किसी व्यक्ति के लिए नौकरी केवल महीने के अंत में मिलने वाला वेतन नहीं होती। उसके साथ परिवार की आवश्यकताएं जुड़ी होती हैं, बच्चों की पढ़ाई जुड़ी होती है, घर की योजनाएं जुड़ी होती हैं और सबसे बढ़कर अपने भविष्य को लेकर एक भरोसा जुड़ा होता है। इसलिए जब किसी बड़ी कंपनी में हजारों लोगों के रोजगार पर असर पड़ने की खबर आती है, तो उसे केवल एक कॉरपोरेट फैसले की तरह देखना पर्याप्त नहीं है।
दुनिया की बड़ी टेक्नोलॉजी और डिजिटल कंपनियों में हो रहे बदलाव इस समय इसी व्यापक सवाल की ओर हमारा ध्यान खींच रहे हैं।
Uber में कर्मचारियों की कटौती: मामला सिर्फ छंटनी का नहीं
हाल में Uber ने करीब 3,300 कर्मचारियों की संख्या कम करने की घोषणा की है। यह उसके वैश्विक कर्मचारियों का लगभग 10 प्रतिशत है और महामारी के बाद कंपनी की सबसे बड़ी कर्मचारी कटौती बताई जा रही है। कंपनी का कहना है कि वह अपने संगठनात्मक ढांचे को सरल बनाना चाहती है, प्रबंधन की अतिरिक्त परतों को कम करना चाहती है और भविष्य के कारोबार के लिए संसाधनों को अधिक प्रभावी ढंग से लगाना चाहती है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। Uber ने इस फैसले को सीधे-सीधे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण हुई छंटनी नहीं बताया है। कंपनी की प्राथमिक चिंता संगठनात्मक जटिलता को कम करना और बदलते परिवहन बाजार के लिए खुद को तैयार करना है। साथ ही, स्वचालित वाहनों और रोबोटैक्सी जैसी तकनीकों का भविष्य भी इस पूरे कारोबारी परिदृश्य को बदल रहा है।
यानी कहानी केवल 3,300 नौकरियों की नहीं है। कहानी यह है कि आने वाले वर्षों में कंपनियां किस तरह काम करेंगी, किस तरह के कौशल की आवश्यकता होगी और रोजगार का स्वरूप किस प्रकार बदलेगा।
भारत के लिए इसमें क्या संदेश है?
भारत इस बदलाव से अलग नहीं रह सकता। हमारे यहां डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है। टेक्नोलॉजी, ई-कॉमर्स, डिजिटल भुगतान, लॉजिस्टिक्स, ऐप आधारित सेवाओं और स्टार्टअप ने लाखों लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अवसर पैदा किए हैं। लेकिन इसी के साथ रोजगार का एक नया प्रश्न भी सामने आया है। तकनीक जब किसी काम को अधिक तेजी, कम लागत और बेहतर सटीकता के साथ करने में सक्षम होती है, तो कंपनियां स्वाभाविक रूप से उसका इस्तेमाल बढ़ाती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर तकनीकी प्रगति रोजगार खत्म करती है। कई बार तकनीक पुराने कामों का स्वरूप बदलती है और नए काम पैदा करती है। लेकिन यह बदलाव हमेशा एक ही समय पर और एक ही व्यक्ति के लिए नहीं होता।
यही वह जगह है जहां हमारी नीति और हमारी सामाजिक सोच की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
अगर किसी कर्मचारी का पुराना कौशल बदलती तकनीक के कारण कम उपयोगी हो रहा है, तो हमारा पहला सवाल यह होना चाहिए कि उसे नए कौशल से कैसे जोड़ा जाए।
नौकरी और तकनीक को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय हमें कौशल और तकनीक को साथ लाने की व्यवस्था बनानी होगी।
समाधान की शुरुआत कंपनी से भी होनी चाहिए
कर्मचारियों की संख्या कम करना किसी भी कंपनी का निर्णय हो सकता है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
कंपनियों को ऐसी परिस्थितियों में तीन बातों को प्राथमिकता देनी चाहिए:
- कर्मचारियों को पर्याप्त और स्पष्ट जानकारी दी जाए। अचानक पैदा हुई अनिश्चितता किसी भी व्यक्ति और परिवार के लिए कठिन होती है।
- जहां संभव हो, कर्मचारियों को दूसरे विभागों में स्थानांतरित करने या नए कौशल के लिए प्रशिक्षण देने के विकल्प तलाशे जाएं।
- जिन लोगों की सेवाएं समाप्त करनी पड़ें, उनके लिए संक्रमण सहायता, उचित नोटिस, करियर काउंसलिंग और नई नौकरी तलाशने में सहायता जैसी व्यवस्थाओं को कॉरपोरेट जिम्मेदारी का हिस्सा माना जाए।
व्यवसाय में दक्षता आवश्यक है, लेकिन दक्षता और संवेदनशीलता एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं।
भारत को क्या करना चाहिए?
सरकार के स्तर पर भी इस चुनौती को केवल रोजगार के आंकड़ों से नहीं देखा जाना चाहिए। हमें अगले पांच-दस वर्षों के रोजगार बाजार को ध्यान में रखकर एक व्यापक री-स्किलिंग और री-डिप्लॉयमेंट मिशन की आवश्यकता है।
इसमें सरकार, उद्योग, विश्वविद्यालय, आईटीआई, कौशल विकास संस्थान और निजी प्रशिक्षण संस्थानों को साथ लाया जा सकता है।
मसलन, जिन क्षेत्रों में ऑटोमेशन तेजी से बढ़ रहा है, वहां कर्मचारियों को पहले से यह बताया जाए कि अगले कुछ वर्षों में किन कौशलों की मांग बढ़ सकती है। उन्हें इन उभरते क्षेत्रों के अनुरूप प्रशिक्षण दिया जाए:
- डेटा
- साइबर सुरक्षा
- डिजिटल ऑपरेशंस
- एआई टूल्स
- मशीन मेंटेनेंस
- इलेक्ट्रिक मोबिलिटी
- लॉजिस्टिक्स
- अन्य उभरते तकनीकी क्षेत्र
यह प्रशिक्षण केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारत की बड़ी ताकत उसका युवा मानव संसाधन है। लेकिन युवा आबादी तभी आर्थिक शक्ति बनती है जब उसके पास बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप कौशल भी हो।
कंपनियों के लिए भी यह अवसर है
भारतीय कंपनियों को इस वैश्विक बदलाव से केवल सावधान होने की जरूरत नहीं है; इसमें अवसर भी छिपा है। अगर दुनिया में काम के कुछ पारंपरिक तरीके बदल रहे हैं, तो भारत उन नए कामों और सेवाओं का केंद्र बन सकता है। इसके लिए हमें केवल कम लागत वाले मानव संसाधन की पहचान से आगे बढ़ना होगा। हमें उच्च गुणवत्ता वाले कौशल, अनुसंधान, नवाचार और तकनीकी विशेषज्ञता में निवेश करना होगा। आज किसी कर्मचारी के लिए केवल एक डिग्री पर्याप्त नहीं हो सकती। आने वाले समय में लगातार सीखते रहने की क्षमता शायद सबसे महत्वपूर्ण कौशलों में से एक होगी। इसीलिए कंपनियों को भी कर्मचारियों के प्रशिक्षण को खर्च नहीं, निवेश के रूप में देखना चाहिए।
और समाज को?
समाज के स्तर पर भी हमें अपनी भाषा और दृष्टिकोण को संतुलित रखना होगा।
जब किसी कंपनी में रोजगार कम होते हैं, तो प्रभावित लोगों के प्रति संवेदना स्वाभाविक है। लेकिन हर ऐसी खबर को पूरे रोजगार बाजार के लिए भय का संकेत मान लेना भी उचित नहीं होगा।
तकनीकी परिवर्तन पहले भी हुए हैं। उद्योगों का स्वरूप बदला है, कई काम समाप्त हुए हैं, लेकिन नए काम भी सामने आए हैं। अंतर केवल इतना है कि इस बार बदलाव की गति अधिक तेज हो सकती है।
इसलिए डर के बजाय तैयारी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
एक कर्मचारी से भी आगे देखना होगा
इस पूरी बहस में एक बात सबसे महत्वपूर्ण है—रोजगार को केवल कंपनी और कर्मचारी के बीच का संबंध मानना पर्याप्त नहीं है।
एक नौकरी के पीछे पूरा परिवार होता है। एक कर्मचारी की आय से स्थानीय बाजार चलता है, बच्चों की शिक्षा चलती है, घर का किराया या ईएमआई चलती है और कई छोटे व्यवसायों को ग्राहक मिलता है।
इसलिए बड़े पैमाने पर होने वाले रोजगार संबंधी बदलावों का असर व्यापक आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।
भारत जैसे देश में, जहां बड़ी युवा आबादी रोजगार के अवसरों की तलाश में है, हमें ऐसी अर्थव्यवस्था बनानी होगी जिसमें तकनीकी प्रगति के साथ रोजगार के नए अवसर भी लगातार पैदा होते रहें।
हमें किस दिशा में आगे बढ़ना है?
Uber की घटना को इसी बड़े संदर्भ में देखना चाहिए।
यह किसी एक कंपनी की कहानी है, लेकिन इससे निकलने वाला प्रश्न हम सबके लिए है।
क्या हम उस भविष्य के लिए तैयार हैं जिसमें मशीनें और इंसान साथ काम करेंगे?
अगर जवाब हां है, तो तैयारी आज से करनी होगी। हमें ऐसी नीतियां चाहिए जो निवेश और नवाचार को प्रोत्साहित करें, लेकिन साथ ही कौशल विकास और रोजगार संक्रमण को भी महत्व दें। कंपनियों को ऐसी कार्यसंस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें तकनीक के साथ कर्मचारी भी आगे बढ़ सके। शिक्षण संस्थानों को पाठ्यक्रमों को उद्योग की बदलती जरूरतों से जोड़ना होगा। और कर्मचारियों को भी अपने कौशल को समय के साथ लगातार विकसित करने के लिए तैयार रहना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें तकनीकी प्रगति बनाम रोजगार की बहस से आगे निकलना होगा।
हमारा लक्ष्य तकनीक को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि तकनीक से पैदा होने वाली उत्पादकता और समृद्धि का लाभ समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे।
दुनिया बदल रही है। काम बदल रहा है। कंपनियां बदल रही हैं।
अब भारत के सामने चुनौती यह है कि वह इस बदलाव का केवल दर्शक न बने, बल्कि अपनी युवा शक्ति, कौशल और नवाचार के बल पर इस नए दौर का सक्रिय भागीदार बने।
किसी कर्मचारी के लिए रोजगार का बदलना एक व्यक्तिगत चिंता हो सकता है। लेकिन एक देश के लिए यह भविष्य की अर्थव्यवस्था को तैयार करने का अवसर भी है।
हमें चिंता को समझना है, लेकिन चिंता में रुकना नहीं है। हमें समाधान की दिशा में आगे बढ़ना है।