पटना: बिहार में उद्योग और रोजगार को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने बिहार में फैक्ट्रियों की संख्या और औद्योगिक विकास को लेकर केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की एनडीए सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा कर सवाल उठाया कि आखिर बिहार देश के उन राज्यों में क्यों नहीं है, जहां सबसे ज्यादा फैक्ट्रियां हैं।
तेजस्वी यादव ने अपने पोस्ट में Annual Survey of Industries (ASI) के आंकड़ों का हवाला देते हुए देश के टॉप-10 राज्यों की फैक्ट्रियों वाली सूची साझा की। इस सूची में तमिलनाडु सबसे ऊपर और हरियाणा 10वें स्थान पर है। बिहार इस सूची में शामिल नहीं है। इसी को आधार बनाकर तेजस्वी ने बिहार में लंबे समय से चल रही औद्योगिक विकास की कमी पर सरकार से सवाल किया।
तेजस्वी यादव ने डबल इंजन सरकार पर साधा निशाना
तेजस्वी यादव ने पोस्ट के जरिए बिहार की मौजूदा सरकार पर सीधा राजनीतिक हमला किया। उन्होंने सवाल उठाया कि लंबे समय से राज्य और केंद्र में एक ही गठबंधन की सरकार होने के बावजूद बिहार में पर्याप्त उद्योग और फैक्ट्रियां क्यों नहीं बढ़ पाईं।
उनका सवाल मुख्य रूप से बिहार में औद्योगिक निवेश, फैक्ट्री और रोजगार से जुड़ा है। तेजस्वी ने यह मुद्दा ऐसे समय में उठाया है जब बिहार की राजनीति में रोजगार और युवाओं का पलायन लगातार प्रमुख मुद्दों में शामिल रहा है।
ASI के आंकड़ों में कौन आगे?
केंद्र सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की Annual Survey of Industries 2023-24 रिपोर्ट के मुताबिक फैक्ट्रियों की संख्या के मामले में तमिलनाडु सबसे आगे था। इसके बाद गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश शीर्ष राज्यों में शामिल रहे।
ASI 2023-24 के आधिकारिक आंकड़ों में कुल 2,60,061 फैक्ट्रियों का अनुमान दर्ज किया गया था। रिपोर्ट में तमिलनाडु के पास कुल फैक्ट्रियों का 15.43 प्रतिशत, गुजरात के पास 12.81 प्रतिशत, महाराष्ट्र के पास 10.20 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश के पास 8.51 प्रतिशत हिस्सा बताया गया है।
यही औद्योगिक आंकड़े अब बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बन गए हैं।
युवाओं के पलायन से भी जोड़कर देखा मुद्दा
तेजस्वी यादव के पोस्ट पर सोशल मीडिया पर भी लोगों ने अलग-अलग प्रतिक्रिया दी। कुछ प्रतिक्रियाओं में बिहार के युवाओं के दूसरे राज्यों में रोजगार की तलाश में जाने का मुद्दा उठाया गया। सवाल यह है कि अगर राज्य में बड़े पैमाने पर औद्योगिक इकाइयां विकसित हों, तो क्या स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं?
हालांकि, बिहार में उद्योग की स्थिति पर बहस केवल मौजूदा सरकार तक सीमित नहीं रही। तेजस्वी के पोस्ट पर कुछ लोगों ने पूर्व की लालू प्रसाद यादव सरकार के दौर में उद्योग और रोजगार की स्थिति को लेकर भी सवाल किए। यानी सोशल मीडिया चर्चा में बिहार के औद्योगिक पिछड़ेपन को लंबे समय की समस्या के रूप में भी देखा गया।
बिहार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है औद्योगिक विकास?
बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि और सेवा क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। ऐसे में विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र का विस्तार रोजगार के नए अवसर पैदा करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
फैक्ट्रियों की संख्या बढ़ने से सिर्फ रोजगार ही नहीं, बल्कि सप्लाई चेन, परिवहन, लॉजिस्टिक्स, छोटे कारोबार और स्थानीय सेवाओं को भी फायदा मिल सकता है। यही वजह है कि बिहार में उद्योग लगाने और निवेश आकर्षित करने का मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है।
सरकार के सामने बड़ा सवाल- निवेश जमीन पर कितना उतरा?
बिहार सरकार पहले भी औद्योगिक निवेश बढ़ाने और नए प्रोजेक्ट लाने की दिशा में कदम उठाती रही है। अगस्त 2026 में राज्य सरकार की ओर से करीब 51,600 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों से जुड़े MoU की जानकारी सामने आई थी। इनमें न्यूक्लियर एनर्जी सेक्टर से जुड़ा करीब 22,500 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भी शामिल था। उस समय भी तेजस्वी यादव ने इन निवेश प्रस्तावों को लेकर सवाल उठाए थे।
इसलिए अब फैक्ट्रियों की संख्या को लेकर उनका नया हमला उसी बड़ी बहस का हिस्सा माना जा सकता है—क्या निवेश के प्रस्ताव वास्तव में फैक्ट्रियों और रोजगार में बदल रहे हैं?