बरियारपुर: गंगा के बढ़ते जलस्तर ने मुंगेर के बरियारपुर प्रखंड की नीरपुर पंचायत के लालजी टोला में रहने वाले कई परिवारों की जिंदगी मुश्किल कर दी है। घरों के आसपास बाढ़ का पानी पहुंचने के बाद लोगों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित जगह की तलाश करनी पड़ी।
मजबूरी में कई परिवार बरियारपुर-कल्याणपुर रेलखंड के किनारे प्लास्टिक और तिरपाल के सहारे अस्थायी ठिकाना बनाकर रहने को मजबूर हैं।
घर से निकलने के बाद इन परिवारों को सुरक्षित और आरामदायक आश्रय तो नहीं मिला, लेकिन सिर छिपाने के लिए रेल पटरी के किनारे जगह जरूर मिल गई। दिन किसी तरह गुजर जाता है, मगर रात होते ही परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।
सामान समेटा और घर छोड़ने को मजबूर हुए परिवार
बाढ़ का पानी बढ़ने के साथ ही ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने परिवार और जरूरी सामान को सुरक्षित जगह पहुंचाने की थी। लोगों ने कपड़े, अनाज और दूसरी जरूरी चीजों को बोरे और गठरी में बांधा और घर से निकल पड़े।
रेल ट्रैक के किनारे पहुंचने के बाद कुछ परिवारों ने प्लास्टिक और तिरपाल लगाकर अस्थायी आशियाना तैयार किया है। यहां न पर्याप्त बिस्तर है और न गर्मी से राहत के लिए पंखे जैसी कोई सुविधा।
ग्रामीणों का कहना है कि घर छोड़ना किसी की इच्छा नहीं थी। पानी जिस तरह बढ़ रहा था, उसमें घर के अंदर रहना जोखिम भरा लगने लगा था। ऐसे में बच्चों और परिवार के बुजुर्गों को लेकर बाहर निकलना ही बेहतर समझा।
दिन बच्चों को संभालने में, रात सामान की रखवाली में
अस्थायी ठिकाने पर रहने वाले परिवारों के लिए दिनभर की जिंदगी भी आसान नहीं है। महिलाएं बच्चों को संभालने और घरेलू सामान को व्यवस्थित रखने में लगी रहती हैं। वहीं पुरुषों की चिंता रात में बढ़ जाती है। उन्हें परिवार के साथ-साथ बचे हुए सामान और मवेशियों की भी निगरानी करनी पड़ती है।
सबसे ज्यादा परेशानी छोटे बच्चों को हो रही है। खुले में रहने के कारण उन्हें मौसम की मार झेलनी पड़ रही है। गंदगी, मच्छरों और पर्याप्त साफ पानी की कमी से बीमारी का खतरा भी बढ़ गया है।
पटरी के किनारे हर ट्रेन बढ़ा देती है बेचैनी
लालजी टोला के इन परिवारों के लिए रात का समय सबसे कठिन है। जिस जगह उन्होंने शरण ली है, उसके पास से लगातार ट्रेनें गुजरती हैं। ट्रेन के गुजरने पर तेज आवाज और कंपन से नींद टूट जाती है।
ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ शोर की परेशानी नहीं है। बाढ़ के कारण पहले ही घर और रोजमर्रा की जिंदगी उनसे दूर हो चुकी है। अब रातें भी चैन से नहीं गुजर रहीं। एक तरफ पानी का डर है तो दूसरी तरफ खुले आसमान के नीचे परिवार की सुरक्षा की चिंता।
सवाल यही—कब लौट पाएंगे अपने घर?
बाढ़ प्रभावित परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उन्हें इस अस्थायी ठिकाने पर आखिर कितने दिन रहना पड़ेगा। ग्रामीणों को उम्मीद है कि पानी कम होने के बाद वे वापस अपने घर लौट सकेंगे, लेकिन फिलहाल गंगा के बढ़ते जलस्तर ने उनकी चिंता बढ़ा रखी है।
लालजी टोला के प्रभावित परिवार प्रशासन से सुरक्षित आश्रय, भोजन, पेयजल और जरूरी राहत सामग्री उपलब्ध कराने की मांग कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि घर छोड़ने के बाद उनकी सबसे बड़ी जरूरत सिर्फ सुरक्षित जगह है, जहां बच्चों और परिवार के साथ कम से कम रात चैन से गुजारी जा सके।
बाढ़ ने इन परिवारों से उनका घर भले ही अस्थायी रूप से छीन लिया हो, लेकिन रेल पटरी के किनारे बिताई जा रही रातें उन्हें हर पल उस घर की याद दिला रही हैं, जहां कभी उन्हें सुकून की नींद आती थी।