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Home - देश - NSE-SEBI Co-location विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, ₹1,491 करोड़ के सेटलमेंट से करीब एक दशक पुराना विवाद खत्म

NSE-SEBI Co-location विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, ₹1,491 करोड़ के सेटलमेंट से करीब एक दशक पुराना विवाद खत्म

आभा शुक्ला
Last updated: सितम्बर 19, 2026 1:51 पूर्वाह्न
By : आभा शुक्ला
Published on : 2 महीना पहले
NSE SEBI co-location settlement Supreme Court 2026
NSE SEBI co-location settlement Supreme Court 2026
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Co-location और डार्क फाइबर मामलों में लंबित कार्यवाही का निपटारा; NSE ने SEBI को चुकाए ₹1,491.21 करोड़, IPO के बीच एक्सचेंज को बड़ी कानूनी राहत

नई दिल्ली। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NSE) से जुड़े करीब एक दशक पुराने को-लोकेशन और डार्क फाइबर विवाद में शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 को बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया।

सुप्रीम कोर्ट ने NSE और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के बीच हुए सेटलमेंट को मंजूरी देते हुए संबंधित लंबित कार्यवाही का निपटारा कर दिया। यह मामला लंबे समय से NSE की सार्वजनिक लिस्टिंग की राह में प्रमुख नियामकीय मुद्दों में शामिल रहा था।

अब ₹1,491.21 करोड़ के सेटलमेंट और अदालत में कार्यवाही के निपटारे के बाद इस विवाद से जुड़ी बड़ी कानूनी अनिश्चितता दूर हो गई है।

खास बात यह है कि यह फैसला ऐसे समय आया है जब NSE का बहुप्रतीक्षित IPO निवेशकों के लिए खुला हुआ है। IPO 17 सितंबर को खुला और 21 सितंबर को बंद होना है। यानी NSE की करीब एक दशक पुरानी लिस्टिंग प्रक्रिया के अंतिम चरण के बीच ही इस पुराने नियामकीय विवाद का प्रमुख अध्याय बंद हुआ है।

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क्या था पूरा को-लोकेशन विवाद?

इस विवाद की जड़ NSE के को-लोकेशन सिस्टम में थी। सामान्य तौर पर को-लोकेशन की सुविधा में ट्रेडिंग सदस्य अपने सर्वर एक्सचेंज के डेटा सेंटर में या उसके बेहद करीब रख सकते हैं। इसका मकसद एक्सचेंज के ट्रेडिंग सिस्टम और मार्केट डेटा तक तेज कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना होता है।

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शेयर बाजार में ट्रेडिंग की गति बेहद महत्वपूर्ण होती है। खासकर एल्गोरिदमिक और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग में ऑर्डर और मार्केट डेटा कुछ माइक्रोसेकंड या मिलीसेकंड पहले मिलने से भी फर्क पड़ सकता है।

इसी वजह से SEBI की जांच में यह सवाल उठा कि क्या NSE के को-लोकेशन सिस्टम में कुछ ट्रेडिंग सदस्यों को दूसरे बाजार प्रतिभागियों की तुलना में तेज या प्राथमिक पहुंच मिली थी।

जांच का एक अहम हिस्सा NSE के Tick-by-Tick (TBT) डेटा फीड और उसे उपलब्ध कराने की व्यवस्था से जुड़ा था। आरोपों की जांच इस बात को लेकर भी हुई कि क्या कुछ सदस्यों को ऐसी कनेक्टिविटी मिली, जिससे उन्हें कारोबार में अनुचित फायदा मिल सकता था।

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डार्क फाइबर क्या था और विवाद कैसे जुड़ा?

मामले का दूसरा प्रमुख हिस्सा डार्क फाइबर था। यह समर्पित फाइबर-ऑप्टिक कनेक्टिविटी से जुड़ा मामला था। ट्रेडिंग कंपनियां ऐसी कनेक्टिविटी के जरिये एक्सचेंज तक तेज और सीधा नेटवर्क लिंक हासिल कर सकती हैं।

SEBI की जांच में यह सवाल उठा कि क्या कुछ ट्रेडिंग सदस्यों को NSE के नेटवर्क से ऐसी कनेक्टिविटी मिली, जिससे उन्हें अन्य सदस्यों की तुलना में तेज पहुंच हासिल हो सकती थी।

इस तरह को-लोकेशन और डार्क फाइबर दोनों मामलों में मूल नियामकीय चिंता बाजार के सभी प्रतिभागियों के लिए समान और निष्पक्ष पहुंच से जुड़ी थी।

2019 में SEBI ने दिया था अहम आदेश

लंबी जांच के बाद SEBI ने 2019 में NSE के खिलाफ को-लोकेशन मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। 30 अप्रैल 2019 के आदेश में SEBI ने NSE को ₹624.89 करोड़ की disgorgement राशि जमा करने का निर्देश दिया था। इस रकम पर 1 अप्रैल 2014 से वास्तविक भुगतान तक 12 प्रतिशत सालाना ब्याज का भी प्रावधान था।

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Disgorgement का मतलब broadly ऐसी रकम वापस लेने से है, जिसे नियामक उल्लंघन से जुड़े अनुचित लाभ के रूप में देखता है।

NSE ने SEBI के आदेश को Securities Appellate Tribunal (SAT) में चुनौती दी। जनवरी 2023 में SAT ने SEBI के disgorgement निर्देश को अलग कर दिया। हालांकि NSE को Investor Protection से जुड़े प्रावधान के तहत ₹100 करोड़ जमा करने का निर्देश दिया गया। इसके बाद SEBI ने SAT के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?

SAT के फैसले के बाद को-लोकेशन और डार्क फाइबर से जुड़े अलग-अलग कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचे। वर्षों तक चलती रही इस प्रक्रिया के दौरान NSE की सार्वजनिक लिस्टिंग भी आगे नहीं बढ़ सकी।

NSE ने 20 जून 2025 को SEBI के Settlement Regulations के तहत इन मामलों को निपटाने के लिए दो अलग-अलग settlement applications दाखिल की थीं। शुरुआती प्रस्ताव की कुल रकम ₹1,387.39 करोड़ थी। इसके बाद 13 मार्च 2026 को NSE ने संशोधित settlement terms दाखिल कीं और कुल प्रस्तावित रकम बढ़कर ₹1,491.21 करोड़ हो गई।

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₹1,491.21 करोड़ में कैसे हुआ सेटलमेंट?

30 जुलाई 2026 को SEBI ने NSE के revised settlement proposal को in-principle स्वीकार किया। कुल settlement राशि ₹1,491.21 करोड़ तय हुई।

इसका पूरा breakup इस तरह है:

मामलासेटलमेंट राशि
को-लोकेशन मामला₹1,223.56 करोड़
डार्क फाइबर मामला₹267.65 करोड़
कुल₹1,491.21 करोड़

NSE ने पहले ही ₹776.47 करोड़ SEBI के पास जमा कर रखे थे। इसके बाद 31 जुलाई 2026 को NSE ने अतिरिक्त ₹714.74 करोड़ का भुगतान किया। इस तरह दोनों रकम मिलाकर ₹1,491.21 करोड़ की settlement राशि पूरी हुई। इसलिए इसे जुलाई में ₹1,491 करोड़ का नया एकमुश्त भुगतान समझना सही नहीं होगा।

18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट में SEBI की ओर से दाखिल संबंधित appeals की सुनवाई जारी थी। 16 सितंबर 2026 के कोर्ट रिकॉर्ड में मामले को 18 सितंबर को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया था।

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18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने NSE-SEBI settlement को मंजूरी दी और संबंधित proceedings का निपटारा किया। इसके साथ SEBI के संबंधित enforcement actions को settlement के अनुसार बंद करने का रास्ता साफ हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक यह कार्रवाई को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों से जुड़ी नियामकीय कार्यवाहियों तक सीमित है।

यहां यह समझना जरूरी है कि इसका मतलब NSE से जुड़े हर पुराने कानूनी मामले का अंत नहीं है। उदाहरण के तौर पर, को-लोकेशन से जुड़े कुछ पूर्व अधिकारियों/अन्य पक्षों से संबंधित कार्यवाहियां अलग कानूनी प्रक्रिया में हो सकती हैं। 3 सितंबर की रिपोर्टिंग में भी NSE के पूर्व अधिकारियों से जुड़े एक अलग मामले को अलग से जारी रहने की बात सामने आई थी।

IPO के बीच क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?

सुप्रीम कोर्ट का यह घटनाक्रम NSE के IPO के दौरान आया है। NSE का IPO 17 से 21 सितंबर 2026 तक खुला है। इसका price band ₹1,700 से ₹1,785 प्रति शेयर है और यह पूरी तरह Offer for Sale (OFS) है। यानी NSE नए शेयर जारी कर पूंजी नहीं जुटा रहा, बल्कि मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर बेच रहे हैं। IPO में करीब 12.64 करोड़ शेयर ऑफर किए जा रहे हैं।

ऊपरी price band पर IPO का आकार करीब ₹22,569 करोड़ है। 18 सितंबर को दूसरे दिन ही इश्यू पूरी तरह subscribe हो गया था। Reuters के मुताबिक उसी दिन IPO के institutional हिस्से में भी मजबूत मांग दर्ज हुई और कुल इश्यू दूसरे दिन ही पूरी तरह सब्सक्राइब हो गया। NSE के शेयरों की लिस्टिंग 24 सितंबर को प्रस्तावित है।

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एक नजर में पूरा घटनाक्रम

2015 के आसपास: NSE के को-लोकेशन सिस्टम और कुछ सदस्यों को तेज डेटा/कनेक्टिविटी मिलने से जुड़े आरोपों की जांच का मामला सामने आया।

2019: SEBI ने को-लोकेशन मामले में NSE को ₹624.89 करोड़ disgorge करने और 12% सालाना ब्याज देने का आदेश दिया।

जनवरी 2023: SAT ने SEBI के disgorgement निर्देश को अलग किया और ₹100 करोड़ जमा करने का निर्देश दिया। इसके बाद SEBI ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

20 जून 2025: NSE ने को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों के settlement के लिए आवेदन दाखिल किए।

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13 मार्च 2026: NSE ने revised settlement terms दाखिल कीं; प्रस्तावित कुल रकम ₹1,491.21 करोड़ हुई।

30 जुलाई 2026: SEBI ने settlement को in-principle स्वीकार किया और कुल ₹1,491.21 करोड़ के settlement में से बाकी ₹714.74 करोड़ जमा करने को कहा।

31 जुलाई 2026: NSE ने ₹714.74 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान किया और कुल settlement राशि ₹1,491.21 करोड़ पूरी हुई।

16 सितंबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित appeals को 18 सितंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

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18 सितंबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने NSE-SEBI settlement को मंजूरी दी और संबंधित लंबित proceedings का निपटारा किया।

NSE के लिए क्या बदला?

इस settlement के बाद NSE के खिलाफ को-लोकेशन और डार्क फाइबर से जुड़ा लंबे समय से चला आ रहा प्रमुख regulatory dispute अपने settlement चरण में पहुंच गया है और संबंधित सुप्रीम कोर्ट proceedings भी समाप्त हो गई हैं। IPO के दौरान यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्षों से चल रहे इस नियामकीय विवाद का असर NSE की सार्वजनिक लिस्टिंग की प्रक्रिया पर भी रहा था।

अब NSE की नजर IPO के अंतिम चरण और 24 सितंबर की प्रस्तावित लिस्टिंग पर है। हालांकि, इस settlement को NSE से जुड़े हर कानूनी विवाद की समाप्ति के रूप में देखना सही नहीं होगा। मौजूदा सुप्रीम कोर्ट का घटनाक्रम खास तौर पर को-लोकेशन और डार्क फाइबर से जुड़े NSE-SEBI मामलों के निपटारे से संबंधित है।

इस तरह करीब एक दशक से चले आ रहे विवाद में SEBI की जांच, 2019 के नियामकीय आदेश, SAT की कार्यवाही, सुप्रीम कोर्ट में चली कानूनी प्रक्रिया और अंततः settlement—इन सभी चरणों के बाद अब ₹1,491.21 करोड़ के भुगतान के साथ NSE के लिए इस मामले का प्रमुख regulatory chapter बंद हो गया है।

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आभा शुक्ला पत्रकारिता, जनसंपर्क और कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन के क्षेत्र में 5+ वर्षों के अनुभव वाली पत्रकार एवं कम्युनिकेशन प्रोफेशनल हैं। पटना से जुड़ीं आभा को समाचार शोध, रिपोर्टिंग, कंटेंट डेवलपमेंट, मीडिया आउटरीच और जनसंपर्क अभियानों का अनुभव है। उन्होंने Zee News में ट्रेनी जर्नलिस्ट के रूप में समाचार शोध, रिपोर्टिंग और कंटेंट डेवलपमेंट का अनुभव हासिल किया। इसके बाद UNE Consultant में PR Executive के तौर पर मीडिया आउटरीच, PR कैंपेन और कॉर्पोरेट इवेंट्स पर काम किया। TCS में Associate के रूप में उन्होंने डेटा मैनेजमेंट, रिसर्च और सूचना प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालीं। आभा शुक्ला तथ्यपरक, शोध-आधारित और प्रभावी पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों को पाठकों तक पहुंचाने में रुचि रखती हैं।
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