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सृजन घोटाला: पहली FIR कराने वाले नाजिर से दोषी करार तक, अब अमरेंद्र यादव की सरकारी नौकरी भी गई

प्रशांत कुमार
Last updated: सितम्बर 12, 2026 8:50 अपराह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 2 महीना पहले
सृजन घोटाला: अमरेंद्र कुमार यादव बर्खास्त
सृजन घोटाले में विभागीय जांच के बाद अमरेंद्र कुमार यादव की सरकारी सेवा समाप्त।
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विभागीय जांच में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप प्रमाणित, बचाव संतोषजनक नहीं मिलने पर डीएम की बड़ी कार्रवाई | 2017 में जिस नाजिर ने दर्ज कराई थी पहली FIR, जांच आगे बढ़ी तो खुद बन गए आरोपी | 2025 में विशेष सीबीआई अदालत भी सुना चुकी है चार साल की सजा

भागलपुर: सृजन घोटाला की कहानी का एक ऐसा अध्याय, जिसमें शिकायतकर्ता से आरोपी और फिर दोषी करार दिए जाने तक का सफर एक ही सरकारी कर्मचारी के नाम दर्ज है, अब एक और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है।

जिला नजारत शाखा के तत्कालीन लिपिक सह नाजिर अमरेंद्र कुमार यादव को सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। विभागीय जांच में उनके खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोप प्रमाणित पाए गए।

उनका बचाव संतोषजनक नहीं मिलने के बाद जिलाधिकारी ने बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के तहत बर्खास्तगी का आदेश जारी किया है।

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इस कार्रवाई का महत्व इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि 7 अगस्त 2017 को सृजन घोटाले के खुलासे के बाद पहली प्राथमिकी दर्ज कराने वालों में अमरेंद्र यादव ही थे। उस समय वे जिला नजारत शाखा में नाजिर के पद पर कार्यरत थे।

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बाद में सीबीआई जांच का दायरा बढ़ा तो वही अमरेंद्र यादव इस मामले में आरोपी बनाए गए। 2018 में सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार किया था।

जिस शिकायत से घोटाले की परतें खुलीं, उसी में खुद घिर गए

सृजन घोटाले की शुरुआती कहानी जिला प्रशासन की नजारत शाखा से जुड़ी है। पुराने जांच रिकॉर्ड के अनुसार, नजारत के सरकारी खाते से करोड़ों रुपये की अनियमित निकासी और उनके सृजन महिला विकास सहयोग समिति के खातों में पहुंचने का मामला सामने आया था।

शुरुआती दौर में नजारत शाखा से करीब 12.20 करोड़ रुपये की अवैध निकासी से संबंधित प्राथमिकी दर्ज हुई थी। इसी मामले में अमरेंद्र कुमार यादव परिवादी थे।

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2017 में जब मामले की जांच आगे बढ़ी तो तस्वीर बदलने लगी। जांच एजेंसियों ने सरकारी खातों से सृजन के खातों में रकम के हस्तांतरण के तरीके, बैंकिंग प्रक्रिया और फर्जी दस्तावेजों से जुड़े पहलुओं की पड़ताल शुरू की।

शुरुआती जांच में ही यह संकेत मिला था कि मामला किसी एक खाते या एक विभाग तक सीमित नहीं था।

पुराने जांच विवरणों के मुताबिक, जिला नजारत की राशि के अलावा भू-अर्जन, जिला परिषद, कल्याण, स्वास्थ्य, डूडा और अन्य सरकारी विभागों के खातों से भी सरकारी धन की अवैध निकासी की जांच हुई।

यही वजह थी कि एक स्थानीय वित्तीय अनियमितता धीरे-धीरे बिहार के सबसे चर्चित घोटालों में बदल गई।

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नजारत से शुरू हुई कहानी कितनी बड़ी थी?

सृजन मामले की जांच से जुड़ी पुरानी रिपोर्टों के अनुसार, नजारत के सरकारी खजाने से 2003 से 2017 के बीच लंबे समय तक रकम की हेराफेरी किए जाने के आरोप सामने आए। इसके बाद जांच का दायरा बढ़ता गया और कई सरकारी विभागों के खातों में गड़बड़ी सामने आई।

यानी 2017 में घोटाला सामने आने के समय जो मामला एक-दो खातों की संदिग्ध निकासी जैसा दिखाई दे रहा था, जांच आगे बढ़ने पर वह एक ऐसे नेटवर्क के रूप में सामने आया जिसमें सरकारी विभाग, बैंकिंग लेन-देन और निजी संस्था के खातों के बीच धन के हस्तांतरण की लंबी कड़ी की जांच करनी पड़ी।

सीबीआई ने बाद में इस पूरे मामले में कई एफआईआर और चार्जशीट दाखिल कीं। 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, अमरेंद्र यादव के खिलाफ भी सीबीआई की कार्रवाई आगे बढ़ी और विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के कारावास की सजा सुनाई।

विभागीय कार्रवाई भी वर्षों तक चली

अमरेंद्र यादव के खिलाफ आपराधिक जांच के समानांतर विभागीय कार्यवाही भी चलती रही। 2024 की रिपोर्टों में सामने आया था कि वह उस समय बेऊर जेल में बंद थे और विभागीय जांच में उन्हें बार-बार नोटिस भेजा जा रहा था। कई बार नोटिस की तामिला जेल प्रशासन के माध्यम से हुई, लेकिन सुनवाई में उनकी व्यक्तिगत या अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से उपस्थिति नहीं हो सकी।

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अब विभागीय जांच के निष्कर्ष के बाद प्रशासन ने इस प्रक्रिया को अंतिम परिणाम तक पहुंचा दिया है। जांच अधिकारी की रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित आरोप प्रमाणित पाए गए। अमरेंद्र यादव की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण और बचाव को सक्षम प्राधिकारी ने स्वीकार योग्य नहीं माना।

इसके बाद जिलाधिकारी ने सरकारी सेवा से बर्खास्तगी का आदेश जारी किया।

बर्खास्तगी का असर सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं

यह सामान्य निलंबन या विभागीय दंड नहीं है। बर्खास्तगी के साथ ही अमरेंद्र यादव के लिए भविष्य में सरकार के अधीन किसी भी नियोजन का रास्ता भी बंद हो गया है।

यानी विभागीय कार्रवाई का परिणाम केवल वर्तमान सरकारी सेवा समाप्त होने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य की सरकारी नियुक्ति पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा।

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सृजन घोटाले की कहानी में यह कार्रवाई क्या बताती है?

सृजन घोटाला सिर्फ सरकारी राशि की कथित अवैध निकासी का मामला नहीं था। इसकी सबसे गंभीर परत यह थी कि सरकारी धन की निगरानी और बैंकिंग व्यवस्था के बीच मौजूद नियंत्रण तंत्र पर ही सवाल खड़े हुए।

शुरुआती जांच में सामने आया था कि सरकारी खातों से रकम के हस्तांतरण में फर्जी दस्तावेजों और संदिग्ध बैंकिंग लेन-देन का इस्तेमाल हुआ।

इसीलिए अमरेंद्र यादव पर हुई यह कार्रवाई महज एक कर्मचारी की बर्खास्तगी के तौर पर नहीं देखी जानी चाहिए। यह उस लंबे प्रशासनिक और कानूनी सिलसिले की एक कड़ी है, जिसकी शुरुआत 2017 में घोटाले के खुलासे के साथ हुई थी।

सबसे बड़ा विरोधाभास यही है—जिस नाजिर के नाम से सृजन घोटाले की पहली प्राथमिकी दर्ज हुई, जांच की दिशा बदली तो वही व्यक्ति इस पूरे प्रकरण में आरोपी बन गया। अब अदालत की सजा के बाद विभागीय जांच ने भी उनकी सरकारी सेवा समाप्त कर दी है।

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प्रशासन का संदेश

जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सरकारी राशि और संसाधनों से जुड़े मामलों में वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितता के मामलों में नियमानुसार कठोर कार्रवाई जारी रहेगी।

सृजन घोटाले की कहानी अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। वर्षों बाद भी जांच, मुकदमों और सरकारी राशि की वसूली से जुड़े सवाल बने हुए हैं।

ऐसे में अमरेंद्र यादव की बर्खास्तगी यह संकेत देती है कि घोटाले से जुड़े मामलों में आपराधिक कार्रवाई के साथ-साथ विभागीय जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है।

TAGGED:Bhagalpur NewsSrijan Scamअमरेंद्र कुमार यादवसृजन घोटाला
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