उन्होंने पूछा कि यदि वर्तमान में इन जातियों को महादलित श्रेणी में शामिल करने का निर्णय सही है, तो वर्ष 2007 में लिया गया फैसला क्या गलत था?
सांसद ने इसी के साथ एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि अगर पुराने फैसले के कारण इन जातियों को बीच के वर्षों में योजनाओं और सरकारी सुविधाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया, तो उस कथित नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
व्यक्ति और परिवार पर टिप्पणी के बजाय नीति पर चर्चा की मांग
अरुण भारती ने बातचीत के दौरान कहा कि उनका सवाल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि नीति और उसके प्रभाव को लेकर है। उन्होंने कहा कि नीतिगत सवाल का जवाब भी तथ्यों और नीतिगत आधार पर मिलना चाहिए।
उनका तर्क है कि सामाजिक वर्गीकरण जैसे फैसलों का सीधा संबंध बड़ी आबादी के अधिकारों और सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच से होता है। इसलिए ऐसे निर्णयों के आधार, समीक्षा और परिणाम पर सार्वजनिक चर्चा जरूरी है।
क्या है सांसद का मुख्य सवाल?
| मुद्दा | अरुण भारती का सवाल |
|---|---|
| 2007 का वर्गीकरण | दलित और महादलित वर्गीकरण का आधार क्या था? |
| महादलित श्रेणी का लाभ | शामिल जातियों को कितना लाभ मिला? |
| पासी, पासवान, रविदास, रजक | इन्हें महादलित श्रेणी से बाहर करने का आधार क्या था? |
| सर्वे/रिपोर्ट | क्या निर्णय से पहले कोई सर्वे या रिपोर्ट तैयार हुई थी? |
| वर्तमान निर्णय | अब दोबारा महादलित श्रेणी में शामिल करने का आधार क्या है? |
| पुराने नुकसान की भरपाई | बीच के वर्षों में हुए कथित नुकसान की भरपाई कौन करेगा? |
बहस का केंद्र अब नीति और उसके परिणाम
अरुण भारती के बयान से साफ है कि विवाद का केंद्र केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि दलितों के वर्गीकरण की नीति, उसके आधार और उसके सामाजिक प्रभाव से जुड़े सवाल हैं।
हालांकि, इस बातचीत में सांसद द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब में जीतन राम मांझी या संबंधित सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया इस उपलब्ध सामग्री में शामिल नहीं है। इसलिए इन सवालों पर उनका पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा।