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Home - देश - जब टैंक के सामने खड़े होकर दिखाया था अदम्य साहस, आज भी याद है वीर अब्दुल हमीद का वह शौर्य

जब टैंक के सामने खड़े होकर दिखाया था अदम्य साहस, आज भी याद है वीर अब्दुल हमीद का वह शौर्य

प्रशांत कुमार
Last updated: सितम्बर 10, 2026 10:46 अपराह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 2 महीना पहले
वीर अब्दुल हमीद शहादत दिवस पर पटना में श्रद्धांजलि कार्यक्रम
वीर अब्दुल हमीद शहादत दिवस पर पटना में श्रद्धांजलि कार्यक्रम
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शहादत दिवस पर पटना में श्रद्धांजलि; जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने कहा—देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर हमीद का जीवन हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा

पटना, 10 सितंबर 2026। जंग के मैदान में सामने दुश्मन के टैंक हों और हाथ में सीमित हथियार—ऐसे वक्त में पीछे हटना आसान होता है। लेकिन कुछ सैनिक इतिहास में इसलिए दर्ज होते हैं क्योंकि वे मुश्किल हालात में भी आगे बढ़ते हैं।

वीर अब्दुल हमीद उन्हीं सैनिकों में से एक थे, जिनके अदम्य साहस ने 1965 के भारत-पाक युद्ध में वीरता की ऐसी मिसाल कायम की, जिसे देश आज भी याद करता है।

गुरुवार को उनके शहादत दिवस पर पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल परिसर में आयोजित राजकीय समारोह में उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया गया। जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने वीर अब्दुल हमीद के तैलचित्र पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

टैंकों के सामने नहीं झुका हौसला

वीर अब्दुल हमीद का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान उन्होंने दुश्मन के भारी-भरकम टैंकों का मुकाबला असाधारण साहस के साथ किया।

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वे भारतीय सेना की 4 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में तैनात थे। पंजाब के खेमकरण क्षेत्र में हुए संघर्ष के दौरान उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना दुश्मन के टैंकों को निशाना बनाया। उनके साहस ने युद्ध के मैदान में भारतीय सैनिकों के मनोबल को मजबूत किया।

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इसी वीरता के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें मरणोपरांत दिया गया।

10 सितंबर सिर्फ तारीख नहीं, शौर्य की याद है

वीर अब्दुल हमीद ने 10 सितंबर 1965 को युद्धभूमि में सर्वोच्च बलिदान दिया था। इसलिए हर वर्ष 10 सितंबर उनके शहादत दिवस के रूप में उन्हें याद करने का अवसर बनता है।

उनकी कहानी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह सिर्फ एक सैनिक की वीरगाथा नहीं है। यह उस भारतीय सैनिक के साहस की कहानी है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता।

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कौन थे वीर अब्दुल हमीद?

वीर अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में हुआ था। सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले अब्दुल हमीद ने सेना को अपना जीवन समर्पित किया।

उन्होंने वर्ष 1954 में भारतीय सेना में प्रवेश किया और आगे चलकर सेना की 4 ग्रेनेडियर्स यूनिट का हिस्सा बने। सैनिक जीवन में उन्होंने अनुशासन, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की पहचान बनाई।

1965 का युद्ध उनके जीवन का वह अध्याय बना, जिसने उन्हें भारतीय सैन्य इतिहास में अमर कर दिया।

परमवीर चक्र से सम्मानित

युद्धभूमि में उनके असाधारण साहस और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया। यह सम्मान भारतीय सेना के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार के रूप में सर्वोच्च सैन्य साहस को मान्यता देता है।

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वीर अब्दुल हमीद की गाथा इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस का परिचय दिया। उनका जीवन यह संदेश देता है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि हौसले, प्रशिक्षण और कर्तव्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से भी लड़ा जाता है।

जिलाधिकारी ने कहा—पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा बलिदान

श्रद्धांजलि कार्यक्रम में जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने कहा कि वीर अब्दुल हमीद का अदम्य साहस, वीरता, देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति समर्पण सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।

उन्होंने कहा कि देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देकर वीर अब्दुल हमीद ने राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान के लिए सर्वोच्च बलिदान का उदाहरण प्रस्तुत किया। ऐसे महान वीरों का जीवन राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए अपने कर्तव्य और दायित्वों के निर्वहन की प्रेरणा देता है।

श्रद्धांजलि के साथ फिर जीवंत हुई शौर्य की स्मृति

राजकीय समारोह में मौजूद लोगों ने भी वीर अब्दुल हमीद के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

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दरअसल, शहादत दिवस केवल किसी वीर सैनिक को याद करने का दिन नहीं है। यह उस मूल्य को याद करने का अवसर भी है जिसके लिए सैनिक अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है—राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान।

वीर अब्दुल हमीद की कहानी आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि समय बदलने के बावजूद सैनिक का सबसे बड़ा हथियार उसका साहस और कर्तव्य के प्रति उसकी निष्ठा ही रहता है।

उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा कि देश की रक्षा के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान कभी भुलाया नहीं जाता।

TAGGED:1965 युद्धपरमवीर चक्रवीर अब्दुल हमीदशहादत दिवस
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