तीन दिन चलने वाले इस पर्व में पहले नहाय-खाय, फिर निर्जला उपवास और अंत में पारण होता है; जानिए 2026 में कब क्या होगा, जितिया की शुरुआत कैसे हुई और इसके पीछे कौन-कौन सी कथाएं हैं
Jitiya 2026: बिहार में त्योहार सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं होते। उनके साथ जुड़ी होती हैं पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं, घर की मान्यताएं, लोकगीत और ऐसी कहानियां जिन्हें दादी-नानी ने सुनाया और अगली पीढ़ी तक पहुंचाया। जितिया या जिउतिया, जिसे धार्मिक रूप से जीवित्पुत्रिका व्रत कहा जाता है, ऐसा ही पर्व है।
यह मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के लिए किया जाने वाला कठिन निर्जला व्रत है। बिहार के अलावा झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के मिथिला क्षेत्र में भी इसकी गहरी परंपरा है।
लेकिन जितिया को सिर्फ ‘मां का व्रत’ कह देना इसकी पूरी कहानी नहीं बताता। इसके पीछे राजा जीमूतवाहन के त्याग की पौराणिक कथा, चील और सियारिन की लोककथा और अलग-अलग इलाकों में चली आ रही स्थानीय परंपराएं जुड़ी हैं। यही वजह है कि बिहार के गांवों और शहरों में जितिया का रूप जगह-जगह थोड़ा अलग दिखाई देता है।
सबसे पहले समझिए, जितिया होता क्या है?
जितिया का संस्कृत नाम जीवित्पुत्रिका है। इसका संबंध संतान के जीवित, स्वस्थ और दीर्घायु रहने की कामना से जोड़ा जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को इसका मुख्य निर्जला व्रत रखा जाता है। व्रती महिलाएं दिन-रात अन्न और जल का त्याग करती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा तथा व्रत कथा सुनती हैं।
इस पर्व का पूरा अनुष्ठान एक ही दिन में खत्म नहीं होता। आम तौर पर इसकी शुरुआत सप्तमी के नहाय-खाय से होती है, अष्टमी को मुख्य निर्जला व्रत रखा जाता है और नवमी के दिन पारण के साथ अनुष्ठान पूरा होता है।
जितिया नाम कैसे पड़ा?
जीवित्पुत्रिका का अर्थ है—जीवित पुत्र से जुड़ा व्रत। लोकभाषा में यही नाम बदलते-बदलते जितिया या जिउतिया के रूप में प्रचलित हुआ।
धार्मिक परंपरा में इसे जीमूतवाहन व्रत भी कहा जाता है। व्रत-कथा में जीमूतवाहन को दया, त्याग और परोपकार का प्रतीक माना गया है। आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रदोष-व्यापिनी अष्टमी को उनके पूजन की परंपरा बताई गई है।
जितिया की शुरुआत कहां से हुई?
इस सवाल का जवाब दो स्तरों पर समझना जरूरी है।
ऐतिहासिक रूप से यह कहना मुश्किल है कि जितिया पर्व की शुरुआत किसी एक साल या किसी एक व्यक्ति ने की थी। यह लंबे समय में धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय लोकपरंपराओं के मेल से विकसित हुआ पर्व है। इसके पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं।
धार्मिक परंपरा में इसकी सबसे प्रमुख कथा राजा जीमूतवाहन से जुड़ी है। व्रत-कथा परंपरा में भविष्यपुराण और स्कंदपुराण से संबंधित प्रसंगों का उल्लेख मिलता है।
एक प्रचलित संस्कृत पाठ में आश्विन कृष्ण अष्टमी और जीमूतवाहन की पूजा का संबंध इस तरह बताया गया है—
इषे मास्यसिते पक्षे अष्टमी या तिथिर्भवेत्।
पुत्रसौभाग्यदा स्त्रीणां ख्याता सा जीवपुत्रिका॥
सरल अर्थ है—आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित्पुत्रिका कहा गया है और इसे स्त्रियों के लिए संतान के सौभाग्य से जुड़ा माना गया है।इसी परंपरा में आगे जीमूतवाहन की पूजा का विधान बताया जाता है और प्रदोषकाल में उनकी पूजा की बात आती है।
दूसरी ओर, बिहार के घर-घर में सुनाई जाने वाली चील्हो-सियारो यानी चील और सियारिन की कथा इस पर्व को लोकजीवन से जोड़ती है।
यानी जितिया की जड़ को केवल एक कहानी में खोजने के बजाय इसे पौराणिक कथा + लोककथा + क्षेत्रीय परंपरा के रूप में समझना ज्यादा सही है।
अब आईए जानते है कौन थे जीमूतवाहन?
कथा के अनुसार जीमूतवाहन एक गंधर्व राजकुमार थे। वे राजघराने में पैदा हुए, लेकिन उनका मन सिर्फ राज-पाट में नहीं था। उन्हें दया और परोपकार का भाव प्रिय था।
एक दिन वन में उन्हें एक नाग स्त्री रोती हुई मिली। पूछने पर उसने बताया कि उसका इकलौता बेटा शंखचूड़ उस दिन गरुड़ के आहार के लिए जाने वाला है।
नागों और गरुड़ के बीच ऐसी व्यवस्था की कथा मिलती है, जिसमें प्रतिदिन एक नाग को गरुड़ के सामने भेजा जाता था।
मां अपने बेटे को खोने के डर से रो रही थी।
तभी जीमूतवाहन ने ऐसा फैसला लिया, जो पूरी कथा का सबसे बड़ा संदेश बन गया।
उन्होंने कहा—शंखचूड़ की जगह मैं जाऊंगा।
वे लाल वस्त्र में खुद को ढककर उस स्थान पर लेट गए, जहां गरुड़ आने वाले थे। गरुड़ उन्हें उठाकर ले गए। बाद में जब उन्हें पता चला कि वह नागपुत्र नहीं, बल्कि जीमूतवाहन हैं और उन्होंने दूसरे की संतान को बचाने के लिए अपना जीवन दांव पर लगाया है, तो वे उनके त्याग से प्रभावित हुए।
कथा के अनुसार गरुड़ ने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और नागों को भी अभय दिया। इस तरह एक व्यक्ति के त्याग से पूरे नागकुल की रक्षा हुई।
इस कथा का सबसे बड़ा संदेश क्या है?
संतान से प्रेम सिर्फ अपने बच्चे तक सीमित नहीं होना चाहिए।
जीमूतवाहन की कथा यह भाव सामने रखती है कि दूसरे के बच्चे की जान बचाना भी उतना ही बड़ा धर्म है।
यही वजह है कि जितिया की कथा में त्याग सिर्फ एक बलिदान नहीं है। यह दूसरे के जीवन की रक्षा, करुणा और निस्वार्थ मदद का संदेश देता है।
चील और सियारिन की कहानी भी क्यों सुनाई जाती है?
जीमूतवाहन की कथा के अलावा बिहार और आसपास के क्षेत्रों में चील्हो-सियारो, यानी चील और सियारिन की लोककथा भी जितिया से जुड़ी है।
लोककथा के अनुसार एक चील और सियारिन ने जितिया का व्रत रखने का संकल्प लिया। चील ने नियम का पालन किया, लेकिन सियारिन भूख से परेशान होकर व्रत तोड़ देती है।
कथा आगे जन्म-जन्मांतर से जुड़ती है। इसमें बताया जाता है कि दोनों को अगले जन्म में अलग-अलग परिस्थितियां मिलती हैं। चील को व्रत के पुण्य का फल मिलता है, जबकि सियारिन को अपनी गलती का परिणाम भुगतना पड़ता है।
इस लोककथा का संदेश सीधा है—व्रत केवल भूखा रहने का नाम नहीं, बल्कि संकल्प और नियम निभाने की परंपरा है।
यही वजह है कि बिहार में जितिया के दौरान चील-सियारिन की कथा भी सुनाई जाती है।
जितिया तीन दिन का पर्व क्यों है?
जितिया की खास बात यह है कि मुख्य व्रत एक दिन का होने के बावजूद इसकी तैयारी और समापन कई चरणों में होता है।
1. नहाय-खाय
व्रत से एक दिन पहले स्नान और शुद्ध भोजन की परंपरा होती है। इसे शरीर और मन को व्रत के लिए तैयार करने का दिन माना जाता है।
2. ओठगन
कई इलाकों में मुख्य निर्जला व्रत शुरू होने से पहले सुबह-सुबह ओठगन किया जाता है। इसमें सूर्योदय से पहले भोजन करने की स्थानीय परंपरा है।
यहां भी बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों में भोजन अलग होता है। कहीं दही-चूड़ा और पारंपरिक पकवान होते हैं, तो कहीं स्थानीय खाद्य पदार्थों की परंपरा है।
3. निर्जला व्रत
अष्टमी को महिलाएं दिनभर अन्न और पानी का त्याग करती हैं। शाम को पूजा होती है। जीमूतवाहन की कथा और अन्य लोककथाएं सुनी जाती हैं।
4. पारण
अगले दिन व्रत खोला जाता है। इसे पारण कहा जाता है। पारण का सही समय स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार देखा जाता है।
जितिया में क्या पूजा जाता है?
जितिया में जीमूतवाहन की पूजा की परंपरा है। कई जगह कुशा से उनका प्रतीक बनाया जाता है। पूजा में जल, अक्षत, रोली, सिंदूर, फूल, धूप, दीप, पान-सुपारी और अन्य स्थानीय सामग्री रखी जाती है।
पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केवल सामग्री नहीं, बल्कि कथा और संकल्प है।
कथा सुनते समय जीमूतवाहन का त्याग याद किया जाता है और संतान के स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन की कामना की जाती है।
‘जिउतिया’ धागे का क्या मतलब है?
जितिया पर्व की पहचान उसके जिउतिया धागे से भी होती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे पहनने और पूजा में रखने की विधि अलग हो सकती है।
लोकविश्वास में यह धागा संतान की रक्षा और लंबी उम्र की कामना से जुड़ा है। इसलिए इसे सिर्फ एक धागा नहीं, बल्कि मां के संकल्प का प्रतीक माना जाता है।
जितिया पितृपक्ष में ही क्यों मनाया जाता है?
जितिया आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पड़ता है। यही समय पितृपक्ष का भी होता है। इसलिए जितिया पितृपक्ष के बीच आने वाला महत्वपूर्ण व्रत है।
पितृपक्ष को हिंदू परंपरा में अपने पूर्वजों को याद करने, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और तर्पण-श्राद्ध करने का समय माना जाता है।
इसी दौरान जितिया में माताएं जीवित संतान के लिए मंगल और दीर्घायु की कामना करती हैं।
यानी एक ही समय में परंपरा जीवन के दोनों पक्षों को याद करती है—
पितृपक्ष में दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और जितिया में जीवित संतान के लिए मंगल की कामना।
2026 में कब है जितिया? तारीखों का पूरा हिसाब
इस बार जितिया को लेकर बिहार में तारीख का थोड़ा भ्रम भी सामने आया है। पंचांग गणना के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी 3 अक्टूबर 2026 की सुबह 7:59 बजे शुरू होकर 4 अक्टूबर की सुबह 5:51 बजे तक रहेगी। प्रदोषकाल में अष्टमी होने के कारण मुख्य निर्जला व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा।
2 अक्टूबर — नहाय-खाय
जितिया के पहले दिन यानी 2 अक्टूबर, शुक्रवार को नहाय-खाय होगा। व्रती महिलाएं स्नान करके शुद्ध भोजन ग्रहण करती हैं और अगले दिन के कठिन व्रत की तैयारी करती हैं।
बिहार के अलग-अलग इलाकों में इस दिन के भोजन में अंतर मिलता है। कहीं मड़ुआ/मरुआ, नोनी का साग, झिंगनी, कद्दू जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। मिथिला क्षेत्र में जितिया से पहले मछली और मरुआ खाने की भी विशिष्ट स्थानीय परंपरा बताई गई है।
यही बात जितिया को बिहार की क्षेत्रीय संस्कृति से जोड़ती है—एक ही पर्व, लेकिन अलग-अलग इलाकों में अलग स्वाद और रीति।
3 अक्टूबर — मुख्य निर्जला व्रत
3 अक्टूबर, शनिवार को मुख्य जितिया व्रत होगा।
कई परिवारों में सूर्योदय से पहले ओठगन की परंपरा होती है। इसमें व्रत शुरू होने से पहले भोजन किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में ओठगन का भोजन अलग हो सकता है; कहीं दही-चूड़ा या मीठा भोजन, तो कहीं स्थानीय पारंपरिक पकवान खाए जाते हैं।
इसके बाद निर्जला व्रत शुरू होता है। व्रती महिलाएं अन्न और जल ग्रहण नहीं करतीं। शाम को जीमूतवाहन की पूजा और व्रत कथा सुनने की परंपरा है।
4 अक्टूबर — पारण
4 अक्टूबर, रविवार को व्रत का पारण होगा। अलग-अलग पंचांगों और स्थानीय परंपराओं में पारण के समय में कुछ अंतर मिल सकता है। कई 2026 गणनाओं में सुबह 7:28 बजे के बाद पारण का समय बताया गया है, जबकि कुछ स्थानीय स्रोत लगभग 7:30 बजे का उल्लेख करते हैं। इसलिए परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना उचित होगा।
बिहार में जितिया सिर्फ व्रत नहीं, लोक-संस्कृति भी है
जितिया की सबसे खास बात यह है कि इसका धार्मिक पक्ष जितना मजबूत है, उतना ही मजबूत इसका लोक पक्ष भी है।
महिलाएं एक साथ बैठकर कथा सुनती हैं, लोकगीत गाती हैं और नई पीढ़ी को व्रत की कहानी बताती हैं।
एक तरफ जीमूतवाहन का त्याग है। दूसरी तरफ चील-सियारिन की लोककथा है। और इनके बीच है एक मां का निर्जला व्रत।
यही जितिया की पहचान है।
यह पर्व सिर्फ संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला व्रत नहीं है। यह मां की ममता, त्याग, नियम और परिवार की पीढ़ियों को जोड़ने वाली लोकपरंपरा भी है।
जीमूतवाहन की कथा यह सिखाती है कि दूसरे के बच्चे की रक्षा करना भी मानवता और करुणा का बड़ा उदाहरण है। चील-सियारिन की कथा बताती है कि संकल्प लिया है तो उसे नियम के साथ निभाना भी जरूरी है।
और पितृपक्ष के बीच आने वाला यह पर्व एक ही समय में पूर्वजों की स्मृति और आने वाली पीढ़ी की मंगलकामना को परिवार की परंपरा से जोड़ देता है।
यही वजह है कि बिहार में जितिया आज भी सिर्फ एक व्रत नहीं, बल्कि ममता, स्मृति, त्याग और पीढ़ियों से चली आ रही लोकसंस्कृति का पर्व बना हुआ है।
नोट: जितिया की पूजा-विधि, ओठगन, भोजन, धागा धारण और पारण की रीति बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती है। 2026 की मुख्य व्रत-तिथि के लिए अष्टमी और प्रदोष-व्यापिनी गणना को आधार माना गया है; बिहार सरकार के अवकाश कैलेंडर में 4 अक्टूबर की प्रविष्टि है, इसलिए स्थानीय पंचांग/परंपरा से समय मिलाना उपयोगी है।