बंगाल के साबिर हुसैन ने ऐसा खास पाउडर विकसित किया है, जो गंभीर चोटों में महज 60 सेकेंड में रक्तस्राव नियंत्रित करने में मदद करता है। उनके इस नवाचार को सिंगापुर की SLINGSHOT-2026 प्रतियोगिता में अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है।
कोलकाता। सड़क दुर्घटना हो, गोली लगने की घटना या युद्ध के मैदान में हुआ विस्फोट—गंभीर चोट के बाद अत्यधिक रक्तस्राव कई बार अस्पताल पहुंचने से पहले ही जिंदगी छीन लेता है। ऐसे आपात हालात में यदि कोई विशेष पाउडर महज 60 सेकेंड में रक्तस्राव नियंत्रित करने में मदद कर सके, तो यह चिकित्सा जगत के लिए बड़ी उपलब्धि हो सकती है। पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्द्धमान जिले के खंडघोष ब्लॉक स्थित बादुलिया गांव के साबिर हुसैन ने अपने शोध और नवाचार से इसी चुनौती का समाधान खोजने की दिशा में उल्लेखनीय काम किया है। उनके स्टार्टअप मिराक्यूल्स मेडसोल्यूशंस के विकसित ‘स्टापब्लीड’ (StopBleed) पाउडर को सिंगापुर की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय स्टार्टअप प्रतियोगिता ‘SLINGSHOT-2026’ में हेल्थ एंड बायोमेडिकल श्रेणी का सर्वोच्च सम्मान मिला है। दुनिया भर के पांच हजार से अधिक स्टार्टअप के बीच मिली इस सफलता ने बंगाल के एक छोटे से गांव के युवा नवप्रवर्तक को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है।
इस उपलब्धि के साथ कंपनी को चार लाख सिंगापुर डॉलर का अनुदान मिलने की जानकारी है। भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत करीब 2.7 करोड़ रुपये बताई गई है। इस तकनीक की खासियत यह है कि इसका इस्तेमाल केवल शोध और प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारत के 25 से अधिक अस्पतालों में यह तकनीक इस्तेमाल की जा रही है। यानी जिस नवाचार की शुरुआत एक शैक्षणिक संस्थान की प्रयोगशाला में हुई, वह अब गंभीर चोटों के उपचार से जुड़ी वास्तविक चिकित्सा जरूरतों तक पहुंच रहा है।
क्या है StopBleed पाउडर और कैसे करता है काम?
StopBleed सामान्य घाव भरने वाला पाउडर नहीं, बल्कि नैनो-बायोपॉलिमर आधारित विशेष हेमोस्टेटिक तकनीक है। हेमोस्टेटिक उत्पादों का उद्देश्य रक्तस्राव को नियंत्रित करने में मदद करना होता है। इस तकनीक को गंभीर चोटों से होने वाले रक्त के तेज बहाव को कम करने के लिए विकसित किया गया है।
कंपनी की ओर से उपलब्ध तकनीकी जानकारी के मुताबिक, यह पाउडर घाव से निकलने वाले रक्त के प्लाज्मा को तेजी से सोखता है। इसकी विशेष रेशेदार संरचना रक्त कोशिकाओं को अपने भीतर रोकने में मदद करती है। इससे शरीर की प्राकृतिक रक्त का थक्का जमाने की प्रक्रिया को गति मिलती है। इसके बाद घाव पर हाइड्रोजेल जैसी परत बनती है, जो रक्तस्राव को नियंत्रित करने में सहायक होती है।

इसकी उपयोगिता उन परिस्थितियों में हो सकती है, जहां खून तेजी से बह रहा हो और अस्पताल तक पहुंचने में समय लगने की आशंका हो। सड़क दुर्घटनाओं, गोली लगने, विस्फोट, औद्योगिक हादसों और युद्धक्षेत्र में लगी गंभीर चोटों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। यह पाउडर और पेलेट, दोनों रूपों में उपलब्ध है। सामान्य तापमान पर इसकी भंडारण अवधि तीन साल तक बताई गई है। इस वजह से अस्पतालों के साथ एंबुलेंस और आपातकालीन प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था में भी इसके इस्तेमाल की संभावना है।
हालांकि, 60 सेकेंड में रक्तस्राव नियंत्रित करने का दावा उत्पाद की बताई गई क्षमता से जुड़ा है। हर तरह की चोट और हर मरीज की स्थिति में एक जैसा परिणाम मानना उचित नहीं होगा। गंभीर चोट या अत्यधिक रक्तस्राव की स्थिति में तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता जरूरी है। यह तकनीक अस्पताल में उपचार का विकल्प नहीं है।
एनआईटी राउरकेला में हुआ शोध, CDSCO से मिली मंजूरी
StopBleed तकनीक का विकास ओडिशा के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी), राउरकेला के बायोटेक्नोलॉजी एंड मेडिकल इंजीनियरिंग विभाग में हुआ। प्रोफेसर देवेंद्र वर्मा और उनके शोधार्थी डॉ. साबिर हुसैन ने मिलकर इस तकनीक को विकसित किया। इसके बाद इसके व्यावसायिक उत्पादन और वितरण के लिए मिराक्यूल्स मेडसोल्यूशंस की स्थापना की गई। साबिर इस स्टार्टअप के संस्थापक और प्रमुख हैं।
इस उत्पाद को भारत के केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) से क्लास-सी मेडिकल डिवाइस के रूप में व्यावसायिक निर्माण और चिकित्सकीय इस्तेमाल की मंजूरी मिलने की जानकारी दी गई है। नियामकीय मंजूरी किसी भी चिकित्सा उत्पाद को प्रयोगशाला से बाहर वास्तविक चिकित्सा व्यवस्था तक पहुंचाने की प्रक्रिया में अहम होती है। 25 से अधिक अस्पतालों में इसका इस्तेमाल होने की जानकारी इस तकनीक के व्यावहारिक उपयोग की ओर संकेत करती है।

साबिर को पहले भी मिल चुका है राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान
साबिर हुसैन के लिए यह पहली बड़ी उपलब्धि नहीं है। वर्ष 2019 में उनके स्टार्टअप को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की ‘डेयर टू ड्रीम’ प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिला था। तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें सम्मानित किया था। यह उपलब्धि उनके नवाचार और तकनीकी शोध के शुरुआती सफर में महत्वपूर्ण पड़ाव रही।
साबिर ने पूर्व बर्द्धमान जिले के खंडघोष ब्लॉक के बादुलिया गांव के एक स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा हासिल की। इसके बाद बर्द्धमान से उच्च माध्यमिक की पढ़ाई पूरी की। आगे चलकर कोलकाता के एक कॉलेज से बीटेक और एनआईटी राउरकेला से बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में एमटेक किया। इसी शैक्षणिक सफर के दौरान उनका शोध गंभीर चोटों में रक्तस्राव नियंत्रित करने वाली तकनीक के विकास तक पहुंचा।
गांव से निकला नवाचार अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर
साबिर की उपलब्धि का महत्व केवल एक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार तक सीमित नहीं है। यह उस सफर की कहानी भी है, जिसमें एक छोटे गांव से निकला युवा उच्च शिक्षा और शोध के जरिए ऐसी तकनीक विकसित करने में सफल हुआ, जिसका संबंध सीधे मानव जीवन बचाने से है। एनआईटी की प्रयोगशाला में विकसित शोध को स्टार्टअप के माध्यम से अस्पतालों तक पहुंचाना विज्ञान, शिक्षा और उद्यमिता के बीच सहयोग का उदाहरण है।
सिंगापुर में मिला सम्मान इस तकनीक को अंतरराष्ट्रीय पहचान देने वाला नया पड़ाव है। अब इसकी व्यापक उपलब्धता, चिकित्सकीय उपयोग के अनुभव और आपात स्थितियों में प्रभावशीलता पर आगे की प्रगति महत्वपूर्ण होगी। यदि StopBleed गंभीर चोटों में रक्तस्राव नियंत्रित करने में अपनी उपयोगिता लगातार साबित करता है, तो आपातकालीन चिकित्सा के क्षेत्र में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। बादुलिया गांव के साबिर हुसैन की यह उपलब्धि बंगाल ही नहीं, देश के उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है, जो विज्ञान और शोध को समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान से जोड़ना चाहते हैं।

