कमरे में बंद कर पीटने, मुंह में कपड़ा ठूंसने और कैंची-बेलन से मारने के आरोप | चाचा के साथ बाल संरक्षण इकाई पहुंची बच्ची | प्रशासन की निगरानी में सुरक्षित, एफआईआर की प्रक्रिया शुरू
Jamui News:
“अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी,
आंचल में है दूध और आंखों में पानी…”
मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियां उस 10 साल की बच्ची की कहानी के सामने जैसे अचानक जीवंत हो उठती हैं, जो उम्र के उस पड़ाव पर है जहां हाथ में किताब, आंखों में सपने और दिल में स्कूल जाने की खुशी होनी चाहिए। लेकिन आनवी वर्मा की जिंदगी में इन दिनों किताबों की जगह डर है और स्कूल की जगह घर की चारदीवारी।
बच्ची का आरोप है कि उसकी सौतेली मां उसे अक्सर पीटती है, कमरे में बंद कर देती है और कई बार उसके मुंह में कपड़ा ठूंसकर मारती है। उसने शरीर के अलग-अलग हिस्सों में चोट पहुंचाने और कैंची व बेलन से मारने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए हैं। बच्ची के अनुसार, उसे पढ़ने के लिए स्कूल भी नहीं भेजा जा रहा था।
आखिरकार डर और दर्द के बीच आनवी ने घर से निकलकर अपने चाचा आनंद वर्मा से मदद मांगी। चाचा उसे लेकर बाल संरक्षण इकाई पहुंचे, जहां बच्ची ने अधिकारियों के सामने अपनी आपबीती सुनाई।
‘मुझे बचा लीजिए… मुझे पढ़ने दीजिए’
आनवी की सबसे मार्मिक गुहार यही है—“मुझे बचा लीजिए और मुझे पढ़ने दीजिए।”
एक बच्चे की यह छोटी-सी मांग अपने भीतर बहुत बड़ा सवाल छिपाए है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि स्कूल जाने, दोस्तों के साथ खेलने और सामान्य बचपन जीने की उम्र में एक बच्ची को अपने ही घर से डर लगने लगा?
बच्ची के मुताबिक, घर में उसे कथित तौर पर कमरे में बंद कर दिया जाता था। विरोध करने या रोने पर मारपीट की जाती थी। उसने पेट में चुटकी काटने, कैंची से चुभाने, बेलन से मारने और सिर दीवार से टकराने जैसे आरोप भी लगाए हैं।
इन आरोपों की पूरी सच्चाई जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी, लेकिन बच्ची के शरीर पर बताए गए चोट और पुराने जख्मों के निशानों ने मामले को गंभीर बना दिया है।
मां के जाने के बाद बदल गई जिंदगी
परिजनों के अनुसार, आनवी की मां करीब आठ वर्ष पहले पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उससे अलग हो गई थीं। इसके बाद उसके पिता रवि कुमार वर्मा ने दूसरी शादी कर ली।
बच्ची के नाना कमलेश प्रसाद वर्मा का आरोप है कि दूसरी शादी के बाद से आनवी के साथ व्यवहार बदल गया। उन्होंने बच्ची के शरीर पर पुराने चोट के निशान होने और कथित तौर पर गर्म वस्तु से जलाए जाने का भी आरोप लगाया है।
परिवार की ओर से लगाए गए इन आरोपों की भी जांच की जा रही है।
पढ़ाई छूटी तो जैसे बचपन भी छूट गया
चाचा आनंद वर्मा के मुताबिक, आनवी पहले स्कूल जाती थी। पढ़ने में उसकी रुचि थी, लेकिन धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई बंद हो गई।
उनका आरोप है कि बच्ची को घर के भीतर ही सीमित रखा जाता था। उन्होंने परिवार में इस संबंध में बात रखने की कोशिश भी की, लेकिन कथित तौर पर उन्हें यह कहकर टाल दिया गया कि “मेरी बेटी है, मैं जो करूं।”
यहीं से मामला सिर्फ पारिवारिक विवाद नहीं रह जाता। सवाल एक बच्चे की सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान का है।
बाल संरक्षण इकाई ने लिया संज्ञान
बच्ची की शिकायत के बाद मामला बाल संरक्षण तंत्र तक पहुंचा। सहायक निदेशक, बाल कल्याण समिति काजल मोदी के अनुसार, मामले का संज्ञान लिया गया है।
प्रारंभिक जांच में बच्ची के साथ पारिवारिक स्तर पर प्रताड़ना के आरोप सामने आए हैं। फिलहाल आनवी को प्रशासन की निगरानी में सुरक्षित रखा गया है और एफआईआर की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। मामले में नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।
अब सिर्फ कार्रवाई नहीं, आनवी को उसका बचपन भी चाहिए
आनवी की कहानी का सबसे कठिन हिस्सा शायद वह नहीं है जो उसने अधिकारियों को बताया। सबसे कठिन सवाल यह है कि जिस उम्र में एक बच्ची को अपने घर को सबसे सुरक्षित जगह समझना चाहिए, उसी घर से उसे सुरक्षा की गुहार क्यों लगानी पड़ी?
आनवी की कहानी में कई सवाल हैं।
क्या उसे दोबारा स्कूल भेजा जाएगा?
क्या वह बिना डर के घर लौट पाएगी?
क्या उसके आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी?
क्या अगर आरोप सही साबित होते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या आनवी को उसका बचपन वापस मिल पाएगा?
एक बच्ची ने प्रशासन से कोई बड़ी मांग नहीं की है। उसने न महंगा खिलौना मांगा, न कोई सुविधा। उसने सिर्फ दो चीजें मांगी हैं—सुरक्षा और पढ़ाई।
कानूनी कार्रवाई जरूरी है। दोष साबित होने पर जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि आनवी की पढ़ाई दोबारा शुरू हो, उसके मन से डर निकले और उसे ऐसा माहौल मिले जहां वह फिर से बच्ची की तरह जी सके।
क्योंकि किसी बच्चे को सिर्फ हिंसा से बचा लेना पर्याप्त नहीं है।
क्योंकि बचपन किसी सजा की जगह नहीं है। और किसी 10 साल की बच्ची की सबसे बड़ी पुकार—“मुझे बचा लीजिए… मुझे पढ़ने दीजिए”—हम सबके लिए एक सवाल है, जिसका जवाब सिर्फ कागज पर दर्ज एफआईआर नहीं, बल्कि आनवी की सुरक्षित और सम्मानजनक जिंदगी होनी चाहिए।
उसे उसका बचपन भी लौटाना होगा।