जिउतिया पर्व पर मरूआ की रोटी बनाने की परंपरा आज भी है कायम
Nalanda news। कभी ग्रामीण परिवारों के खान-पान का अहम हिस्सा रहा मरूआ अब बाजार में छोटे-छोटे पैकेट में बिकता नजर आ रहा है। जिस मरूआ की कभी किलो, पसेरी और मन के हिसाब से खरीद-बिक्री होती थी, वही अब जरूरत के अनुसार 10 से 20 ग्राम की पुड़िया में बाजार पहुंच रहा है।
बिहार शरीफ शहर के लगभग तमाम किराना दुकानों में पीसा हुआ और दाना वाला मरूआ छोटी-छोटी पुड़िया में बिक्री के लिए रखा गया है। दुकानदार ने बताया कि जिउतिया पर्व को लेकर इसकी मांग बढ़ी है।
पांच रुपये की पुड़िया भी उपलब्ध है। दुकानदार के अनुसार उसने करीब 120 रुपये किलो की दर से मरूआ खरीदा है।
बुजुर्ग बताते हैं कि पहले गांवों में मरूआ की खेती बड़े पैमाने पर होती थी। घरों में इसका भंडारण किया जाता था और इससे रोटी, ठेकुआ, लड्डू सहित कई पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते थे।
खासकर जिउतिया पर्व पर मरूआ की रोटी बनाने की परंपरा आज भी कई परिवारों में कायम है। जितिया के आसपास मरुआ की रोटी और इससे जुड़ी पारंपरिक खाद्य परंपरा के उल्लेख अन्य रिपोर्टों में भी मिलते हैं।
समय के साथ गेहूं और चावल जैसे खाद्यान्नों की बढ़ती उपलब्धता तथा बदलती खान-पान की आदतों से मरूआ की खेती और घरेलू उपयोग में कमी आई। किसान भी अधिक मांग और बेहतर बाजार वाली फसलों की ओर बढ़े हैं।
हालांकि स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण मोटे अनाजों की मांग फिर बढ़ रही है। जिउतिया के मौके पर बाजार में पुड़िया में बिकता मरूआ पुरानी परंपरा और बदलते बाजार, दोनों की तस्वीर पेश कर रहा है।
मरुआ के आटे के फायदे
• कैल्शियम से भरपूर: हड्डियां मजबूत करता है।
• आयरन और प्रोटीन: खून (हीमोग्लोबिन) बढ़ाता है।
• वजन नियंत्रण: फैट और वजन घटाने में मददगार है।
• पाचन शक्ति: पेट के लिए हल्का और फायदेमंद है।
• शुगर कंट्रोल: डायबिटीज के मरीजों के लिए अच्छा है।
• परंपरा के अनुसार, खासतौर पर बिहार और मिथिलांचल में जितिया व्रत शुरू होने से एक दिन पहले या नहाय-खाए के दिन मरुआ की रोटी और मछली खाने की पुरानी परंपरा है।
• स्वास्थ्य और ऊर्जा: मरुआ एक पौष्टिक मोटा अनाज (मई मिलेट) है। यह अत्यधिक ऊर्जावान और पचने में आसान होता है, जो निर्जला (बिना पानी के) या कठोर उपवास से पहले शरीर को मजबूती और ताकत देता है।
• मौसमी फसल: जानकारों के अनुसार, यह फसल के पकने का मौसम होता है, इसलिए स्थानीय संस्कृति में इसे मौसमी और सात्विक-पौष्टिक आहार के रूप में व्रत से पहले शामिल किया जाता है।