Switzerland: जनमत संग्रह में Neutrality Initiative को मिला करारा झटका; प्रस्ताव पास होता तो UN की मंजूरी के बिना प्रतिबंध लगाना मुश्किल होता और NATO के साथ सैन्य सहयोग पर भी लगती पाबंदी
बर्न: स्विट्जरलैंड ने अपनी दशकों पुरानी तटस्थ विदेश नीति को और सख्त करने की पहल को खारिज कर दिया है। रविवार को हुए जनमत संग्रह में 70.15% मतदाताओं ने ‘Neutrality Initiative’ के खिलाफ वोट किया, जबकि 29.85% ने इसका समर्थन किया।
आधिकारिक नतीजों के मुताबिक सभी 20 पूर्ण कैंटनों और 6 अर्ध-कैंटनों ने भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। मतदान में करीब 47.06% भागीदारी दर्ज हुई।
इस प्रस्ताव का मकसद स्विट्जरलैंड की तटस्थता को संविधान में और स्पष्ट तथा कठोर बनाना था। इसके तहत देश को सैन्य या रक्षा गठबंधनों में शामिल होने या उनके साथ सहयोग करने से रोकने का प्रावधान था, सिवाय उस स्थिति के जब स्विट्जरलैंड पर हमला हो या हमले का तत्काल खतरा हो। साथ ही युद्धरत देशों पर संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना प्रतिबंध लगाने की क्षमता भी सीमित हो जाती।
प्रस्ताव में क्या बदलाव लाने की कोशिश थी?
स्विट्जरलैंड की मौजूदा व्यवस्था में तटस्थता का मतलब यह नहीं है कि देश अंतरराष्ट्रीय मामलों से पूरी तरह अलग रहता है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक स्विट्जरलैंड अपनी तटस्थता बनाए रखते हुए दूसरे देशों के साथ सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग कर सकता है और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को अपना सकता है। रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद स्विट्जरलैंड ने यूरोपीय संघ के कई प्रतिबंधों को भी अपनाया है।
नई पहल इस नीति को बदलना चाहती थी। इसमें संविधान में यह दर्ज करने का प्रस्ताव था कि स्विट्जरलैंड की तटस्थता स्थायी और सशस्त्र रहेगी। इसके अलावा देश किसी सैन्य या रक्षा गठबंधन में शामिल नहीं होगा और न ही उसके साथ सहयोग करेगा, जब तक कि खुद स्विट्जरलैंड पर हमला न हो या हमले की तैयारी न हो रही हो।
प्रस्ताव के मुताबिक युद्ध में शामिल देशों के खिलाफ आर्थिक या दूसरे प्रतिबंध भी तभी लगाए जा सकते थे, जब वे संयुक्त राष्ट्र द्वारा मंजूर किए गए हों। हालांकि प्रतिबंधों की चोरी रोकने के लिए कुछ उपायों की अनुमति का प्रावधान रखा गया था।
रूस ने किया था पहल का समर्थन
इस जनमत संग्रह को लेकर रूस ने खुले तौर पर पहल का समर्थन किया था। वहीं स्विट्जरलैंड की दक्षिणपंथी Swiss People’s Party (SVP) इसके पक्ष में थी। इसके विपरीत संघीय सरकार और देश की अन्य प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने प्रस्ताव का विरोध किया।
बहस का एक बड़ा मुद्दा यह था कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद स्विट्जरलैंड की पारंपरिक तटस्थता को किस तरह लागू किया जाना चाहिए। प्रस्ताव के समर्थक तटस्थता की अधिक कठोर व्याख्या चाहते थे, जबकि विरोधियों का कहना था कि मौजूदा व्यवस्था देश को बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच अपनी नीति तय करने की गुंजाइश देती है।
विदेश मंत्री बोले- तटस्थता का मतलब उदासीनता नहीं
स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्री इग्नाजियो कैसिस ने तटस्थता को लेकर कहा है कि इसे हमेशा कुछ लचीलेपन के साथ लागू किया गया है। उनका तर्क रहा है कि तटस्थ रहने का अर्थ अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन को नजरअंदाज करना नहीं है।
यूक्रेन को हथियार बेचने पर स्विट्जरलैंड की मौजूदा पाबंदी जारी रखने की बात भी सरकार की ओर से कही गई है। यानी स्विट्जरलैंड की नीति में तटस्थता और अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद क्यों तेज हुई बहस?
रूस के यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने के हमले के बाद स्विट्जरलैंड की तटस्थता पर बहस फिर तेज हुई। देश ने सैन्य रूप से किसी पक्ष का साथ नहीं दिया, लेकिन रूस पर लगाए गए कई यूरोपीय प्रतिबंधों को अपनाया। इससे यह सवाल उठा कि क्या आर्थिक प्रतिबंधों में शामिल होना पारंपरिक तटस्थता की सीमा के भीतर है।
यही विवाद Neutrality Initiative के केंद्र में था। प्रस्ताव के समर्थक चाहते थे कि भविष्य में ऐसी स्थिति में स्विट्जरलैंड को प्रतिबंध लगाने की ज्यादा सीमित गुंजाइश हो। लेकिन जनमत संग्रह के नतीजे बताते हैं कि मतदाताओं ने इस संवैधानिक बदलाव को स्वीकार नहीं किया।
1815 से जुड़ी है स्विट्जरलैंड की तटस्थता
स्विट्जरलैंड की तटस्थता कोई नई नीति नहीं है। 1815 में वियना कांग्रेस के दौरान यूरोपीय शक्तियों ने स्विट्जरलैंड की स्थायी तटस्थता को मान्यता दी थी। बाद में 1907 की हेग संधियों के तहत तटस्थ देशों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को अंतरराष्ट्रीय कानून में और स्पष्ट किया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी स्विट्जरलैंड ने खुद को तटस्थ बनाए रखा। हालांकि उस दौर में उसकी भूमिका विवादों से पूरी तरह मुक्त नहीं रही। नाजी जर्मनी द्वारा लूटे गए सोने से जुड़े लेनदेन और यहूदी शरणार्थियों के साथ स्विट्जरलैंड की तत्कालीन नीतियों को लेकर बाद के दशकों में गंभीर सवाल उठे। देश ने 1990 के दशक में अपनी कुछ नीतियों के लिए माफी भी मांगी।
स्विट्जरलैंड में जनता तय करती है बड़े फैसले
इस पूरे मामले की एक खास बात यह है कि स्विट्जरलैंड में प्रत्यक्ष लोकतंत्र की व्यवस्था काफी मजबूत है। महत्वपूर्ण संवैधानिक और नीतिगत मुद्दों पर जनता सीधे जनमत संग्रह के जरिए फैसला कर सकती है।
27 सितंबर के इस वोट में भी अंतिम फैसला मतदाताओं ने किया। 70.15% वोट के साथ Neutrality Initiative खारिज होने के बाद स्विट्जरलैंड की मौजूदा तटस्थता व्यवस्था में प्रस्तावित सख्त संवैधानिक बदलाव फिलहाल लागू नहीं होगा।