटे की अवैध हिरासत के लिए 10 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया।
CCTV बंद हुआ तो थाने में हर व्यक्ति का रिकॉर्ड रखना होगा
हाई कोर्ट ने साफ किया कि CCTV सिस्टम के काम नहीं करने की स्थिति में पुलिस यह नहीं कह सकती कि कैमरा बंद था, इसलिए रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
ऐसे समय में अगर किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए थाने लाया जाता है या गिरफ्तार किया जाता है, तो उसका विवरण तुरंत GD में दर्ज करना होगा। इसमें उसके थाने में आने का समय और जाने का समय दर्ज करना होगा। पूछताछ की स्थिति में पूछताछ से जुड़ा विवरण भी रिकॉर्ड करना होगा।
अगर पूछताछ के बाद व्यक्ति को छोड़ दिया जाता है, तो उसकी रिहाई का समय भी GD में दर्ज करना होगा। साथ ही संबंधित व्यक्ति या उसके परिजन से हस्ताक्षरित रसीद लेने का निर्देश दिया गया है, जिसमें यह दर्ज हो कि उसे कब और किसके साथ छोड़ा गया।
खराबी की जानकारी छिपाई तो भी सवाल उठेंगे
कोर्ट ने CCTV खराब होने की स्थिति के लिए जिम्मेदारी भी तय की है। SHO को GD में CCTV बंद होने का समय लिखने के साथ उस अधिकारी की पहचान दर्ज करनी होगी, जिसे इसकी जानकारी लिखित रूप से दी गई।
इसके बाद जिले के SP की जिम्मेदारी होगी कि CCTV की खराबी को जल्द से जल्द ठीक कराया जाए और इसे ठीक कराने के लिए उठाए गए कदमों का रिकॉर्ड भी रखा जाए। यानी कैमरा बंद होने की स्थिति भी अब अपने आप में एक दर्ज घटना होगी।
एक केस में CCTV ने खोल दी पुलिस रिकॉर्ड की गड़बड़ी
कोर्ट के सामने आया मामला चित्रकूट के सरधुवा थाने से जुड़ा था। राघवेंद्र दुबे का आरोप था कि उन्हें एक रेत खनन समझौते से जुड़े विवाद में आसनसोल से उठाकर चित्रकूट लाया गया और अवैध रूप से हिरासत में रखा गया।
राज्य की ओर से दलील दी गई कि FIR दर्ज होने के बाद उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हुआ था और उन्हें उसी आधार पर हिरासत में लिया गया।
मामले में 13 जुलाई 2026 की CCTV फुटेज कोर्ट के सामने रखी गई। थाने में कुल पांच कैमरों में से केवल दो कैमरों की फुटेज उपलब्ध थी। इनमें एक कैमरा थाने के प्रवेश और बाहर निकलने की जगह पर था, जबकि दूसरा लॉकअप की ओर था। अंदर लगे तीन कैमरों की फुटेज उपलब्ध नहीं थी।
उपलब्ध फुटेज के मुताबिक राघवेंद्र दुबे सुबह 9 बजे थाने पहुंचे। इसके बाद वे 10:19 बजे जांच अधिकारी के साथ थाने से बाहर निकले। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक वे रात 8:24 बजे दोबारा थाने पहुंचे।
लेकिन गिरफ्तारी मेमो में उनकी गिरफ्तारी का समय दोपहर 3:30 बजे दर्ज था, जबकि जनरल डायरी में उन्हें शाम 6:41 बजे लॉकअप में दाखिल दिखाया गया। कोर्ट ने इन समयों और उपलब्ध CCTV फुटेज के बीच गंभीर अंतर पाया।
तीन कैमरों की फुटेज क्यों नहीं मिली, कोर्ट ने उठाया सवाल
थाने के तत्कालीन SHO की ओर से बताया गया कि तीन कैमरों की फुटेज कंप्यूटर ऑपरेटर ने DVR में सेव नहीं की थी। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि DVR में कैमरों की फुटेज अपने आप सेव होने के लिए सिस्टम प्रोग्राम किया गया था। ऐसे में तीन कैमरों की फुटेज का न मिलना कई संभावनाएं पैदा करता है—कैमरे ने काम नहीं किया हो, फुटेज जानबूझकर बंद की गई हो या रिकॉर्ड होने के बाद उसे हटाया गया हो।
कोर्ट ने इस मामले में पाया कि तीन अंदरूनी कैमरों की फुटेज उपलब्ध न होना गंभीर सवाल खड़े करता है और कहा कि पुलिस थानों में CCTV से छेड़छाड़ या उसे प्रभावित करने के मामले चिंता का विषय हैं।
गिरफ्तारी भी रद्द, 24 घंटे की हिरासत पर ₹10 हजार
कोर्ट ने केवल CCTV व्यवस्था पर निर्देश देकर मामला खत्म नहीं किया। उसने गिरफ्तारी की प्रक्रिया में भी गंभीर खामियां पाईं।
अदालत के मुताबिक गिरफ्तारी मेमो में स्वतंत्र गवाह नहीं था और उसे पुलिसकर्मियों ने ही प्रमाणित किया था। कोर्ट ने गिरफ्तारी के आधार को भी पर्याप्त नहीं माना और कहा कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत याचिकाकर्ता के अधिकारों का उल्लंघन करती है। इसके बाद गिरफ्तारी रद्द कर रिहाई का आदेश दिया गया।
कोर्ट ने 24 घंटे की अवैध हिरासत के लिए ₹10,000 मुआवजा देने का निर्देश दिया। आदेश में कहा गया कि जांच के बाद जिस व्यक्ति की जिम्मेदारी तय होगी, उससे यह राशि वसूली जा सकती है।
CCTV सिर्फ कैमरा नहीं, जवाबदेही का रिकॉर्ड
इस फैसले का बड़ा संदेश यह है कि पुलिस थाने में CCTV का मकसद केवल निगरानी रखना नहीं, बल्कि हिरासत और पूछताछ जैसी संवेदनशील परिस्थितियों में जवाबदेही का रिकॉर्ड तैयार करना भी है।
इसलिए अगर कैमरा काम कर रहा है तो उसे लगातार चालू रखना होगा और अगर किसी वजह से बंद हो जाता है तो उस दौरान होने वाली हर महत्वपूर्ण कार्रवाई का लिखित रिकॉर्ड तैयार करना होगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि CCTV बंद रहने के दौरान तय सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया और बाद में अवैध हिरासत का आरोप लगाया गया, तो ऐसे मामलों में अदालत उपलब्ध कानून के तहत पुलिस के खिलाफ प्रतिकूल अनुमान पर विचार कर सकती है।
यानी अब सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि “थाने में CCTV लगा है या नहीं?” सवाल यह भी होगा कि “जब कोई व्यक्ति थाने में था, उस समय कैमरा चल रहा था या नहीं—और अगर नहीं चल रहा था तो उसका रिकॉर्ड कहां है?”